भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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पृष्ठ 217

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १६७ तस्य वाचकम् । "अकारः सर्ववर्णाग्र्यः प्रकाशः परमः शिवः" इति संकेतपद्ध- त्युक्तरीत्याऽकारवाच्यः परमशिवः, परमशिवांशत्वात् । तद्वत् परशिववत् । यथा परमशिवोऽकारवाच्यः, तथा तदंशभूतो जीवोऽप्यकोरदशकेनोच्यत इत्यर्थः । तद्वद् जीववत् । यथा शिवांशो जीवः परमशिववाचकश्रीकण्ठेन लक्ष्यते, तद्वद् जीववत् एकादशश्च श्रोकण्ठो जीवाधारभूतप्राणरूपः स्थितः । प्राणो हि जीवस्याधारः, प्राणेन विना जीवस्यानवस्थानात् । परः परो द्वादशः श्रीकण्ठः पुरुषस्य वाचकः, विश्वस्य पूरणात् परमशिवः पुरुषः । तदुक्तं चिद्गगनचन्द्रिकायाम्— विश्वसद्मनि ^२चिदात्मनीश्वरे पूरणात् पुरुषतामुपेयुषि । ये मनः प्रणिदधुर्महर्षयस्तान् पतञ्जलिमुखानुपामहे ॥९॥ इति । श्रुतिरपि—"पुरुष एवेदं सर्वम्" (ऋ०१०।९०।२) इति ॥ ४४ ॥ ननु श्रीकण्ठद्वादशकं विद्यायां विद्यते, एकेन शिवः कथ्यते, एकेन जीवः, एकेन प्राण इति त्रिभिरेवालम्, किमन्यैरित्यत आह— एकः सन्नेव पुरुषो बहुधा जायते हि सः । हम अभी अशुद्ध (सकल) प्रमाता के प्रसंग में कर चुके हैं। संकेतपद्धति के प्रमाण से सभी वर्णों का आदिभूत अकार प्रकाशात्मक परमशिव का वाचक है। जैसे यह प्रकाशात्मक परमशिव का वाचक है, उसी तरह से उसके अंशभूत जीव को भी यह बोधित करता है और जैसे शिवांश जीव परमशिव के वाचक श्रीकण्ठ से लक्षित होता है, उसी तरह से ग्यारहवें श्रीकण्ठ से जीवन का आधारभूत प्राण भी लक्षित होता है। इस जीवात्मा का आधार प्राण ही है। प्राण के बिना जीव जीवित नहीं रह सकता। इसके आगे का बारहवाँ श्रीकण्ठ पुरुष का वाचक है। यह पुरुष विश्व का पूरण करने वाला परमशिव है। चिद्गगनचन्द्रिका में यह वर्णित है— चिदात्मा परमेश्वर जब इस विश्वरूपी घर में अपने को पूरित कर देता है, तो वह (विराट्) पुरुष का स्वरूप धारण कर लेता है। ऐसे पुरुष में जिन्होंने अपने चित्त को समाहित कर दिया है, उन ^१पतंजलि प्रभृति को हम प्रणाम करते हैं ॥ ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में भी कहा गया है—"यह पुरुष ही सब कुछ है" ॥४४॥ यहाँ शंका उठती है कि विद्या में १२ श्रीकण्ठ हैं। इनमें से एक से शिव, दूसरे से जीव और तीसरे से प्राण का बोध हो जायेगा, ऐसी स्थिति में बाकी के श्रीकण्ठों का क्या प्रयोजन है ? इसी का समाधान करते हैं— पुरुष तो एक ही है, किन्तु वह अनेक रूपों में उत्पन्न होता रहता है, अनेक स्वरूप धारण करता रहता है ॥ १. कारेणोच्यते-ख. ने. ज. झ. उ. । २. शिवात्म-ख. ने. ज. झ. उ., सदात्म-मु. ।

  1. पातंजल योगसूत्र के "ईश्वरप्रणिधानाद्वा" और "क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः" (१।२३-२४) इन दो सूत्रों की ओर यहाँ इंगित किया गया है।