भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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पृष्ठ 218

१६८ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः सत्यमेकेन शिव¹ उच्यते, द्वाभ्यां जीवप्राणौ, तथापि स एकः सन्नेव "एक- मेवाद्वितीयं ब्रह्म" (त्रि० म० ना० ३।३), "सच्च त्यच्चाभवत्" (तै० उ० २।६) इत्युपनिषदुक्तरीत्या सद्रूप ²एको हि पुरुषो बहुधा जायते । हिशब्दः प्रसिद्धौ । ³अपि चास्मिन्नर्थे प्रमाणम्—"इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते" (ऋ० ४।७।३३) इति । एक एव हि भूतात्मा भूते भूते व्यवस्थितः । एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत् ॥ (ब्र० वि० उ० ११) इति रीत्या⁴ सत्यमेक एव⁵ शिवो भवति, ⁶तथापि जीवप्राणात्मना ⁷बहुधा भिन्न इतीममर्थं द्योतयितुं विद्यायां बहवः श्रीकण्ठाः स्थिता इत्यर्थः ॥ अक्षराणां वासनामुक्त्वा बिन्दूनां नादादीनां च वासनामाह— रुद्रेश्वरसदेशाख्या देवता मितविग्रहाः ॥४५॥ बिन्दुत्रयेण कथिता अमितामितविग्रहाः । शान्तिः शक्तिश्च शम्भुश्च नादत्रितयबोधनाः ॥४६॥ यह शंका ठीक ही है कि एक से पुरुष और बाकी दो अकारों से जीव और प्राण का बोध हो सकता है, किन्तु एक ही सद्रूप पुरुष अनेक रूपों में प्रकट होता रहता है, यह बात अनेक श्रुतियों में वर्णित है और लोक में भी प्रसिद्ध है । महानारायणोपनिषद् कहती है कि "ब्रह्म एक ही है, दूसरा कोई नहीं है" । तैत्तिरीयोपनिषद् का कहना है—"वह ब्रह्म मूर्त और अमूर्त स्वरूप में अभिव्यक्त होता है"। ऋग्वेद का कहना है— "परमैश्वर्य संपन्न ईश्वर अपनी माया शक्ति के सहारे अनेक रूप धारण कर लेता है"। ब्रह्मबिन्दूपनिषद् का कहना है—"एक अकेला ही भूतात्मा प्रत्येक प्राणी में विराजमान है । जल में प्रतिबिम्बित चन्द्रबिम्ब के समान यह एक और अनेक रूपों में भासित होता रहता है"। इन प्रमाणों के आधार पर जैसे यह सही है कि शिव एक ही है, उसी तरह से यह भी ठीक ही है कि वह जीव, प्राण आदि के रूप में बहुधा भिन्न भी दिखाई पड़ता है । इसी अर्थ को बताने के लिये विद्या में अनेक श्रीकण्ठ (अकार) वर्णों की स्थिति है ॥ अक्षरों की वासना को बताने के बाद अब बिन्दु और नाद की भावना का प्रकार बताते हैं— परिच्छिन्न स्वरूप वाले रुद्र, ईश्वर और सदाशिव की वासना विद्यागत तीन बिन्दुओं में की जाती है और अनन्त अपरिच्छिन्न स्वरूप वाले शान्ति, शक्ति और शिव की वासना तीन नादों में की जाती है ॥४५-४६॥ १. पुरुषः कथ्यते-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । २. एकोऽपि-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. 'अपि च' नास्ति-क. ज. झ. उ. । ४. 'रीत्या' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. 'एव' नास्ति-ख. ने. ज. उ. । ६. 'तथापि' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ७. 'बहुधा' नास्ति-ख. ने. ज. उ. ।