भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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पृष्ठ 219

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १६९ रुद्रस्तेजस्तत्त्वाधिपतिः। तेजस्तत्त्वान्तर्भूतं पुरुषरागविद्यानियतिकालकला- मायान्तम्। तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे—"पुरुषादिकमायान्तं तेजस्तत्त्वं महेश्वरि" इति। १शुद्धविद्येश्वरसदाशिवा वायुतत्त्वात्मकाः। तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे—"विद्या चेश्वरसादाख्यौ वायुतत्त्वं समीरिनम्" इति। अतो रुद्रेश्वरसदेशाख्या देवता मितविग्रहाः परिच्छिन्नरूपाः। तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे—"यत् सदाशिवपर्यन्तं विनाशोत्पत्तिसंयुक्तम्" इति। बिन्दुत्रयेण कथिताः। बिन्दुत्रयं त्रिबोजशिखरवर्ति- कामकलोर्ध्वगतानां बिन्दूनां त्रितयम्। अमितामितविग्रहाः शान्तिः शक्तिश्च शम्भुश्च नादत्रितयबोधनाः। शान्तिरव्यक्तध्वनिलक्षणो नादोऽखिलं जगदधरीकृत्य यत्र लयमेति सा ब्रह्मरन्ध्रावसानभूमिः, ऊर्ध्वशक्तीनां प्रशान्तिस्थानहेतुत्वात्। तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे— नाड्याधारस्तु २नादो वै भित्त्वा सर्वमिदं जगत्। अधःशक्त्या ३विनिर्गत्य ऊर्ध्वशक्त्यवसानकः॥ यहाँ रुद्र तेजस्तत्त्व का अधिपति है। इस तत्त्व में पुरुष, राग, विद्या, नियति, काल, कला और माया ये सात तत्त्व अन्तर्भूत हैं। स्वच्छन्दसंग्रह में बताया गया है— "हे महेश्वरि ! पुरुष से माया पर्यन्त तत्त्व तेजस्तत्त्व का विस्तार है"। शुद्धविद्या, ईश्वर और सदाशिव वायुतत्त्वात्मक हैं। स्वच्छन्दसंग्रह में इसका भी प्रतिपादन है— "विद्या, ईश्वर और सादाख्य तत्त्व वायुतत्त्वात्मक हैं"। तेजस्तत्त्व और वायुतत्त्व के अन्तर्गत होने से रुद्र, ईश्वर और सदाशिव नामक देवता परिच्छिन्न स्वरूप वाले हैं। स्वच्छन्दसंग्रह में बताया गया है—"सदाशिव पर्यन्त सभी तत्त्व उत्पत्तिविनाशशील हैं"। इनका बोध विद्यागत तीन बिन्दुओं से कराया गया है। ये तीन बिन्दु तीनों बीजों के शिखर पर विराजमान कामकला के ऊपर स्थित है। अनन्त अपरिच्छिन्न स्वरूप वाले शान्ति, शक्ति और शम्भु का बोध तीन नादों से होता है। अव्यक्त ध्वनिरूप नाद समस्त जगत् को लांघ कर जहाँ लीन होता है, वह ब्रह्मरन्ध्र की अवसानभूमि यहाँ १शान्ति के नाम से कही गई है, क्योंकि ऊपर की सभी शक्तियाँ यहाँ पूर्ण शान्ति (विश्राम) का अनुभव करती हैं। स्वच्छन्दसंग्रह में यह इस तरह से वर्णित है— नाड़ियों के सहारे उठने वाला नाद इस सारे जगत् को भेद कर आधार शक्ति से निकल कर ऊपर सहस्रदल कमल में स्थित शक्ति में लीन हो जाता है। अव्यक्त ध्वनि १. ईश्वरसदाशिवौ वायुतत्त्वात्मकौ-ख. ने. ज. झ. उ.। २. नादान्तो-ख. ने. ज. झ. उ.। ३. विनिर्भिद्य-ख. ने. ज. झ. उ.। १. ब्रह्मरन्ध्र की अवसान भूमि में स्थित शान्ति नामक नाड़ी की चर्चा अन्यत्र देखने को नहीं मिलती। इस प्रसंग में भास्करराय की शान्ति पद की ब्रह्मपरक व्याख्या सम्प्रदाय सम्मत नहीं जान पड़ती।