भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

पृष्ठ 220, कुल 485 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 220

१७० योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः ] 'नाड्यां ब्रह्मबिले लीनस्त्वव्यक्तध्वनिलक्षणः । इति । शक्तिरूर्ध्वशक्तिः, उपरिगतं शक्तितत्त्वम् । तदुक्तमत्रैव— ब्रह्माणी त्वपरा शक्तिर्ब्रह्मणोत्सङ्गगामिनो । द्वारं सा मोक्षमार्गस्य रोधयित्वा व्यवस्थिता ॥ तां भित्त्वा तु वरारोहे ऊर्ध्वशक्तिं परां शिवाम् । शक्तितत्त्वात्मिकां देवीं प्रसुप्तभुजगाकृतिम् ॥ शक्तितत्त्वं समाख्यातं भुवनैरावृतं महत् । इति । शम्भुः२ शिवतत्त्वं शक्तितत्त्वोपरि स्थितम् । तदुक्तमत्रैव—"शिवतत्त्वं समा- ख्यातं तदूर्ध्वं शक्तितत्त्वतः" इति । अमितामितविग्रहाः । एतेऽनन्ता अपरिच्छिन्न- रूपाः, व्योमतत्त्वान्तर्गतत्वात् । तदुक्तमत्रैव—"३शक्तितत्त्वं शिवो व्योम" इति । नादत्रितयबोधनाः । वाग्भवकामराजशक्तिबीजोपरिगतबिन्दुत्रयोपरिगतरोधिनो- त्रितयोर्ध्वं४गतानां नादानां त्रयमेषां क्रमेण बोधकं लक्षकम्, तेन नादत्रितय- बोधनाः । वाग्भवबीजोपरिगतबिन्दू परिवर्तिना नादेन शान्तिः, कामराजबीज- वाला यह नाद ब्रह्मबिल (ब्रह्मरन्ध्र) में स्थित नाडी (शान्ति) में लीन हो जाता है ॥ शक्ति का अर्थ है ऊर्ध्वशक्ति, ऊपर स्थित सहस्रदल कमल में विद्यमान शक्ति । इसका भी वर्णन स्वच्छन्दसंग्रह में मिलता है— ब्रह्मा की गोद में बैठी ब्रह्माणी अपरा शक्ति मानी जाती है। यह मोक्ष के मार्ग के द्वार को रोक कर बैठी रहती है। हे वरारोहे ! इस शक्ति को भेद कर ऊर्ध्वशक्ति के पास पहुँचना चाहिये । यह परा शक्ति सोये हुए सर्प की सी आकृति वाली है। इसी को शक्तितत्त्व भी कहते हैं। यह शक्तितत्त्व अनेकों भुवनों से आवृत है। यह महान् विस्तार वाला है ॥ शम्भु का अर्थ है शिवतत्त्व । यह शक्तितत्त्व के ऊपर स्थित है। इसका भी वर्णन स्वच्छन्दसंग्रह में है—"इसको शिवतत्त्व कहते हैं। यह शक्तितत्त्व से ऊपर है"। शान्ति, शक्ति और शम्भु ये तीनों अपरिमित अनन्त स्वरूपों वाले हैं, क्योंकि इनका अन्तर्भाव व्योमतत्त्व में बताया गया है। जैसा कि स्वच्छन्दसंग्रह में कहा गया है—"शक्तितत्त्व और शिवतत्त्व व्योममय (आकाशमय) हैं"। इन तीनों का स्वरूप तीन नादों से बोधित होता है। वाग्भव, कामराज और शक्ति बीज के ऊपर तीन बिन्दु हैं। इन तीनों के ऊपर, तीनों रोधिनी कलाओं के ऊपर, तीन नाद स्थित हैं। ये तीन नाद ही इनके बोधक हैं। इनमें १. नाड्या-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । २. शम्भुः शिवः-ख. ज. झ. उ. । ३. शिव-ख. ने. । ४. भागगतानां-ख. ने. ज. झ. उ. ।