योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १७१ शिखरवर्तिना नादेन शक्तिः, तार्तीयबीजशिखरवर्तिना नादेन च शिवो व्यज्यत इत्यर्थः ॥४५-४६॥ पूर्वं विद्याया बिन्दुनादमयवासनामुक्त्वेदानीं सर्वमन्त्रमयवासनामपि सोदा- हरणामाह— वागुरामूलवलये सूत्राद्याः कवलीकृताः । तथा मन्त्राः समस्ताश्च विद्यायामत्र संस्थिताः ॥४७॥ “वागुरा मृगबन्धनी” (अ० को० २।१०।२६) । अत्र तु वागुराशब्देन मत्स्य- ग्रहणहेतुर्जालं लक्ष्यते, प्राणिग्रहणसामान्यात् । अन्यथा मूलवलये १सूत्राद्या इत्यनु- पपन्नं स्यात्, मृगबन्धन्या मूलवलयस्याभावात्, रज्जुनिर्मितत्वात् सूत्रादी- नामप्यभावात् । सूत्राद्याः सूत्राणि तन्तवः, आद्यशब्दाज्जालप्रान्ते आयसगुलिकाः प्रोता गृह्यन्ते । यथा लोहमये वलये जालावयवानां तन्तूनां मूलं कवलितम्, तथा समस्तमन्त्राणां मूलभूता२ वैखर्यपि विद्यायामस्यां विश्रान्ता । अतोऽत्र विद्यायां समस्तमन्त्राः स्थिता इत्यर्थः ॥४७॥ से वाग्भव बीज के ऊपर स्थित बिन्दु के ऊपर विद्यमान नाद शान्ति का, कामराज बीज का शिखरवर्ती नाद शक्ति का तथा तृतीय बीज का शिखरवर्ती नाद शिव का व्यंजक है ॥४५-४६॥ विद्यागत बिन्दु और नाद की वासना को बताने के बाद अब उदाहरण के साथ यह बताया जा रहा है कि इसी विद्या में सारे मन्त्र प्रतिष्ठित हैं— वागुरा (जाल) के मूलवलय में जैसे सूत्र आदि जुड़े हुए हैं, उसी तरह से समस्त मन्त्र इस विद्या में स्थित हैं ॥४७॥ अमरकोश के अनुसार पशुओं को फँसाने वाले जाल को वागुरा कहते हैं । प्रस्तुत रूपक में इस शब्द का प्रयोग मछली पकड़ने वाले जाल के लिये किया गया है । प्राणियों को फँसाना दोनों का सामान्य धर्म है । ये प्राणी स्थलचर, नभचर अथवा जलचर भी हो सकते हैं । मूलवलय और सूत्र इन दो शब्दों की सार्थकता के लिये यहाँ वागुरा शब्द का अर्थ मछली पकड़ने वाला जाल किया जायगा, क्योंकि पशुओं को फँसाने वाले जाल में मूलवलय नहीं होता । वह रस्सी से बना रहता है, इसलिये उसमें सूत्र भी नहीं रहते । सूत्र शब्द का अर्थ महीन धागा होता है । आद्य शब्द से जाल के किनारे पिरोई गई लोहे की गोलियाँ गृहीत होती हैं । जैसे लोहे के कड़े में जाल के धागे बँधे रहते हैं, उसी तरह से समस्त मन्त्रों की जननी वैखरी वाणी इस विद्या में जुड़ी हुई है । अतः इस विद्या में समस्त मन्त्र विद्यमान हैं ॥४७॥ १. 'सूत्राद्या' नास्ति—ख. ने. ज. झ. उ. । २. भूतायां वैखरीवि—ख. ने. ज. झ. उ. ।