भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

पृष्ठ 222, कुल 485 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 222

३७२ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः गुरुपदेशक्रमेणायमर्थः संप्राप्यत इत्याह— गुरुक्रमेण संप्राप्तः सम्प्रदायर्थ ईरितः । गुरुक्रमः पारम्पर्यक्रमः, तदुपदेशक्रमेणैव शिवादिविग्रहात् पूर्णात् सर्वकारणकारणात् । ध्वनिरूपं परं सूक्ष्मं शुद्धं सकलतेजसाम् ॥ वाग्रूपं प्रसृतं तत्त्वमुन्मनाशक्तिकेबलम् । अव्यक्तं व्यक्तरूपेण निष्कलं क्रमकारणम् ॥ परानन्दस्वरूपं तत् स्वच्छन्दादिप्रभेदतः । अनुष्टुप्छन्दसा बद्ध्वा प्राह स्वच्छन्दभैरवः ॥ तद्विमृश्य प्रपञ्चेन प्रोवाचानाश्रितेश्वरः । तत्सर्वं शान्त्यतीतांशे कथितं बहुविस्तरम् ॥ अब भगवान् शिव बताते हैं कि इस विषय का ज्ञान गुरु-परम्परा से ही प्राप्त हो सकता है— गुरुओं की सम्प्रदाय परम्परा से प्राप्त इस अर्थ को सम्प्रदायर्थ के नाम से कहा जाता है ॥ गुरु क्रम से, अर्थात् गुरु-परम्परा के क्रम से, एक गुरु के द्वारा दूसरे के कान में उप- दिष्ट ज्ञान की परम्परा से ही इस सम्प्रदायार्थ का ज्ञान हो सकता है। स्वच्छन्दभैरव में यह गुरु-परम्परा इस तरह से वर्णित है— सभी कारणों के कारण परिपूर्ण स्वरूप शिव से, जो कि शिव से लेकर पृथ्वी पर्यन्त ३६ तत्त्वों का स्वरूप धारण करते हैं, सभी प्रकाशात्मक पदार्थों के भी प्रकाशक, शुद्ध शब्दब्रह्म स्वरूप, परम सूक्ष्म ध्वनिरूप, परा वाणीमय तत्त्व का प्रसार होता है। प्रथमतः इसकी स्थिति उन्मना में ही रहती है। यह अव्यक्त अवस्था में स्थित ज्ञान क्रमशः व्यक्त होता है, निष्कलावस्था से निकल कर यह कालकृत क्रम को अभिव्यक्त करता है। परम आनन्द की अभिव्यक्ति का साधन यह ज्ञान स्वयं भी परमानन्द स्वरूप है। स्वच्छन्दभैरव ^१स्वच्छन्द आदि शास्त्रों के रूप में अनुष्टुप् छन्द में निबद्ध कर इस ज्ञान का उपदेश करते हैं। इसको भलीभांति समझ कर अनाश्रित शिव अपनी शान्त्य- तीत कला को इस सारे ज्ञान का विस्तार से उपदेश देते हैं। इसी ज्ञान को अपने पर १. स्वच्छन्द आदि ६४ भैरव तन्त्रों के नाम तन्त्रालोक की जयरथ निर्मित विवेक नामक टीका (भा० १, पृ० ४२-४३) में उद्धृत श्रीकण्ठीसंहिता में मिलते हैं। वैरोचन शिवाचार्य के प्रतिष्ठालक्षणसारसमुच्चय (२।११६-१२०) में केवल ३२ भैरवागमों के ही नाम हैं। वहाँ भी पहला नाम स्वच्छन्द ही है।