भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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पृष्ठ 223

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १७३ तदेतत् पररूपेण सदाख्येन शिवेन तु । मन्त्रसिंहासनस्थेन पञ्चमन्त्रशरीरिणा ॥ १कौलिकादिषु सिद्धान्तपूर्वाद्यखिलमागमम् । साधनं पुरुषार्थस्य कौलिकं चातिकौलिकम् ॥ असंख्यमप्रमेयं च शिवेन कथितं पुरा । तज्ज्ञानमीश्वरे दत्तमीश्वरेण शिवेच्छया ॥ विद्यायामादितो दत्तं विद्येशाय च तत्त्वतः । विद्येश्वरैण दत्तं तज्ज्ञानं नियमितं क्रमात् ॥ दत्तं रुद्रेभ्य एतच्च गुणतत्त्वेश्वराय च । श्रीकण्ठायेश्वरेणैव दत्तं तेन ततः परम् ॥ श्रीकण्ठेन २प्रधानादिदशरुद्रान्तिकं क्रमात् । दीक्षयित्वा विधानेन दत्तं वै ज्ञानमम्बिके ॥ दीक्षयित्वाऽभिषिच्याथ श्रीकण्ठेन मयाऽपि च । दत्तं श्रोदक्षिण ३सर्वं सर्वकामार्थसाधनम् ॥ रूप में स्थित मन्त्ररूपी सिंहासन पर विराजमान पंचमन्त्रतनु सदाशिव सिद्धान्त, पूर्व, कौलिक आदि विभागों में विभक्त कर समस्त शास्त्रों का उपदेश करते हैं, जो कि समस्त पुरुषार्थों के साधक हैं। कौलिक, अतिकौलिक आदि असंख्य भेदों में विभक्त इस अद्भुत ज्ञान का उपदेश पहले शिव ने ईश्वर को किया था। शिव की इच्छा से प्रेरित ईश्वर ने इस ज्ञान का उपदेश सारे रहस्य को समझाते हुए शुद्धविद्या और विद्येशों को किया। विद्येश्वरों ने गुरु-परम्परा से प्राप्त इस नियमित ज्ञान को रुद्रों को और गुण- तत्त्वों के ईश्वरों को दिया। ईश्वर ने यह ज्ञान श्रीकण्ठ को दिया और तब श्रीकण्ठ ने प्रधान १ आदि दस रुद्रों के पास क्रम से इस ज्ञान को पहुँचाया। हे अम्बिके ! विधि- पूर्वक दीक्षा देने के बाद ही इस ज्ञान का उपदेश किया गया था। श्रीकण्ठ ने और स्वयं मैंने (भैरव) भी दीक्षित और अभिषिक्त शिष्यों को ही सभी कामनाओं और प्रयोजनों की सिद्धि के लिये इस ज्ञान का उपदेश किया है ॥ १. कालिकादिषु-ख. ने. ज. उ. । २. प्रदानादि-ख. ने. ज. उ. । ३. पूर्वं-ने. ।

  1. अट्ठाईस सिद्धान्त शैवागमों के प्रवर्तक प्रणव आदि दस शिवों तथा अनादि आदि अठारह रुद्रों की नामावली किरणागम (वि० १०।४-२७) में मिलती है। स्वच्छन्दतन्त्र (१०।११९६-११९९) में भी ये नाम मिलते हैं। लगता है प्रणव नाम ही लिपिदोष के कारण यहाँ प्रधान बन गया है। प्रणव शिवभेद के अन्तर्गत हैं, रुद्रभेद के नहीं।