योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७४ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः इति स्वच्छन्दभैरवोक्तरीत्या मयोदितः स्वगुरुपारम्पर्योपदेशकमेणैव विषम- पदैरसम्प्रदायविद्भिर्दुष्परिज्ञातार्थश्लोकैः पूर्वोक्तरीत्या कथितः सम्प्रदायार्थो विना गुरूपदेशं व्युत्पत्तिबलेन पुराणादिश्लोकवद् ग्रहीतुमशक्य इत्यर्थः ॥ अथ क्रमप्राप्तं निगर्भार्थमाह- निगर्भोऽपि महादेवि शिवगुर्वात्मगोचरः ॥४८॥ निगर्भो² निगर्भार्थः । शिवो वाङ्मनसागोचरः सकल-निष्कल-सकलनिष्कल- भेदविशेष्यः, [³आत्मादिसकलगुणाभिषस्तादृशमेव स्वात्मतया वीक्षमाणो विदिताखिला- गमार्थो गुरुः, तादृशगुरुकरुणकटाक्षपातविगलितसकलपाशविशद]चिद्रूपानुभवः ⁴[शिष्य] आत्मा । तदुक्तं “स्वच्छन्दसंग्रहे— इस प्रकार मेरे द्वारा बताई गई गुरु-परम्परा के क्रम से ही यह अर्थ प्राप्त होता है, इसलिये सम्प्रदाय परम्परा से प्राप्त इस अर्थ को सम्प्रदायार्थ कहा जाता है । इस गुरु-परम्परा के बिना निगूढ़ अर्थ वाले शब्दों का प्रयोग कर रचे गये इन श्लोकों का अर्थ पुराण आदि के श्लोकों की तरह व्याकरण आदि की व्युत्पत्ति के सहारे नहीं लगाया जा सकता ॥ अब क्रमप्राप्त ¹निगर्भार्थ का वर्णन करते हैं— हे महादेवि ! शिव, गुरु और आत्मा में एकता का अनुसन्धान करना ही निगर्भार्थ कहलाता है ॥४८॥ श्लोक में निगर्भ शब्द से निगर्भार्थ का ग्रहण किया जाता है । वाणी और मन के अगोचर सकल, निष्कल और सकलनिष्कल भेदों वाला परम तत्त्व है शिव । आत्मा² आदि समस्त गुणों से अभिहित होने वाला, अपने को इस परम तत्त्व से अभिन्न मानने वाला, उसको अपना ही स्वरूप समझने वाला और समस्त शास्त्रों के अर्थ को जानने वाला है गुरु । ऐसे गुरु की कृपादृष्टि पड़ने से जिसके सारे पाशजाल छिन्न-भिन्न हो गये हैं और जिसके ज्ञानचक्षु खुल गये हैं, ऐसा शिष्य यहाँ आत्म-शब्द से अभिहित है । स्वच्छन्दसंग्रह इसमें प्रमाण है— १. निगर्भार्थो-क. ग. ज. । २. 'निगर्भो' नास्ति-क. ग. ज. । ३. 'आत्मादि.... विशद' नास्ति-ख. ग. ज. ब. उ. । ४. 'शिष्य' नास्ति-ख. ग. ने. ज. उ.। ५. महास्व- ख. ग. ने. ज. उ. ।
- यहाँ ४८ से ५१ श्लोक तक निगर्भार्थ का स्वरूप बताया गया है ।
- यहाँ दीपिका का सूक्ष्माक्षरों में दिया गया पाठ केवल क. मातृका में मिलता है । गुरु के लक्षण के प्रसंग में दिये गये "आत्मादिसकलगुणाभिषः" इस अंश का अभिप्राय अस्पष्ट सा लगता है ।