योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १७५ तत्त्वातीतं वरारोहे वाङ्मनोऽतीतगोचरम् । १अनिष्कलं चासकलं नीरूपं निर्विकल्पकम् ॥ निर्द्वन्द्वं परमं तत्त्वं शिवाख्यं परमं पदम् । इति । सर्वविद्याविदाचार्यो मोक्षधर्मपरायणः । गुरुवक्त्रप्रयोगेण पशुं तत्रैव योजयेत् ॥ इति । गुरुः— गृणीते तत्त्वमात्मीयमात्मोकृतजगत्त्रयम् । उपायोपेयरूपाय शिवाय गुरवे नमः ॥ इत्युक्तलक्षणः । एवंविध२शिवगुर्वात्मैक्यगोचरानुसन्धानात्मको निगर्भार्थ इत्यर्थः ॥ ४८ ॥ ननु३ केन प्रकारेण शिवगुर्वात्मनामैक्यमनुसन्धीयत इत्यत आह— तत्प्रकारं च देवेशि दिङ्मात्रेण वदामि ते । शिवगुर्वात्मनामैक्यानुसन्धानात् तदात्मकम् ॥ ४९ ॥ हे वरारोहे ! यह शिव नामक परम पद तत्त्वातीत है, अतः वाणी और मन का विषय नहीं बन सकता । यह अनिष्कल, असकल, रूपरहित, निर्विकल्पक, निर्द्वन्द्व परम तत्त्व है ॥ मोक्ष की प्राप्ति के लिये धर्म के आचरण में लगे हुए सभी विद्याओं में निष्णात १आचार्य को चाहिये कि अपने पशुप्राय शिष्य को भी गुरुमुख से प्राप्त ज्ञान का उपदेश कर परम तत्त्व की तरफ उन्मुख कर दे ॥ गुरु के स्वरूप को बताने वाले श्लोक की व्याख्या पहले (२।२६) की जा चुकी है। इस तरह से शिव, गुरु और आत्मा की एकता की खोज में प्रवृत्त कराने वाला अर्थ ही निगर्भार्थ के नाम से यहाँ प्रतिपादित है ॥४८॥ अब इनकी एकता का अनुसन्धान कैसे किया जा सकता है, इसका प्रकार बताते हैं— हे देवेशि ! शिव, गुरु और आत्मा की एकता के अनुसन्धान की विधि अब मैं संक्षेप में बता रहा हूँ ॥४९ १. सुनिष्कलं वा सक-ख. ज. झ. उ. । २. विधगुर्वात्मशिष्यपरानु-ख. ने. ज. उ. । ३. 'ननु' नास्ति-ख. ने. ज. उ. ।
- यहाँ उद्धृत तीन वचनों में से पहले स्वच्छन्दसंग्रह के वचन में शिव की चर्चा स्पष्ट है। दूसरे वचन में, जिसके आकर के विषय में कोई निश्चित सूचना नहीं है, आचार्य द्वारा अज्ञ जीव के उद्धार की चर्चा है। तीसरा वचन दीपिका में अनेक स्थानों पर अभियुक्तवचन के नाम से उद्धृत है। इसमें गुरु की चर्चा है। यहाँ शिव और गुरु के बाद आत्मा (पशु) की चर्चा आनी चाहिये थी, किन्तु पशु की पराधीनता को दिखाने के लिये यहाँ आचार्य की मुख्यता से काम लिया गया है।