भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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१७६ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः तत्प्रकारं शिवगुर्वात्मनामैक्यानुसन्धानात्मकम्, दिङ्मात्रेण वदामि न¹ विशेषप्रतिपादनप्रपञ्चेनेत्यर्थः ॥ ४९ ॥ तत्प्रकारमाह— निष्कलत्वं शिवे बुद्ध्वा तद्रूपत्वं गुरोरपि । तन्निरीक्षणसामर्थ्यादात्मनश्च शिवात्मताम् ॥५०॥ भावयेद् भक्तिनम्रः सन् शङ्कोन्मेषाकलङ्कितः । कला अवयवाः, तद्रहितत्वं निष्कलत्वं निरवयवत्वम्, शिवे पूर्वोक्तलक्षणे, बुद्ध्वा, गृणीते तत्त्वमात्मीयमात्मीकृतजगत्त्रयम् । उपायोपेयरूपाय शिवाय गुरवे नमः ॥ इत्यभियुक्तवचनोकरीत्या निष्कलं ³निष्कलात्मकं शिवं स्वात्मतया वीक्ष्य- माणस्यैव गुरुत्वाद् गुरोरपि तद्रूपत्वं शिवात्मकत्वं बुद्ध्वा, तन्निरीक्षणसामर्थ्यात् शिव, गुरु और आत्मा की एकता के अनुसन्धान के प्रकार को अब मैं संक्षेप में बता रहा हूँ । इस विषय का विशेष विस्तार यहाँ नहीं किया जा रहा है ॥४९॥ अब उसकी संक्षिप्त विधि का वर्णन किया जा रहा है— शिव में निष्कलता को जान लेने के बाद गुरु में भी निष्कलात्मक शिवता को पहचानना चाहिये । इसके बाद गुरु की कृपादृष्टि से प्राप्त ज्ञान के सहारे सभी प्रकार की शंकाओं से मुक्त होकर शिष्य भक्तिश्रद्धापूर्वक अपने में भी शिवता को पहचानने का प्रयत्न करे ॥५०-५१॥ कला का अर्थ है अवयव । कलाओं से जो रहित है, वह है निष्कल, निरवयव । अभी ऊपर जो शिव का स्वरूप बताया गया है । वह निष्कल है, ऐसा जान लेने के बाद किसी अभियुक्त के वचन में, जिसकी व्याख्या पहले (२।२६) की जा चुकी है, बताये गये लक्षणों वाले गुरु में भी निष्कल शिवात्मता की बुद्धि को जगाना चाहिये । निष्कला- त्मक शिव को स्वात्मस्वरूप में देखने वाला ही गुरु हो सकता है, अतः इस प्रकार के गुरु में, शिवात्मता की अनुभूति शिष्य के लिये आवश्यक है । इस तरह के शिष्य के विषय में किसी ने कहा है— १. नाशेषविशेषेण । २. 'किं' नास्ति । ३. निष्कलात्मकं नास्ति । ४. 'शिवे' नास्ति । ५. चेत् । ६. तु ।