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योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

१७६ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः तत्प्रकारं शिवगुर्वात्मनामैक्यानुसन्धानात्मकम्, दिङ्मात्रेण वदामि न¹ विशेषप्रतिपादनप्रपञ्चेनेत्यर्थः ॥ ४९ ॥ तत्प्रकारमाह— निष्कलत्वं शिवे बुद्ध्वा तद्रूपत्वं गुरोरपि । तन्निरीक्षणसामर्थ्यादात्मनश्च शिवात्मताम् ॥५०॥ भावयेद् भक्तिनम्रः सन् शङ्कोन्मेषाकलङ्कितः । कला अवयवाः, तद्रहितत्वं निष्कलत्वं निरवयवत्वम्, शिवे पूर्वोक्तलक्षणे, बुद्ध्वा, गृणीते तत्त्वमात्मीयमात्मीकृतजगत्त्रयम् । उपायोपेयरूपाय शिवाय गुरवे नमः ॥ इत्यभियुक्तवचनोकरीत्या निष्कलं ³निष्कलात्मकं शिवं स्वात्मतया वीक्ष्य- माणस्यैव गुरुत्वाद् गुरोरपि तद्रूपत्वं शिवात्मकत्वं बुद्ध्वा, तन्निरीक्षणसामर्थ्यात् शिव, गुरु और आत्मा की एकता के अनुसन्धान के प्रकार को अब मैं संक्षेप में बता रहा हूँ । इस विषय का विशेष विस्तार यहाँ नहीं किया जा रहा है ॥४९॥ अब उसकी संक्षिप्त विधि का वर्णन किया जा रहा है— शिव में निष्कलता को जान लेने के बाद गुरु में भी निष्कलात्मक शिवता को पहचानना चाहिये । इसके बाद गुरु की कृपादृष्टि से प्राप्त ज्ञान के सहारे सभी प्रकार की शंकाओं से मुक्त होकर शिष्य भक्तिश्रद्धापूर्वक अपने में भी शिवता को पहचानने का प्रयत्न करे ॥५०-५१॥ कला का अर्थ है अवयव । कलाओं से जो रहित है, वह है निष्कल, निरवयव । अभी ऊपर जो शिव का स्वरूप बताया गया है । वह निष्कल है, ऐसा जान लेने के बाद किसी अभियुक्त के वचन में, जिसकी व्याख्या पहले (२।२६) की जा चुकी है, बताये गये लक्षणों वाले गुरु में भी निष्कल शिवात्मता की बुद्धि को जगाना चाहिये । निष्कला- त्मक शिव को स्वात्मस्वरूप में देखने वाला ही गुरु हो सकता है, अतः इस प्रकार के गुरु में, शिवात्मता की अनुभूति शिष्य के लिये आवश्यक है । इस तरह के शिष्य के विषय में किसी ने कहा है— १. नाशेषविशेषेण । २. 'किं' नास्ति । ३. निष्कलात्मकं नास्ति । ४. 'शिवे' नास्ति । ५. चेत् । ६. तु ।

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १७७ गुरोराज्ञा१प्रभावेण केवलं निष्प्रपञ्चकम् । निरीक्ष्यैतादृशाद्वैतचिदम्बुधिसुधार्द्रया ॥ यथा विशुद्धः २शिष्योऽपि लीयेतानन्दचिद्धनः । इत्यादिवाक्योक्तरीत्या ३तस्य गुरोर्निरीक्षणं निखिलपाशच्छेदनसमर्थम् । तत्सा- मर्थ्यंवशाद् विशुद्धः शिष्यो भक्तिनम्रः प्रत्युत्पन्नपरमशिवाहंभावनावेशः प्रत्यह- मादरनैरन्तर्यपट्वभ्यासवशात् शङ्कोन्मेषाकलङ्कितः । शङ्का संकोचः संसारि- त्वाभिमानः, तस्योन्मेषः पुत्रभार्यादिबाह्यार्थाभिरतिः, तेनाकल्ङ्कितो विगताहं- ममताभिमानः, आत्मनश्च शिवात्मतां भावयेत् । जपाकुसुमसामीप्यविगमात् स्फटिकस्य नैर्मल्यमिवात्माद्वैतभावनावभावितगुरुकटाक्षपातपाटितपाशपटलः परि- पूर्ण४स्वभावः स्यादित्यर्थः ॥ ५०-५१ ॥ गुरु की आज्ञा के प्रभाव से, अर्थात् गुरु की कृपादृष्टि से प्राप्त ज्ञान की सहायता से शिष्य केवल निष्प्रपञ्च स्वात्मस्वरूप को पहचान लेता है । गुरु जब इस तरह की अद्वैत ज्ञानरूपी समुद्र से निकली सुधा (अमृत) के समान करुणा भरी दृष्टि से शिष्य को देखता है, तो सभी प्रकार के मलों से छुटकारा मिल जाने से विशुद्ध स्वभाव वाला शिष्य भी अपने आनन्दमय चिद्धन स्वरूप में लीन हो जाता है ॥ स्पष्ट है कि ऐसे गुरु की कृपादृष्टि सभी प्रकार के पाशों के उन्मूलन में समर्थ है । गुरु के उस सामर्थ्य से विशुद्ध स्वभाव का हुआ शिष्य भक्तिपूर्वक विनम्र भाव से मैं परमशिव स्वरूप ही हूँ, इस प्रकार की अपने में अभिव्यक्त भावना को प्रतिदिन निरन्तर१ आदरपूर्वक गहरे अभ्यास के द्वारा जगाये रखने में समर्थ होकर शंका के उन्मेष से अस्पृष्ट रह कर स्वयं अपनी भी शिवरूप में भावना करे । शंका का अर्थ है संकोच, अपने को सांसारिक जीव के संकुचित स्वरूप में देखना । जब यह संकोच प्रबल हो जाता है, तो सांसारिक जीव पुत्र, भार्या आदि बाह्य विषयों में अनुरक्त हो जाता है । शिष्य को चाहिये कि वह इस शंका के उन्मेष से अपने को अस्पृष्ट रखे, अहन्ता और ममता के अभिमान को छोड़ दे और अपनी शिवात्मता को भावना को जगावे । जपा पुष्प के हटा लेने पर जैसे स्फटिक निर्मल हो जाता है, उसी तरह अद्वैत भावना के अभ्यास और गुरु की कृपादृष्टि के पड़ने से शिष्य का सारा पाशजाल छिन्न-भिन्न हो जाता है तथा उसका परिपूर्ण स्वभाव, शिवभाव प्रकाशित हो जाता है । इस प्रकार शिव में, गुरु में और अपने में भी शिवात्मता दृष्टि की भावना का निरन्तर अभ्यास ही निगर्भाथ कह- लाता है ॥५०-५१॥ १. पालनेन-ख. ने. ज. उ. । २. शिष्यस्तु-ने. ज. झ. उ. । ३. 'तस्य' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. स्वभावं पश्येदि-क. । १. इस प्रसंग में पातंजल योग दर्शन के- "तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यासः, स तु दीर्घकाल- नैरन्तर्यसत्कारासेवितो दृढभूमिः" (१।१३-१४) ये दो सूत्र स्मरणीय हैं ।

१७८ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः १अथ क्रमप्राप्तं कौलिकार्थमाह— कौलिकं कथयिष्यामि चक्रदेवतयोरपि ॥५१॥ विद्यागुर्वात्मनामैक्यं कौलिकं कौलि२कार्थम्, कथयिष्यामि । चक्रदेवतागुरुविद्यासाधकानामैक्यानु- सन्धानं कौलिकार्थ इत्यर्थः । अक्षरार्थः ३स्फुटः ॥५१॥ तत्प्रकारमाह— तत्प्रकारः प्रदर्श्यते । “तत्प्रकारः प्रदर्श्यते” इत्यादिना “इत्येवं कौलिकार्थस्तु कथितो वीर- वन्दिते” (२।६८) इत्यन्तेन ॥ ५२ ॥ ४आदौ विद्याचक्रयोरैक्यमाह— लकारैश्चतुरस्राणि वृत्तत्रितयसंयुक्तम् ॥५२॥ सरोरुहद्वयं शाक्तेरग्नीषोमात्मकं प्रिये । हृल्लेखात्रयसम्भूतैरक्षरैर्नवसंख्यकैः ॥५३॥ अब क्रमप्राप्त १कौलिकार्थ को समझाते हैं— अब मैं कौलिकार्थ का वर्णन करूँगा । चक्र, देवता, विद्या, गुरु और स्वयं साधक की भी एकता का अनुसन्धान ही कौलिकार्थ है ॥५१॥ कौलिक शब्द यहाँ कौलिकार्थ का ज्ञापक है । इसका अब मैं वर्णन करूँगा । चक्र, देवता, गुरु, विद्या और साधक इन पाँचों में एकता का अनुसन्धान ही कौलिकार्थ है । इन सभी अक्षरों का अर्थ स्पष्ट है ॥५१॥ अब उसकी पद्धति बताते हैं— चक्र आदि में एकता का अनुसन्धान कैसे किया जाय ? अब इसकी विधि बताते हैं ॥ आगे के ५१-६८ श्लोकों में इसकी विधि बताई गई है ॥ पहले विद्या और चक्र की एकता बताई जा रही है— विद्यागत लकार बीजों से चतुरस्रों की, शाक्त (सकार) बीजों से वृत्तत्रितय और तदन्तर्गत षोडशदल तथा अष्टदल नामक पद्मों की अभिव्यक्ति होती है । हे प्रिये ! ये दोनों पद्म अग्नीषोमात्मक हैं । तीन हृल्लेखाओं में स्थित तीन- १. अनन्तरं क्रम-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । २. काख्यम्-झ. । ३. स्पष्टः-ने. ज. झ. । ४. तत्रादौ-ज. ।

  1. कौलिकार्थ का निरूपण यहाँ ५१ से ६८ श्लोक पर्यन्त हुआ है ।

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १७९ बिन्दुत्रययुतैर्जातं नवयोन्यात्मकं प्रिये । लकारैः विद्याबीजत्रयगतैः । चतुरस्राणि भूगृहाणि, "पृथिवीमण्डलं पीतं चतु- रस्त्रं सुशोभनम्" इति स्वच्छन्दसंग्रहोक्तरीत्या भूमण्डलस्य चतुरस्ररूपत्वाद् भूतत्त्ववाचकैर्लकारैश्चतु१रस्रत्रयं जातमित्यर्थः । शाक्तैः [२सकारैः । तदुक्तं चतुः- शतीशास्त्रे—"मादनं तदधः शक्तिः" (१।१११) इति । हंसपारमेश्वरेऽप्युक्तम्— "शिवो हकार इत्युक्तः सकारः शक्तिरुच्यते" इति । विद्याबीजत्रयगतैः] सकारैर्वृत्त- ३त्रितयसंयुतं सरोरुहद्वयम् । चतुरस्रान्तरेण एकं वृत्तम्, तद्वृत्तान्तः षोडशदलं सोमात्मकं पद्मम् । तदन्तश्च द्वितीयं वृत्तम्, तदन्तश्चाष्टदलं पद्ममग्न्यात्मकम् । तदन्तश्च तृतीयं वृत्तम् । एवं वृत्त३त्रितयसंयुतमग्नीषोमात्मकं सरोरुह- द्वयम् । "जलबिम्बं सुवृत्तं च श्वेतं४ वै पद्मलाञ्छितम्" इति स्वच्छन्द- संग्रहोक्तरीत्या जलबिम्बस्य पद्मलाञ्छितवृत्तरूपत्वाज्जलतत्त्ववाचकैः सकारै- र्वृत्तत्रयसंयुतं सरोरुहद्वयं जातमित्यर्थः । बीजत्रयशिखरगतहृल्लेखात्रायावयव- तीन, अर्थात् नौ अक्षरों से, जो कि तीन बिन्दुओं से सुशोभित हैं, हे प्रिये ! नौ योनियोंवाला चक्र निष्पन्न होता है ॥५२-५४॥ विद्या के तीन बीजों में स्थित तीन लकारों से तीन चतुरस्र आकार की रेखाओं वाले भूगृह चक्र की निष्पत्ति होती है । स्वच्छन्दसंग्रह में पृथिवी-मण्डल को सुन्दर चतुरस्र आकार वाला और पीत वर्ण का बताया गया है । भूमण्डल चतुरस्र आकार वाला है, अतः पृथिवी तत्त्व के वाचक तीन लकार अक्षरों से तीन चतुरस्रों की अभिव्यक्ति होती है । [चतुःशती शास्त्र (१।१११) में शक्ति शब्द से सकार का ग्रहण किया गया है, अतः यहाँ भी शाक्त पद का अर्थ सकार हो है । हंसपारमेश्वर तन्त्र में भी शिव को हकार और शक्ति को सकार कहा गया है ।] विद्या के तीन बीजों में तीन सकार हैं । इन सकारों से तीन वृत्तों के साथ दो पद्द्मों की निष्पत्ति मानी जाती है । चतुरस्र के बाद एक घेरा है । इस वृत्त (गोलाई) में षोडशदल सोमात्मक पद्म स्थित है । इसके बाद दूसरा घेरा है । इसके भीतर अष्टदल वह्न्यात्मक पद्म विद्यमान है । इसके बाद तीसरा घेरा है । इस तरह से तीन वृत्तों से संवलित अग्नीषोमात्मक दो पद्द्मों की निष्पत्ति विद्यागत तीन सकारों से होती है । स्वच्छन्दसंग्रह में जलबिम्ब को मण्डलाकार श्वेत वर्ण और पद्म से संवलित माना गया है । तदनुसार पद्म से संयुक्त वृत्ताकार जलतत्त्व के वाचक तीन सकारों से वृत्तत्रय से संवलित दो पद्द्मों की निष्पत्ति हुई है, ऐसी भावना करनी चाहिये । तीन बीजों के शिखर भाग में तीन हृल्लेखाएं विद्यमान हैं । इन हृल्लेखाओं के अवयवभूत अक्षर हैं हकार, रेफ और ईकार । तीन बीजों की तीन हृल्लेखाओं में मिलकर नौ अक्षर १. रस्रं जात-ख. ने. ज. ड. । २. 'सकारैः.....बीजत्रयगतैः' नास्ति-ख. ने. जं. ब. ड. । ३. त्रय-ने. ज. ड. । ४. ज्ञेयं-ख. ने. ज. ड. ।

१८० योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः भूतैरक्षरैर्हंकाररेफेकाराख्यैर्बिन्दुत्रययुतैर्नवसंख्यात्मकैर्नवयोन्यात्मकं चक्रं जात- मित्यर्थः ॥५२-५४॥ ननु पद्मद्वयानन्तरं चतुर्दशारदशारद्वयात्मकचक्र१त्रयस्य कथने युक्ते २किमिति तदुल्लङ्घ्य नवयोनिचक्रं ३कथितम् ? उच्यते—नवयोनिचक्रस्योपरिष्टात् प्रस्तारे कृते ४सति तिसृभिः शक्तिभिर्वह्निभिश्च द्विदशचतुर्दशकोणात्मकं चक्रत्रयं जातम्, अतो नवयोनिचक्रानन्तरमेतच्चक्रत्रयं जायत इत्येतन्मनसि निधायाह— मण्डलत्रययुक्तं तु चक्रं शक्त्यनलात्मकम् ॥५४॥ व्योमबीजत्रयेणैव प्रमातृत्रयान्वितम् । इच्छाज्ञानक्रियारूपं५मदनत्रयसंयुतम् ॥५५॥ सदाशिवासनं देवि महाबिन्दुमयं परम् । इत्थं ६मन्त्रात्मकं चक्रं मण्डलत्रययुक्तं तु ७वृत्तत्रयान्तर्गतशक्त्यनलात्मकं चक्रम् । नवयोनिचक्रस्यो- परिष्टात् प्रस्तारे कृते सति तिसृभिः शक्तिभिरनलैश्च त्रिभिर्निष्पन्नत्वा८च्चतु- हो जाते हैं। तीन बिन्दुओं से संयुक्त इन नौ संख्या के अक्षरों में नवयोनिमय चक्र की निष्पत्ति माननी चाहिये ॥५२-५४॥ यहाँ शंका उठती है कि दो पद्मों के बाद चतुर्दशार, बाह्यदशार और अन्तर्दशार चक्रों की निष्पत्ति होती है, उन्हीं का वर्णन यहाँ पहले होना चाहिये। ऐसा न कर नवयोनि- चक्र का वर्णन कैसे कर दिया गया ? इसका समाधान यह है कि नवयोनिचक्र का जब आगे विस्तार होता है, तो उसी में तीन शक्तियों और तीन वह्नियों के मिलने से दो दशारचक्रों तथा चतुर्दशार चक्र की निष्पत्ति होती है, अतः ये तीन चक्र नवयोनिचक्र के बाद ही निष्पन्न होते हैं, इस अभिप्राय की सूचना देने के लिये यहाँ ऐसा कहा गया है— शक्तित्रिकोण और वह्नित्रिकोण से निष्पन्न तीन मण्डलों (वृत्तों) से अलंकृत चक्र की उत्पत्ति विद्यागत तीन व्योमबीजों (हकार) से होती है। तीन प्रमा- ताओं से संवलित सदाशिवासन की उत्पत्ति हे देवि ! इच्छा, ज्ञान और क्रिया- रूप तीन ककारों से और महाबिन्दु से होती है। इस तरह से यह पूरा चक्र मन्त्रात्मक है ॥५४-५६॥ शक्तित्रिकोण और वह्नित्रिकोण से बना चक्र तीन वृत्तों के अन्तर्गत है, अर्थात् नवयोनिचक्र का जब आगे विस्तार करेंगे तो तीन शक्तित्रिकोणों और तीन वह्नि- १. त्रितयस्य-क. ग. । २. 'किमिति' नास्ति-क. ग. । ३. कथं कथ्यत इति चेत्- क. ग. । ४. 'सति' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. रूपं-ङ. ज. झ उ. । ६. मन्त्रमयं-ख. ने. च. छ. झ. । ७. 'वृत्त''''चक्रम्' नास्ति-ख. ने. ज. ब. उ. । ८. -त्वाद्विदशचतु-क.

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १८१ दंशाररादिचक्रत्रयं व्योमबीजत्रयेणैव हकारत्रयेणैव, हकारस्य व्योमवाचकत्वात् । हृल्लेखात्रये हकारत्रयं गतम्, शिष्टेन हकारत्रयेण चतुर्दशारादिचक्रत्रयं जात- मित्यर्थः । प्रमातारस्त्रिविधा¹ उक्तरूपा अशुद्धशुद्धमिश्रात्मानः, तेषां त्रयेणान्वितम् । पश्चात् शिवानुग्रहतो मलकर्मविपाकात् पृथिव्यप्तेजोवाय्वधिपतीनां² तेषां त्रयेण व्यष्ट्या³ समष्ट्या चेदमन्वितं प्राप्तम् । तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे— मलादीनामपाके तु सामान्यानुग्रहो भवेत् । आधिकारिकमैश्वर्यं शिवानुग्रहमात्रतः ॥ पशवस्त्रप्रकारास्तु प्राप्नुयुः परमेश्वरि । ये⁴ पक्वमलकर्माणस्तान् किञ्चिदनुगृह्य च ॥ जलतत्त्वादितत्त्वानां मध्ये लोकेश्वरास्त्रिधा । इति । इच्छाज्ञानक्रियाशक्तिप्रधानप्रमातृत्रयरूपाणां त्रयाणां मादनानां ककाराणां त्रयेण संयुक्तं संमिश्रितं सदाशिवासनं पृथिव्यादिवायुतत्त्वान्तचतुस्तत्त्वाधिपतिभि- त्रिकोणों के मिलने से तीन चक्रों की निष्पत्ति होती है। चतुर्दशार, बाह्यदशार और अन्तर्दशार नामक इन तीन चक्रों की उत्पत्ति तीन व्योमबीजों (हकारों) से होगी। हकार को व्योम (आकाश) का वाचक माना जाता है। तीन हृल्लेखाओं के हकारों के अतिरिक्त विद्यागत बीजों में भी तीन हकार हैं। हृल्लेखागत बीजों से नवयोनि चक्र की निष्पत्ति ऊपर बता दी गई है। अब बचे हुए इन तीन हकारों से चतुर्दशार आदि तीन चक्रों की निष्पत्ति यहाँ बताई गई है। अशुद्ध, शुद्ध और मिश्र नामक तीन प्रमाताओं का वर्णन पहले (२।४३) किया जा चुका है। इन तीनों से यह अन्वित (संयुक्त) है। इन तीनों की व्यष्टि और समष्टि को लेकर इनके चार रूप हो जाते हैं। शिव की कृपादृष्टि का उन्मीलन होने के बाद मल और कर्म का परिपाक हो जाने पर ये ही पृथिवी, जल, तेज और वायु तत्त्वों के अधि- पति (स्वामी) हो जाते हैं। स्वच्छन्दसंग्रह में यह विषय इस तरह से वर्णित है— मल आदि का परिपाक न होने पर ईश्वर का अनुग्रह परिपूर्ण नहीं होता। हे परमेश्वरि ! तीनों प्रकार के पशु शिव का अनुग्रह होने पर ही आधिकारिक ऐश्वर्य को प्राप्त कर सकते हैं। जिनके मल और कर्म परिपक्व हो गये हैं, ऐसे उक्त पशुओं को ईश्वर जल आदि तत्त्वों के मध्य में त्रिविध लोकेश्वरों के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं ॥ इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्ति-प्रधान तीन प्रमाताओं को लक्षित करने वाले तीन मादन (ककार) अक्षरों से संयुक्त सदाशिवासन पृथिवी से वायु तत्त्व पर्यन्त चार तत्त्वों १. त्रिधा-ख. ने. ज. उ. । २. पतयः-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. व्यष्टिसमष्टित्यां ४. सुस्नात इति प्राक्तन पाठः

१८२ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः ब्रह्माविष्णुरुद्रेश्वरैश्चतुर्भिः पादरूपेण धृतं पञ्चमभूताकाशाधिपतिसदाशिव- रूपपञ्चमयासनम् । महाबिन्दुमयं परम्, परशिवरविकरनिकरे प्रतिफलति विमर्शदर्पणे विशदे । प्रतिरुचिरुचिरे कुड्ये चित्तमये निविशते महाबिन्दुः ॥ (श्लो० ४) इति कामकलाविलासोक्तरीत्या परशिवप्रतिबिम्बमहाबिन्दात्मकं परमुत्कृष्टम्, शिवशक्त्योरधिवासयोग्यत्वात् । तदुक्तं ज्ञानदीपविमर्शिन्याम्—ओड्याणपीठमध्ये कदम्बवनान्तः श्रीमञ्चचतुष्पादके लं¹ पृथिव्यधिपतये ब्रह्मणे नमः, वं अपामधि- पतये विष्णवे नमः, रं तेजोऽधिपतये रुद्राय नमः, यं वाय्वधिपतये ईश्वराय नमः । एतानभ्यर्च्य हं आकाशाधिपतये पञ्चवक्त्रसदाशिवमहाप्रेतासनाय नम इति ²श्रीमञ्चाकारं सदाशिवमभ्यर्च्य" इति । इत्थमुक्तप्रकारेण मन्त्रात्मकं चक्रं सौभाग्यविद्यामयमित्यर्थः ॥५४-५६॥ के अधिपति ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और ईश्वररूपी चार पायों पर रखा हुआ है। पंचम भूत आकाश के अधिपति सदाशिव से यह आसन बना हुआ है। यह उत्कृष्ट आसन महा- बिन्दुमयं है। इस महाबिन्दु के स्वरूप का वर्णन करने वाले 'परशिव' आदि श्लोक की व्याख्या पहले (१।११) की जा चुकी है। परशिव का प्रतिबिम्ब यह महाबिन्दु परम श्रेष्ठ आसन है, क्योंकि शिव और शक्ति के निवास का यह उत्कृष्ट स्थान है। ¹ज्ञानदीप- विमर्शिनी में इसका वर्णन मिलता है—"ओड्याण पीठ के मध्य में कदम्ब वन में स्थित चार पायों वाले श्रीमंच में लं बीज से पृथिवीतत्त्व के अधिपति ब्रह्मा को, वं बीज से जलतत्त्व के अधिपति विष्णु को, रं बीज से तेजस्तत्त्व के अधिपति रुद्र को, यं बीज से वायुतत्त्व के अधिपति ईश्वर को नमनपूर्वक प्रतिष्ठित करना चाहिये। इनकी पूजा करने के बाद हं बीज से आकाशतत्त्व के अधिपति पाँच मुँह वाले सदाशिव नामक महाप्रेतासन को नमन कर वहाँ श्रीमंचाकार सदाशिव की पूजा करनी चाहिये"। इस तरह से चक्र की सौभाग्यविद्या से अभिन्नता होने से चक्र की मन्त्रात्मकता स्पष्ट है ॥५४-५६॥ १. लां वां रां यां हां-इत्येवं पाठः-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । २. 'श्रीमञ्चा'''' मभ्यर्च्य' इति नास्ति-ख. ज. उ. ।

  1. ज्ञानदीपविमर्शिनी नि० षो० की अर्थरत्नावली टीका के कर्त्ता विद्यानन्द की कृति है। अर्थरत्नावली के बाद उन्होंने इस पद्धति ग्रन्थ की रचना की है। इस ग्रन्थ की विशे- षता यह है कि इसके प्रत्येक प्रकरण में अपने प्रतिपाद्य विषय के आन्तर और बाह्य स्वरूपों का एक साथ वर्णन किया गया है। इस ग्रन्थ की बड़ोदा, त्रिवेन्द्रम् तथा उदयपुर से प्राप्त मातृकाएँ हमारे पास हैं। इन तीनों मातृकाओं में संक्षेप और विस्तार की दृष्टि से परस्पर अत्यन्त भिन्नता है। नेपाल में उपलब्ध अन्य दो मातृकाएँ हमें फ्रांस के तन्त्रशास्त्र के विद्वान् डॉ० आन्द्रे पाटु के सहयोग से मिली हैं। बड़ोदा की मातृका इन सबमें प्राचीन तथा संक्षिप्त है। उसमें उक्त उद्धरण हमें देखने को नहीं मिला।

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १८३ इदानीं चक्रेण देवताया ऐक्यमाह— देवतायाः परं वपुः ॥५६॥ चक्रं देवतायाः परम् अन्यद् वपुः । "ततः पद्मनिभां देवीम्" (नि० षो० १।१३०) इत्यत्र देवतायाः करचरणादिमद् वपुरुक्तम् । तदेव त्रिकोणादिभूगृहान्त- श्रीचक्रपदनिवास्यावरणदेवतारूपेणावयवशो विभज्य बैन्दवनिवासिनी स्वसं- विद्देवता श्रीचक्रवपुषा स्थितेत्यर्थः । तदुक्तमत्रैव— १एवंरूपं परं तेजः श्रीचक्रवपुषा स्थितम् । तदीयशक्तिनिकरस्फुरदूर्भिसमावृतम् ॥ (१।५५) इति ॥५६॥ एतदेवोपपादयति— एकादशाधिकशतदेवतात्मतया पुनः । २एकादशोत्तरशतदेवतास्त्रिकोणाग्रदक्षवामकोणेषु कामेश्वर्यादिकास्तिस्रः, तद्बहिरष्टकोणान्तराले त्रिकोणं परितश्चतुर्दिक्षु अष्टौ कामेश्वरकामेश्वर्यायुध- अब चक्र से देवता की एकता बताई जा रही है— यह चक्र देवता का दूसरा शरीर है ॥५६॥ श्रीचक्र देवता (महात्रिपुरसुन्दरी) का दूसरा स्वरूप है। नित्याषोडशिकार्णव (१।१३०-१४९) में देवता परा भगवती का हाथ-पैर वाला स्वरूप वर्णित है। अपने उसी स्वरूप को त्रिकोण से भूगृह पर्यन्त श्रीचक्र के विभिन्न स्थानों में निवास करने वाले आवरण देवताओं के रूप में विभक्त कर बैन्दवचक्र में निवास करने वाली यह स्वसंवि- त्स्वरूपिणी महात्रिपुरसुन्दरी श्रीचक्रमय एक दूसरा ही अनोखा स्वरूप धारण कर लेती है। भगवती के इस श्रीचक्र रूपी देह का वर्णन पहले (१।४९-५५) हो चुका है। यहाँ उद्धृत श्लोक का अर्थ वहीं कर दिया गया है ॥५६॥ अब इसी विषय को समझा रहे हैं— फिर यह श्रीचक्र एक सौ ग्यारह (आवरण) देवताओं का भी स्वरूप है, परा भगवती के अतिरिक्त इनका भी यहाँ निवास है ॥५७॥ इस चक्र में एक सौ ग्यारह देवता निवास करते हैं। जैसे कि त्रिकोण के अग्र, दक्ष और वाम कोणों में १कामेश्वरी, वज्रेश्वरी और भगमालिनी निवास करती हैं। उसके बाहर अष्टकोण के अन्तराल में त्रिकोण के चारों तरफ चार दिशाओं में कामेश्वर और १. श्रीचक्रपरव-क. ग. ने. झ. उ. । २. इतः पूर्वम्-‘स्वेच्छा, इच्छा, आश्रया’ इत्यादिकं श्लोकत्रयम् (१।५०, ५३-५४) अपि दृश्यते-क. । ३. एता एका-ख. ने. झ. उ. । १. नि० षो० (१।१५३-१७६) में संहार क्रम से अणिमा आदि दस, ब्राह्मी आदि आठ, कामाकर्षिणी आदि सोलह, अनंगकुसुमा आदि आठ, सर्वसंक्षोभिणी आदि चौदह,

१८४ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः देवताः, अष्टकोणेऽष्टौ वशिन्याद्याः, अष्टकोणान्तराले षडङ्गदेवताः, अन्तर्दशारे सर्वज्ञाद्या दश, द्वितीयदशारे सर्वसिद्धिप्रदाद्या दश, चतुर्दशारे सर्वसंक्षोभिण्या- द्याश्चतुर्दश, अष्टदलेऽष्टानङ्गकुसुमाद्याः, षोडशदले कामाकर्षिण्याद्याः षोडश, अन्तश्चतुरस्रे मुद्रादेवता दश, मध्यचतुरस्रे ब्राह्म्याद्या अष्टौ, बाह्यचतुरस्रेऽ- णिमाद्या दश। एवमेकादशोत्तरशतदेवतात्मतया तासामाधारभूता ^२श्रीचक्र- रूपिणी देवतेत्यर्थः ॥ ५७ ॥ नन्वयं कौलिकार्थो वामकेश्वरतन्त्रे कुत्र सूचित इत्याशङ्कां परिहरन् देवता- विद्याचक्रगुरुशिष्याणामैक्यार्थमेव “गणेश” (नि० षो० १।१) इत्यत्र सूचितं कौलि- कार्थं विवृणोति— कामेश्वरी के आठ आयुध देवताओं की स्थिति है । अष्टकोण में वशिनी आदि आठ देवियाँ, अष्टकोण के अन्तराल में छः अंगदेवता, अन्तर्दशार में सर्वज्ञा आदि दस देवियाँ, द्वितीय दशार में सर्वसिद्धिप्रदा आदि दस, चतुर्दशार में सर्वसंक्षोभिणी आदि चौदह, अष्टदल में अनङ्गकुसुमा आदि आठ, षोडशदल में कामाकर्षिणी आदि सोलह, अन्तश्चतुरस्र में दस मुद्रादेवता, मध्यचतुरस्र में ब्राह्मी प्रभृति आठ और बाह्यचतुरस्र में अणिमा आदि दस देवियां निवास करती हैं। इस तरह से सब मिल कर एक सौ ग्यारह आवरण देवताओं का इसमें निवास होने से उनका आधारभूत यह श्रीचक्र देवतामय ही है ॥५७॥ यहाँ शंका उठती है कि ^१वामकेश्वर तन्त्र में इस कौलिकार्थ को कहाँ सूचित किया गया है, इस शंका के परिहार के लिये कहते हैं कि वहाँ “गणेशग्रहनक्षत्र०” (१।१) प्रभृति श्लोक में इस विषय की सूचना दे दी गई थी कि देवता, विद्या, चक्र, गुरु और शिष्य में एकता की भावना करना ही कौलिकार्थ है। इसी विषय को आगे स्पष्ट किया जा रहा है— १. सिद्धद्याद्या-ख. ने. ज. उ. । २. श्रीचक्रदेवते-ख. ने. ज. झ. उ. । सर्वसिद्धिप्रदा आदि दस, सर्वज्ञा आदि दस आवरण देवताओं के नाम दिये गये हैं। वशिनी आदि आठ देवताओं के नाम बीजोद्धारपूर्वक वहीं (१।७७-९५) मिलते हैं। आयुध देवता वहाँ (१।१७९-१८०) चार ही हैं। अन्त में (१।१८२) त्रिकोण स्थित तीन आवरण देवताओं तथा मध्यबिन्दु स्थित मूलदेवता का नाम है। आठ आयुध देवताओं का उल्लेख योगिनीहृदय (१।५४) में है। यहीं (३।४८-४९) अन्तश्चतुरस्र स्थित दस मुद्रादेवताओं की चर्चा है। इन सभी आवरण देवताओं का उल्लेख पूजासंकेत में अनेक बार हुआ है। छः अंगदेवताओं की चर्चा ऋजुविमर्शिनी (पृ० १३२) तथा सुभगोदय (पृ० २८६) में मिलती हैं। १. दीपिकाकार ने यहाँ भी वामकेश्वर तन्त्र का मूलतः उल्लेख किया है।

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १८५ गणेशत्वं महादेव्याः ससोमरविपावकैः ॥५७॥ इच्छाज्ञानक्रियाभिश्च गुणत्रययुतैः पुनः । ग्रहरूपा च सा देवी १पुनःशब्दादेकादशाधिकशतदेवतात्मतयाऽस्या गणेशत्वम् । गणेशत्वं महादेव्या इत्यनेनापि काकाक्षि२न्यायवदन्वयः । पूर्वोक्तत्रिकोणादिचतुरस्रान्तश्रीचक्रपद- निवास्येकादशाधिकशतदेवतात्मतया ३महादेव्यास्तु तत्संख्याकदेवता४समुदायो गणः । देव्याः सोमरविपावका नेत्ररूपेण स्थिताः, इच्छा शिरःप्रदेशस्था ज्ञाना च तदधोगता । क्रिया पादगता ह्यस्याः इति संकेतपद्धत्युक्तरीत्या इच्छादिका मूर्धाद्यवयवाः, गुणाः सत्त्वरजस्तमांसि, एवं स्वावयवभूतैस्तैर्नवभिर्ग्रहरूपा च सा देवी ॥ ५७-५८ ॥ ज्ञानकर्मेन्द्रियैरपि ॥ ५८ ॥ तदर्थैरेव देवेशि करणैरन्तरैः पुनः । देवताओं के १११ संख्या वाले गण की स्वामिनी होने से महादेवी भगवती महात्रिपुरसुन्दरी यहाँ गणेश के नाम से अभिहित है। उस भगवती के सोम, रवि और पावक (अग्नि) नेत्र रूप में हैं। इच्छा, ज्ञान और क्रिया तथा सत्त्व, रज और तम इन तीन गुणों को भी मिलाने पर यह देवी ग्रहरूपा भी कही जाती है ॥५७-५८॥ 'पुनः शब्द का यहाँ प्रयोग हुआ है। इसका अभिप्राय यह है कि वही परा भगवती फिर एकसौ ग्यारह देवताओं के गण की स्वामिनी होने से गणेश भी कहलाती है और ग्रहरूपा भी हो जाती है । महादेवी पद का काकाक्षिन्याय से गणेश और ग्रहरूपा दोनों से अन्वय होता है । पूर्वोक्त त्रिकोण से चतुरस्र पर्यन्त श्रीचक्र के अवयवों में निवास करने वाली १११ देवताओं के रूप में यह महादेवी ही स्थित है । अतः यह उस देवता- समुदाय की स्वामिनी है । इस देवी के चन्द्र, सूर्य और अग्नि नेत्र के रूप में स्थित हैं। संकेतपद्धति के अनुसार इस देवी का इच्छाशक्ति से शिरोभाग, ज्ञानशक्ति से मध्यभाग और क्रियाशक्ति से अधोभाग बना है और सत्त्व, रज और तम ये तीन गुण इसमें स्थित हैं । इस प्रकार अपने इन नौ अवयवों के कारण यह देवी नवग्रहात्मिका भी है ॥५७-५८॥ हे देवेशि ! पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, १० इनके अर्थ, चतुर्विध अन्तः- १. 'पुनः....गणेशत्वं....देवतात्मतया' नास्ति-ख. । २. न्यायतः-क. ग. ज. । ३. महादेव्यास्तु नास्ति-क. ग. । ४. समूहो-ग. ज. झ. ।

१८६ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः प्रकृत्या च गुणेनापि पुंस्त्वबन्धेन^१ चात्मना ॥ ५९ ॥ नक्षत्रविग्रहा जाता ज्ञानेन्द्रियाणि श्रोत्रत्वक्चक्षुर्जिह्वाघ्राणानि बोधकरणानि, कर्मेन्द्रियाणि वाक्पाणिपादपायूपस्थानि, तेषामर्थाः शब्दस्पर्शरूपरसगन्धा वचनादानगमनविसर्गा- नन्दाश्च, करणानि मनोबुद्ध्यहङ्कारचित्तान्यान्तराणि च, प्रकृतिः गुणसाम्य- मव्यक्तम्, गुणो गुणतत्त्वं सुखदुःखमोहानां मूलम्, पुंस्त्वबन्ध आत्मा पुरुषतत्त्वम् । तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे— एभिर्मायादिभिः षड्भिः परिपूर्णः पशुः पुमान् । भुङ्क्ते भोगान् यथा देवि तथा पुरुषसंज्ञकः ॥ सैव मायाऽथ भोगार्थं पशोरव्यक्तसंज्ञकम् । मूलप्रकृतिर्विश्वस्य गुणत्रितयरूपकम् ॥ अभूत् तस्यां प्रकृत्यां तु गुणतत्त्वं बभूव ह । तद् दुःखसुखमोहानां मूलं सत्त्वं रजस्तमः ॥ करण, प्रकृति, गुण और पुरुष तत्त्व इन सत्ताईस पदार्थों के समवाय के कारण यह देवी नक्षत्रों का स्वरूप भी धारण कर लेती है ॥५८-६०॥ श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, जिह्वा और घ्राण ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ; वाक्, पाणि, पाद, पायु और उपस्थ ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ; शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, वचन, आदान, गमन, विसर्ग और आनन्द ये दस विषय; मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त ये चार अन्तःकरण, प्रकृति अर्थात् गुणों की साम्यस्वरूपिणी अव्यक्त अवस्था, सुख-दुःख-मोहात्मक गुणतत्त्व और पुरुष को बाँधने वाला आत्मा पुरुषतत्त्व है । इन २७ तत्त्वों का वर्णन स्वच्छन्द- संग्रह में इस तरह से किया गया है— इन माया आदि छः^१ कंचुकों से आवृत होने पर पुरुष का पशुस्वरूप परिपूर्ण हो जाता है । हे देवि ! पुरुषतत्त्व के रूप में स्थित होकर यह नाना प्रकार के भोगों को भोगता है । वही मायातत्त्व पशु के भोग का संपादन करने के लिये अव्यक्त नामक तत्त्व का रूप धारण कर लेता है । यह अव्यक्त तत्त्व विश्व की मूलप्रकृति है । तीनों गुण इसमें छिपे हुए हैं, साम्यावस्था में विद्यमान हैं । इस प्रकृति से ^२गुणतत्त्व की सृष्टि १. नाथ-ख. च. छ. ज. झ. । १. पाँच अथवा छः कंचुकों की चर्चा हम पहले पृ० १४७ की टिप्पणी में कर चुके हैं । २. प्रकृति से गुणतत्त्व की उत्पत्ति प्रायः सभी शैव शास्त्रों में वर्णित है । साथ ही वहाँ यह भी बताया गया है कि ये तीनों गुण प्रकृति से अभिन्न हैं (देखिये—१।१६२-१६३)

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १८७ बुद्धिव्यापारनिश्चयरूपं व्यक्तगुणात्मकम् । १विषयाध्यवसायात्मा बुद्धिः स्याद् गुणतत्त्वतः ॥ गुणत्रयानुसारेण त्रिधा कर्मानुसारतः । तया बुद्ध्या समु२द्भूतोऽहङ्कारस्त्रिप्रकारकः ॥ सर्वजीवनसंरम्भरूपेण कमलासने३ । ४विषयास्तस्य भेदाश्च त्रिधा कर्मानुसारतः ॥ होती है। सुख, दुःख और मोह के कारणभूत सत्त्व, रज और तम नामक गुणों की अभिव्यक्ति इसी से होती है। यह गुणतत्त्व बुद्धि के सभी व्यापारों से युक्त है तथा इसमें सभी गुण व्यक्त अवस्था में रहते हैं। गुणतत्त्व से विषयों का निश्चय करनेवाली बुद्धि अभिव्यक्त होती है। तीन गुणों और कर्मों के अनुसार इस बुद्धि से त्रिविध अहंकार की उत्पत्ति होती है। हे कमलासने ! यह अहंकार ही सभी प्राणियों में जीवन और १संरम्भ का संचार करता है। कर्म के अनुसार जब इसके त्रिविध भेद और विषय हो १. विषयात्मा तु बुद्धिः स्याद् गुणास्तत्र प्रयोजकाः-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । २. त्पन्नो-ज. । ३. सनम्-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ४. विशतस्तत्र भेदेन-ख. ने. ज. झ. उ. । (वि० १०।२०-२१), तत्त्वसंग्रह (श्लो० ९), भोगकारिका (श्लो० ८७-८८), तत्त्वप्रकाश (श्लो० २३-२४, ५१)। मतंगपारमेश्वर, विद्यापाद के पन्द्रहवें पटल में अव्यक्त का तथा १६वें में गुणतत्त्व का निरूपण है। १. मृगेन्द्रागम (वि० ११।२०) में बुद्धितत्त्व से गर्व (अहंकार) की उत्पत्ति बताकर कहा गया है कि इसी के व्यापार से शरीर स्थित पंचविध प्राण अपने अपने कार्यों में प्रवृत्त होते हैं। गर्व की इस वृत्ति को व्याख्याकार ने संरम्भ नाम दिया है। तत्त्वसंग्रह (श्लो० ६) और भोगकारिका (श्लो० ३३) में भी इसका यही नाम है। भोगकारिका- कार का कहना है कि शरीरधारण (जीवन) के लिये आवश्यक प्राण आदि पाँच वायुओं की प्रवर्तक अहंकार की संरम्भ नामक वृत्ति है। टीकाकार स्पष्ट करते हैं कि अहंकार के इस संरम्भ नामक प्रयत्न से ही शरीर स्थित प्राण आदि पाँच वायु तथा कालोत्तरागम (१०।५-१३) में वर्णित नाग आदि अन्य पाँच वायु सभी प्राणियों के शरीर को धारण करने में समर्थ होते हैं। इनके नाम योगिनीहृदय (२।६२) में भी उल्लिखित हैं। तत्त्वप्रकाशकार (श्लो० ५३) ने अहंकार के जीवन, संरम्भ और गर्व नामक तीन भेद किये हैं और टीकाकारों ने संरम्भ का अर्थ पाँच प्राणों का प्रवर्तक प्रयत्न किया है। प्रस्तुत उद्धरण में जीवन और संरम्भ पदों का प्रयोग इन्हीं अर्थों में किया गया है।

१८८ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः सोऽयं तैजसवैकारिभौतिकाख्यास्वरूपतः । विकाराश्च¹ स्व(स)भेदाश्च¹ वागादीन्द्रियसंहतौ² ॥ वाचकार्थाः³ स्युरीशानि तत्र तत्र ⁴नियन्तृतः । प्राप्नोति ⁵सात्त्विकाद्याभिरवस्थाभिरात्मजे ॥ संकल्पकारकं⁶ ⁷चेच्छारूपं तैजसतो मनः । जातं वैकार्यवस्थाभिर्ज्ञानकर्मेन्द्रियाणि च ॥ ⁸भूततन्मात्रशब्दस्पर्शरूपरसगन्धकाः । जाता ⁹वागादीन्द्रियाणां व्यापाराः परमेश्वरि ॥ श्रोत्रत्वक्चक्षूरसनाघ्राणान्येतानि पञ्च च। बुद्धीन्द्रियाणि¹⁰ व्यापारास्तेषामेकैकशः क्रमात् ॥ जाते हैं, तब यह ¹तैजस, वैकारिक और भौतिक अहंकार ने नाम से प्रख्यात होता है। सभी भेदों और उपभेदों के साथ सोलह विकारों की, वाचक अर्थों के साथ ²वाक् प्रभृति इन्द्रियों की उत्पत्ति इसी से होती है। हे पार्वति ! इन विषयों से नियन्त्रित होकर ही वह सात्त्विक आदि अवस्थाओं को प्राप्त करता है। तैजस (सात्त्विक) अहंकार से संकल्प के कारण इच्छारूप मन की और वैकारिक (राजस) भेद से ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रियों की उत्पत्ति होती है। हे परमेश्वरि ! भूतादि (तामस) अहंकार से शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध नामक तन्मात्राओं की उत्पत्ति होती है, जिनसे कि वाक् प्रभृति इन्द्रियों के विषय विकसित होते हैं। श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, रसना, घ्राण ये पाँच बुद्धीन्द्रियाँ हैं। हे प्रिये ! १. च्च-ख. ग. ज. उ. । २. संभवैः-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ३. वाचिकाद्याः स्यु- रेतानि-क. ग. । ४. नियन्त्रिभिः-क. ख. ग. ने. झ. उ. । ५. सा तु विद्याभिः-ख. झ. उ. । ६. कारणं वष्मं-ख. ज. झ. ब. उ. । ७. 'चेच्छा''''स्याभिः' नास्ति-ख. ज. झ. ब. उ. । ८. भूतादीन्यथ तन्मात्राः शब्दस्पर्शरूपरसाः । गन्धाद्याः पञ्चका जाताः । देहेन्द्रियाणां व्यापाराः प्रोच्यन्ते परमेश्वरि-क. । ९. दृगा-ज. झ. । १०. याणां-ज. ।

  1. तैजस, वैकारिक और भौतिक शब्दों का प्रयोग ऊपर उद्धृत सभी ग्रन्थों में क्रमशः सात्त्विक, राजस और तामस के अर्थ में किया है, किन्तु सांख्यकारिकाकार (श्लो० २५) सात्त्विक के लिये वैकृत और राजस के लिये तैजस शब्द का प्रयोग करते हैं। मतंगपारमेश्वर (वि० १८।४३-४४) में सांख्यकारिका का अनुसरण किया गया है।
  2. मतंगपारमेश्वर में अहंकार का निरूपण करते समय (वि० १८।१२-१५) उसकी ज्ञानसत्ता और क्रियासत्ता का विवरण दिया है। तदनुसार ज्ञानसत्ता का बुद्धी- न्द्रियों से तथा क्रियासत्ता का वागादि इन्द्रियों से सम्बन्ध है। इसी विषय की यहाँ चर्चा की गई लगती है। यहाँ भी अहंकार के सात्त्विक आदि भेदों के निरूपण से पहले इस विषय की चर्चा है।

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १८९ शब्दस्पर्शरूपरसगन्धानां ग्रहणं प्रिये । कर्मेन्द्रियाणि १ वाक्पाणिपादपायुरुपस्थकाः ॥ वचनादानगमनविसर्गानन्दकं क्रमात् । कर्मेन्द्रियाणां व्यापाराः पञ्चानां २ परिकीर्तिताः ॥ एतानि दश बाह्यानि ३क्रमेणाभ्यन्तरत्रयम् । मनो बुद्धिरहङ्कारो ह्यन्तःकरणसंज्ञकम् ॥ इति । एतैः स्वावयवसंभूतैः सप्तविंशतिभिन्नक्षत्रविग्रहा जाता देवी ४स्वेच्छागृहीत- विग्रहा ।। ५८-६० ।। ५योगिनीत्वमथोच्यते । त्वगादिधातुनाथाभिर्डाकिन्यादिभिरप्यसौ ॥ ६० ॥ वर्गाष्टकनिविष्टाभिर्योगिनीभिश्च संयुता । योगिनीरूपमास्थाय राजते विश्वविग्रहा ६ ॥ ६१ ॥ [७त्वगादिधातवस्त्वगसृङ्मांसमेदोमज्जाशुक्राणि धातवः, तेषां नाथा अधिष्ठात्र्यो डाकिन्याद्याः—डाकिनी, राकिनी, लाकिनी, काकिनी, साकिनी, हाकिनी ८ च । वर्गा इन इन्द्रियों से क्रमशः शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध नामक विषय गृहीत होते हैं। वाक्, पाणि, पाद, पायु, उपस्थ नामक पाँच कर्मेन्द्रियों से क्रमशः वचन, आदान, विहरण, विसर्ग, आनन्द नामक विषयों का ग्रहण होता है। कर्मेन्द्रिय और ज्ञानेन्द्रिय बाह्य इन्द्रियाँ तथा मन, बुद्धि और अहंकार ये तीन अन्तःकरण कहलाते हैं ॥ अपने ही अवयवों के रूप में अभिव्यक्त इन तत्त्वों के कारण यह देवी अपनी ही इच्छा से २७ नक्षत्रों के रूप में दिखाई पड़ती है ॥५८-६०॥ अब इस देवी के योगिनीस्वरूप का वर्णन किया जा रहा है। यह विश्व- विग्रहा देवी त्वक् आदि धातुओं की स्वामिनी डाकिनी आदि से तथा आठ वर्गों की अधिष्ठात्री योगिनियों से संवलित होने के कारण योगिनी के रूप में भी विराजमान है ॥६०-६१॥ त्वक्, असृक्, मांस, मेदा, मज्जा और शुक्र ये छः धातु हैं। इनकी स्वामिनियाँ हैं—डाकिनी, राकिनी, लाकिनी, काकिनी, साकिनी और हाकिनी १। अ क च ट त प य १. याणां—झ. उ. । २. नामपि—ज. झ. उ. । ३. करणान्यन्तरं त्रयम्—झ. उ. । ४. स्वयं—ख. ने. ज. झ. उ. । ५. योगिनीनाम्—ने. च. छ. ज. झ. । ६. मोहिनी—ङ. च. उ. । ७. 'त्वगादि ''''तत्तद्' नास्ति—ख. ग. ने. ज. झ. ब. उ. । ८. इतः परम्— 'शाकिनी' इत्याधिकः पाठः सार्वत्रिकः । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

१९० योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः अकचटतपयशाः, तेषामष्टके निविष्टा ब्रह्माण्याद्या योगिन्यः । तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे— सर्ववाङ्‌मयूला या वर्गाष्टकसमावृता । विश्वोत्पत्तिक्रमान्ताष्टशक्तिप्रसृतभैरवैः ॥ शक्तिभिश्च समायुक्ता अक्षांन्ता मातृकावलिः । इति । चतुःशत्यामप्युक्तम्—"वर्गानुक्रमयोगेन यस्यां मात्रष्टकं स्थितम्" (नि० षो० १।११) इति । एभिः संयुक्ता । षडाधारेषु ¹डाकिन्यादिभिः, “मातृकास्थूलरूपत्वात् त्वगादिव्यापकत्वतः । योगिन्यः प्रकटा ज्ञेयाः” (३।११४) इति वक्ष्यमाणरीत्या त्वगादि- और श ये आठ वर्ग हैं। ब्रह्माणी प्रभृति आठ योगिनियाँ क्रमशः प्रत्येक वर्ग की अधिष्ठात्री देवियाँ हैं। स्वच्छन्दसंग्रह में इनका वर्णन इस प्रकार किया गया है— अकार से लेकर क्षकार पर्यन्त मातृका की माला सारे वाङ्मय की मूलकारण हैं। आठ वर्गों में विभक्त यह वर्णमाला आठ शक्तियों और आठ भैरवों के अधिकार में स्थित होकर सारे जगत् की उत्पत्ति करती है ॥ चतुःशती शास्त्र में भी प्रदर्शित है—"इस पूर्णाहन्तास्वरूपिणी परा भगवती में आठ वर्गों के अनुक्रम से ब्रह्माणी प्रभृति आठ माताएँ स्थित हैं"। इन सभी योगिनियों से यह देवी संयुक्त है। मूलाधार प्रभृति छः आधारों में भी डाकिनी प्रभृति का निवास है। आगे (३।११४) बताई गई पद्धति से त्वक् आदि धातुओं की अधिष्ठात्री ब्राह्मी प्रभृति

  1. यद्यपि यहाँ दीपिका के सभी हस्तलेखों में हाकिनी के बाद याकिनी का भी उल्लेख मिलता है, किन्तु आगे (३।३२) यह नाम नहीं दिया गया है। यद्यपि धातुओं की संख्या वहाँ सात है। आयुर्वेद के ग्रन्थ अष्टांगहृदय (सू. १।१८) में भी सात ही धातु वर्णित हैं। तदनुसार धातु देवता सात ही होनी चाहिये। भास्करराय ने भी आगे (३।३२) इसी मत को स्वीकार किया है, किन्तु प्रस्तुत प्रसंग में वे सात चक्रों की अधिष्ठात्री सात योगिनियों के प्रतिपादक मत की समालोचना करते हैं। आगे योगिनीहृदय (३।३२) में छः चक्रों का ही उल्लेख है और ऋजुविमर्शिनीकार शिवानन्द ने "डरळकसहदेवीभिर्द्वादिशार्धदेवताभिः" (पृ० १८२) यहाँ छः योगिनियों का ही उल्लेख किया है। दीपिकाकार ने प्रस्तुत प्रसंग में छः धातुओं की ही गणना की है और आगे "योगिन्यश्च डाकिन्याद्याः षट्" (२।६६) इस तरह से वे छः योगिनियों का स्पष्ट उल्लेख करते हैं। अतः याकिनी नाम की अनावश्यकता को देखते हुए हमने उसको मूल में नहीं रखा है।

'द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १९१ बात्तुषु ब्राह्मयादिभिः सेविता सर्वसमष्टिरूपत्वाद् योगिनीरूपमास्थाय राजते विश्वविग्रहा तत्तद् [ये]योगिनीरूपेण विहरति । अत्रैव वक्ष्यति— अष्टाष्टकं तु कर्तव्यं वित्तशाठ्यविवर्जितम् । त्वमेव तासां रूपेण क्रीडसे विश्वमोहिनि ॥ (३।१९४) इति ॥६०-६१॥ प्राणापानौ समानश्चोदानव्यानौ तथा पुनः । नागः कूर्मोऽथ कृकरो देवदत्तो धनञ्जयः ॥६२॥ जीवात्मापरमात्मा चेत्येतै¹ राशिरूपिणी । प्राणादिधनञ्जयान्ता दश वायवः, जीवात्मा उक्तलक्षणः पशुः, परमात्मा “एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः” (बृ० उ० ३।७।३) इत्युपनिषदुक्तः सर्वभूतानामन्त- र्यामी । एतैर्द्वादशभी ²राशिरूपिणी ॥६२-६३॥ गणेशेत्यादिपदं विद्यापदेऽपि योजयति— अकथादित्रिपङ्क्त्यात्मै³तार्तीयादिक्रमेण सा ॥६३॥ गणेशोऽभून्महाविद्या परावागादिवाङ्मयी । देवियों से सेवित यह सर्वसमष्टिरूपिणी परा भगवती योगिनी का स्वरूप धारण कर उन उन योगिनियों के रूप में सारे विश्व को व्याप्त कर विराजमान है । भगवती के इस अष्टाष्टक स्वरूप की उपासना लोभ का परित्याग कर उदार भावना से करनी चाहिये, क्योंकि उन सभी स्वरूपों में विश्वमोहिनी परा देवी ही क्रीडा करती है । इस विषय का वर्णन आगे (३।१९४) किया जायेगा ॥६०-६१॥ प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, नाग, कूर्म, कृकर, देवदत्त और धनंजय नामक दस प्राणों के साथ जीवात्मा और परमात्मा को मिलाकर यह परा देवी राशिरूपिणी बन जाती है ॥ प्राण से धनंजय पर्यन्त दस वायु हैं, जो इस शरीर को धारण किये रहते हैं । जीवात्मा पूर्वोक्त लक्षण वाला त्रिविध पशु है। बृहदारण्यक श्रुति के अनुसार सारी आत्माओं के अन्दर निवास करने वाला अमृतमय अन्तर्यामी ही परमात्मा है। इन बारह स्वरूपों के कारण यह परा भगवती राशिरूपिणी बन जाती है ॥६२-६३॥ गणेश आदि पदों की अब विद्या में भी संगति बैठाते हैं— परा, पश्यन्ती आदि चतुर्विध वाग्रूपिणी महाविद्या आदि, कादि और थादि के क्रम से विन्यस्त तार्तीय (शक्ति बीज) आदि तीनों बीजों के वर्णगणों की स्वामिनी होने से गणेश कही जाती है ॥६३-६४॥ १. तैर्र्वा राशिरू-ड. । २. राशिरू-ख. ने. ज. उ. । ३. त्मा-क. ग. ।

१९२ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः अकारहकारसामरस्यरूपा परा वाग् आदियासां ताः पश्यन्तीमध्यमावैखर्यो वाचश्चतस्रः परावागादिवाचः। तदुक्तं संकेतपद्धत्याम्— अकारः सर्ववर्णाग्र्यः प्रकाशः परमः शिवः। हकारोऽन्त्यः कलारूपो विमर्शाख्यः प्रकीर्तितः ॥ अनयोः सामरस्यं यत् १परस्मिन् महसि स्फुटम्। वामाद्यैः २पिण्डितो योऽसावर्णः परिकीर्तितः॥ ३आदावस्य शिरो रौद्री वक्त्रं वामा प्रकीर्तिता। अम्बिका बाहुरित्युक्ता ज्येष्ठा चैव४ नखाग्रगा॥ ५एता हार्धकलारूपा रूपपञ्चतया स्थिताः। अवर्णः सर्ववर्णानां न पृथग् भासते बहिः॥ इच्छा शिरःप्रदेशस्था ६ज्ञाना च तदधोगता। क्रिया७ पादगता ह्यस्य शान्ता ८हृन्मध्यगा भवेत्॥ अकार और हकार जहाँ समरस रूप में छिपे रहते हैं, वह परा वाक् कहलाती है। आदि शब्द से पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी वाणी का ग्रहण किया जाता है। महाविद्या में वाणी के ये चारों स्वरूप विद्यमान हैं। उनका वर्णन संकेतपद्धति में इस तरह से मिलता है— अकार सभी वर्णों का अग्र्य है, सबसे पहले विद्यमान है। यह प्रकाशात्मक परम शिव का वाचक है। अन्तिम हकार विमर्शात्मक शक्तिकला का वाचक है। ये दोनों वर्ण परमप्रकाशमय अहन्ता में, परा वाणी में समरसभाव से स्थित हैं। यहीं प्रकाशमय अवर्ण १पश्यन्ती (उत्तीर्ण) अवस्था में वामा प्रभृति शक्तियों से संपिण्डित हो जाता है, तब २रौद्री शक्ति से इसका शिर, वामा से वक्त्र (मुँह), अम्बिका से बाहु और ज्येष्ठा से नखाग्र का निर्माण होता है। व्यष्टि और समष्टि के भेद से हार्धकलास्वरूपिणी ये शक्तियाँ पाँच रूपों में विभक्त हो जाती हैं। अकार सभी वर्णों में अनुस्यूत रहता है, अतः इसकी बाहर अलग से प्रतीति नहीं होती। अकार की ही भाँति हकार भी इच्छा प्रभृति शक्तियों में संपिण्डित हो जाता है, तब इच्छा शक्ति से इसका शिर, ज्ञान शक्ति से अधोगत देह, क्रिया से पाद भाग की निष्पत्ति होती है। शान्ता शक्ति हृदय के मध्य १. परस्मिन्नहमि-चि.। २. पञ्चभिर्योऽसावीश्वरः-क. ग.। ३. अकारस्य- तवि.। ४. चैवायुधं स्मृता-तवि.। ५. अ इच्छार्धकलारूपः पञ्चधा यो व्यवस्थितः-ख. नै. ज. झ. उ.। ६. क्रिया-ख. ने. ज. झ. उ.। ७. ज्ञाना-ख. ने. ज. झ. उ.। ८. हार्धार्धमध्यगा-ख. ने. ज. झ. उ.।

  1. पृ० १२१ की टिप्पणी देखिये। २. संकेतपद्धति के इस श्लोक को तन्त्रालोक के टीकाकार जयरथ ने (भा० ३, पृ० ८०) आगम वचन कहकर उद्धृत किया है।

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १९३ अष्टधाऽनाहतः प्रोक्तः शून्यादि¹प्रविभागतः । शून्यः स्पर्शस्तथा नादो ध्वनिर्बिन्दुस्तथैव च ॥ शक्तिबीजाक्षरं चेति ह्यष्टधाऽनाहतः स्मृतः । चत्वारिंशत्सप्तसंख्यो हतः स परिकीर्तितः ॥ क्षकारः कथितो योऽसौ संयोगो² द्विविधः स्मृतः । सप्तषष्ट्याख्यमेवं हि मातृकापीठमुत्तमम् ॥ ³अनाहतहतोत्तीर्णैस्त्रिभिर्भेदैः समन्ततः । स्थितो योऽसौ महापीठो⁴ मातृकाख्यो जयत्यसौ ॥ इति । में विराजमान है । शून्य आदि के भेद से 'अनाहत (मध्यमा वाक्)¹ आठ प्रकार का होता है । शून्य, स्पर्श, नाद, ध्वनि, बिन्दु, शक्ति, बीज, अक्षर ये अनाहत के आठ भेद होते हैं । ²हत नाद (वैखरी वाक्) के ४७ भेद होते हैं । क्षकार संयुक्ताक्षर है, अतः इसके दो भेद (क् ष्) हो जाते हैं । ³इन सबको मिलाकर ६७ वर्णों वाले उत्तम मातृका पीठ की निष्पत्ति होती है । इस प्रकार परा वाणी में समरस रूप से स्थित अकार-हकार वर्णों से ही अनाहत (मध्यमा), हत (वैखरी) और उत्तीर्ण (पश्यन्ती) के क्रम से त्रिधा विभक्त होकर यह मातृका पीठ सर्वत्र व्याप्त हो जाता है, सारे वाङ्मय को व्याप्त कर लेता है ॥ १. प्रतिभेदतः-ख. ने. ज. झ. उ. । २. संयोगादिति सार्वत्रिकः पाठः । अर्थ- रत्नावलीधृतः पाठोऽत्र स्थापितः । ३. अनाहतहतैर्मन्त्रैस्त्रिभिर्भेदैः समन्ततः-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. पीठमकाराख्यो-ख. ने. ज. झ. उ. ।

  1. पृ० १२३ की पहली टिप्पणी देखिये । अर्थरत्नावलीकार (पृ० ३६) ने संकेत- पद्धति के प्रस्तुत श्लोक की नवनादपरक व्याख्या की है । वहीं उद्धृत हंसनिर्णय में स्पष्ट ही नौ नादों का उल्लेख है । वर्णों की ६७ संख्या तभी पूरी हो सकती है ।
  2. अर्थरत्नावलीकार (पृ० ३६) वैखरी वाणी के ४७ भेदों में आकार से लेकर सकार पर्यन्त वर्णों की गणना करते हैं । अकार और हकार की प्रकाशविमर्शात्मकता के कारण इनका परा और पश्यन्ती वाणी में समावेश हो जाता है । ककार और षकार के संयोग से बने क्षकार की अलग से गणना नहीं की जाती और ळकार का वे लकार में ही अन्तर्भाव मानते हैं ।
  3. पश्यन्ती के ११, मध्यमा के ९ और वैखरी के ४७ भेदों के योग से यहाँ मातृका पीठ के ६७ वर्ण माने गये हैं । २५३

१९४ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः एवमेतत्परादिचतुर्विधतया वाङ्मयी, “अस्वरविमर्शरूपौ स्वांशौ हित्वा१ चतुष्कलो सैव” (२।२) इत्यादिसौभाग्यसुधोदयप्रतिपादितरीत्या परापश्यन्ती- मध्यमावैखरीमयत्वाद् विद्यायाः। अकथादित्रिपङ्क्त्यात्म२तार्तीयादिक्रमेण। अकथादीत्यादिशब्दोऽकारककारथकारैस्त्रिभिः संबध्यते। आदयो विसर्गान्ताः स्वराः षोडश, कादयस्तान्ताः षोडश, थादयः सान्ताः षोडश। एवमकथादिवर्णा३- त्मकतार्तीयादिकामराजादिवाग्भवादिक्रमेण अकारादिपङ्क्तिमयं तार्तीयम्, ककारादिपङ्क्तिमयं कामराजम्, थकारादिपङ्क्तिमयं वाग्भवमिति क्रमेण। पङ्क्तिशब्दो गणपरः, चतुर्विधमातृकामयत्वात्, अकथादिवैखर्यादि४वर्गगणत्रय- बीज५त्रयावयवत्वाच्च सेयं महाविद्या गणेशोऽभूदित्यर्थः ॥६३-६४॥ बीजबिन्दुध्वनीनां च त्रिकूटेषु ग्रहात्मिका ॥६४॥ हृल्लेखात्रयसंभूतैस्तिथिसंख्यैस्तथाक्षरैः । अन्यैर्द्वादशभिर्वर्णैरेषा नक्षत्ररूपिणी ॥६५॥ इस तरह से महाविद्या चारों वाणियों में व्याप्त होकर वाङ्मयी कहलाती है। सौभाग्यसुधोदय में भी इस विषय का विस्तार से वर्णन हुआ है और इसकी व्याख्या पहले (२।१७) की जा चुकी है। तदनुसार परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी वाणीमय यह विद्या अ क थ अक्षरों से बने तीन पंक्तिवाले तार्तीय आदि बीजों के क्रम से रखे गये वर्णगणों की स्वामिनी, अर्थात् गणेश का स्वरूप धारण कर लेती है। यहाँ अकार से विसर्ग पर्यन्त १६ स्वरों का प्रथम गण, ककार से तकार पर्यन्त सोलह अक्षरों का द्वितीय गण तथा थकार से सकार पर्यन्त सोलह अक्षरों का तृतीय गण बनता है। ये तीनों गण तीन पंक्तियों में रखे जाते हैं और क्रमशः ये महाविद्या के तार्तीय (शक्ति) बीज, कामराज और वाग्भव बीज का स्वरूप धारण करते हैं। अर्थात् अकारादि पंक्तिमय शक्ति बीज, ककारादि पंक्तिमय कामराज बीज और थकारादि पंक्तिमय वाग्भव बीज के क्रम से ये स्थित होते हैं। पंक्ति शब्द का अर्थ यहाँ गण किया गया है। इस तरह से यह सब चतुर्विध वाणी का ही विस्तार है और अन्ततः वैखरी अवस्था में अ क थ के वर्गों के तीन गणों से इस महाविद्या के तीन बीजों वाले अवयवों की निष्पत्ति होती है, अतः यह महाविद्या गणेश का स्वरूप धारण करती है ॥६३-६४॥ तीन कूटों में विद्यमान बीज, बिन्दु और ध्वनियों के कारण यह विद्या ग्रहा- त्मिका तथा तीन हृल्लेखाओं से उत्पन्न पन्द्रह अक्षरों और अन्य बारह अक्षरों के योग से यह विद्या नक्षत्ररूपिणी बन जाती है ॥६४-६५॥ १. भित्वा-ख. ग. ज. उ. । २. त्मकत्वं-क. ग. । ३. वर्णाः पङ्क्तित्रयात्मता- क. ग. । ४. 'वर्ग' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. त्रयत्वाच्च-ख. ने. ज. झ. उ. ।

द्वितीयः ] दीपिकभापानुवादसहितम् १९५ कूटशब्दोऽत्राक्षरपिण्डेऽपरः । यथोक्तमभियुक्तैः— "कूटेषु त्रिषु कार्यगौरव- वशादीकारशृङ्गक्रमात्" इति । सौभाग्यविद्याक्षरपिण्डेषु बीजबिन्दुध्वनीनां च, बीजम् ईकारान्ताक्षरजातम्, बिन्दुरुक्त(१।२८)लक्षणः, ध्वनिनादः, बीजबिन्दु- ध्वनीनां चेति तृतीयार्थे छान्दसः प्रयोगः । कूटत्रयबीजानि त्रीणि, बिन्दवस्त्रयः, नादास्त्रय इति नवभिर्ग्रहात्मिका विद्येत्यर्थः । बीजत्रयशिखरवर्ति²हृल्लेखात्रयसंभूतैस्तथाक्षरैर्हंकाररेफेकारबिन्दुनादात्मकै - स्तिथिसंख्यकैः पञ्चदशभिः, अन्यैर्हृल्लेखात्रयवर्जितैर्द्वादशवर्णैः कूटत्रयावयवैरेवं³ पञ्चदशभिर्द्वादशभिश्च४ सप्तविंशतिवर्णैः सर्वैर्नक्षत्ररूपिणोत्यर्थः ॥६५॥ विद्यान्तर्भूतशक्त्याद्यैः शाक्तैः षड्भिस्तथाक्षरैः । योगिनीत्वं च विद्याया राशित्वं चान्त्यवर्जितैः ॥६६॥ विद्यायाः पञ्चदशाक्षर्या अन्तर्भूताः शक्तयो हृल्लेखास्तित्रः, तदाद्याश्च लकारास्त्रयः। ५शाक्तैरेतैः षड्भिरक्षरैर्विद्याया योगिनोत्वम् । योगिन्यश्च डाकि- कूट शब्द यहाँ अक्षरपिण्ड (समूह) का वाचक है। “कूटेषु त्रिषु” इस अभियुक्त वचन में कूट शब्द इसी अर्थ में प्रयुक्त है। सौभाग्यविद्या के अक्षरसमूह में ईकार पर्यन्त अक्षर बीज कहलाते हैं। बिन्दु का लक्षण पहले (१।२८) बता दिया गया है। ध्वनि नाद को कहते हैं। प्रस्तुत श्लोक में तृतीया के स्थान पर षष्ठी विभक्ति का प्रयोग वैदिक पद्धति से किया गया है। तीन कूटों के तीन बीज, तीन बिन्दु और तीन नादों को मिलाकर विद्या का नवग्रहात्मक स्वरूप परिपूर्ण होता है। इसी तरह से तीन बीजों के शीर्ष स्थान में विराजमान तीन हृल्लेखाओं के हकार, रेफ, ईकार, बिन्दु और नादात्मक पन्द्रह अक्षरों और इन हृल्लेखाओं को छोड़कर तीन कूटों के बाकी बचे बारह अक्षरों को मिलाकर सत्ताईस वर्ण वाली यह महाविद्या नक्षत्ररूपिणी बन जाती है ॥६४-६५॥ पंचदशाक्षरी विद्या में अन्तर्भूत शक्ति वर्ण तीन हृल्लेखाओं और उनसे पहले स्थित तीन लकारों के कारण यह विद्या योगिनीस्वरूपिणी और अन्तिम तीन वर्णों को छोड़ देने पर राशिस্বরূপिणी बन जाती है ॥६६॥ पंचदशाक्षरी विद्या के अन्तर्भूत शक्तियाँ हैं तीन हृल्लेखाऐं और इन हृल्लेखाओं के पहले तीन लकार स्थित हैं। ये सभी वर्ण शाक्त कहलाते हैं। इन शाक्त अक्षरों के कारण यह विद्या योगिनी कहलाती है। अर्थात् डाकिनी प्रभृति छः योगिनियों का स्वरूप १. 'पिण्ड' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । २. ह्रींकार-ख. ने. ज. । ३. 'एवं' नास्ति- क. ख. ग. ने. । ४. 'च सप्तविंशति' नास्ति-ख. ज. झ. उ. । ५. रथा-ख. ने. च. छ. ६. 'शाक्तैः' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ.।