योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९२ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः अकारहकारसामरस्यरूपा परा वाग् आदियासां ताः पश्यन्तीमध्यमावैखर्यो वाचश्चतस्रः परावागादिवाचः। तदुक्तं संकेतपद्धत्याम्— अकारः सर्ववर्णाग्र्यः प्रकाशः परमः शिवः। हकारोऽन्त्यः कलारूपो विमर्शाख्यः प्रकीर्तितः ॥ अनयोः सामरस्यं यत् १परस्मिन् महसि स्फुटम्। वामाद्यैः २पिण्डितो योऽसावर्णः परिकीर्तितः॥ ३आदावस्य शिरो रौद्री वक्त्रं वामा प्रकीर्तिता। अम्बिका बाहुरित्युक्ता ज्येष्ठा चैव४ नखाग्रगा॥ ५एता हार्धकलारूपा रूपपञ्चतया स्थिताः। अवर्णः सर्ववर्णानां न पृथग् भासते बहिः॥ इच्छा शिरःप्रदेशस्था ६ज्ञाना च तदधोगता। क्रिया७ पादगता ह्यस्य शान्ता ८हृन्मध्यगा भवेत्॥ अकार और हकार जहाँ समरस रूप में छिपे रहते हैं, वह परा वाक् कहलाती है। आदि शब्द से पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी वाणी का ग्रहण किया जाता है। महाविद्या में वाणी के ये चारों स्वरूप विद्यमान हैं। उनका वर्णन संकेतपद्धति में इस तरह से मिलता है— अकार सभी वर्णों का अग्र्य है, सबसे पहले विद्यमान है। यह प्रकाशात्मक परम शिव का वाचक है। अन्तिम हकार विमर्शात्मक शक्तिकला का वाचक है। ये दोनों वर्ण परमप्रकाशमय अहन्ता में, परा वाणी में समरसभाव से स्थित हैं। यहीं प्रकाशमय अवर्ण १पश्यन्ती (उत्तीर्ण) अवस्था में वामा प्रभृति शक्तियों से संपिण्डित हो जाता है, तब २रौद्री शक्ति से इसका शिर, वामा से वक्त्र (मुँह), अम्बिका से बाहु और ज्येष्ठा से नखाग्र का निर्माण होता है। व्यष्टि और समष्टि के भेद से हार्धकलास्वरूपिणी ये शक्तियाँ पाँच रूपों में विभक्त हो जाती हैं। अकार सभी वर्णों में अनुस्यूत रहता है, अतः इसकी बाहर अलग से प्रतीति नहीं होती। अकार की ही भाँति हकार भी इच्छा प्रभृति शक्तियों में संपिण्डित हो जाता है, तब इच्छा शक्ति से इसका शिर, ज्ञान शक्ति से अधोगत देह, क्रिया से पाद भाग की निष्पत्ति होती है। शान्ता शक्ति हृदय के मध्य १. परस्मिन्नहमि-चि.। २. पञ्चभिर्योऽसावीश्वरः-क. ग.। ३. अकारस्य- तवि.। ४. चैवायुधं स्मृता-तवि.। ५. अ इच्छार्धकलारूपः पञ्चधा यो व्यवस्थितः-ख. नै. ज. झ. उ.। ६. क्रिया-ख. ने. ज. झ. उ.। ७. ज्ञाना-ख. ने. ज. झ. उ.। ८. हार्धार्धमध्यगा-ख. ने. ज. झ. उ.।
- पृ० १२१ की टिप्पणी देखिये। २. संकेतपद्धति के इस श्लोक को तन्त्रालोक के टीकाकार जयरथ ने (भा० ३, पृ० ८०) आगम वचन कहकर उद्धृत किया है।