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योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

१९२ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः अकारहकारसामरस्यरूपा परा वाग् आदियासां ताः पश्यन्तीमध्यमावैखर्यो वाचश्चतस्रः परावागादिवाचः। तदुक्तं संकेतपद्धत्याम्— अकारः सर्ववर्णाग्र्यः प्रकाशः परमः शिवः। हकारोऽन्त्यः कलारूपो विमर्शाख्यः प्रकीर्तितः ॥ अनयोः सामरस्यं यत् १परस्मिन् महसि स्फुटम्। वामाद्यैः २पिण्डितो योऽसावर्णः परिकीर्तितः॥ ३आदावस्य शिरो रौद्री वक्त्रं वामा प्रकीर्तिता। अम्बिका बाहुरित्युक्ता ज्येष्ठा चैव४ नखाग्रगा॥ ५एता हार्धकलारूपा रूपपञ्चतया स्थिताः। अवर्णः सर्ववर्णानां न पृथग् भासते बहिः॥ इच्छा शिरःप्रदेशस्था ६ज्ञाना च तदधोगता। क्रिया७ पादगता ह्यस्य शान्ता ८हृन्मध्यगा भवेत्॥ अकार और हकार जहाँ समरस रूप में छिपे रहते हैं, वह परा वाक् कहलाती है। आदि शब्द से पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी वाणी का ग्रहण किया जाता है। महाविद्या में वाणी के ये चारों स्वरूप विद्यमान हैं। उनका वर्णन संकेतपद्धति में इस तरह से मिलता है— अकार सभी वर्णों का अग्र्य है, सबसे पहले विद्यमान है। यह प्रकाशात्मक परम शिव का वाचक है। अन्तिम हकार विमर्शात्मक शक्तिकला का वाचक है। ये दोनों वर्ण परमप्रकाशमय अहन्ता में, परा वाणी में समरसभाव से स्थित हैं। यहीं प्रकाशमय अवर्ण १पश्यन्ती (उत्तीर्ण) अवस्था में वामा प्रभृति शक्तियों से संपिण्डित हो जाता है, तब २रौद्री शक्ति से इसका शिर, वामा से वक्त्र (मुँह), अम्बिका से बाहु और ज्येष्ठा से नखाग्र का निर्माण होता है। व्यष्टि और समष्टि के भेद से हार्धकलास्वरूपिणी ये शक्तियाँ पाँच रूपों में विभक्त हो जाती हैं। अकार सभी वर्णों में अनुस्यूत रहता है, अतः इसकी बाहर अलग से प्रतीति नहीं होती। अकार की ही भाँति हकार भी इच्छा प्रभृति शक्तियों में संपिण्डित हो जाता है, तब इच्छा शक्ति से इसका शिर, ज्ञान शक्ति से अधोगत देह, क्रिया से पाद भाग की निष्पत्ति होती है। शान्ता शक्ति हृदय के मध्य १. परस्मिन्नहमि-चि.। २. पञ्चभिर्योऽसावीश्वरः-क. ग.। ३. अकारस्य- तवि.। ४. चैवायुधं स्मृता-तवि.। ५. अ इच्छार्धकलारूपः पञ्चधा यो व्यवस्थितः-ख. नै. ज. झ. उ.। ६. क्रिया-ख. ने. ज. झ. उ.। ७. ज्ञाना-ख. ने. ज. झ. उ.। ८. हार्धार्धमध्यगा-ख. ने. ज. झ. उ.।

  1. पृ० १२१ की टिप्पणी देखिये। २. संकेतपद्धति के इस श्लोक को तन्त्रालोक के टीकाकार जयरथ ने (भा० ३, पृ० ८०) आगम वचन कहकर उद्धृत किया है।

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १९३ अष्टधाऽनाहतः प्रोक्तः शून्यादि¹प्रविभागतः । शून्यः स्पर्शस्तथा नादो ध्वनिर्बिन्दुस्तथैव च ॥ शक्तिबीजाक्षरं चेति ह्यष्टधाऽनाहतः स्मृतः । चत्वारिंशत्सप्तसंख्यो हतः स परिकीर्तितः ॥ क्षकारः कथितो योऽसौ संयोगो² द्विविधः स्मृतः । सप्तषष्ट्याख्यमेवं हि मातृकापीठमुत्तमम् ॥ ³अनाहतहतोत्तीर्णैस्त्रिभिर्भेदैः समन्ततः । स्थितो योऽसौ महापीठो⁴ मातृकाख्यो जयत्यसौ ॥ इति । में विराजमान है । शून्य आदि के भेद से 'अनाहत (मध्यमा वाक्)¹ आठ प्रकार का होता है । शून्य, स्पर्श, नाद, ध्वनि, बिन्दु, शक्ति, बीज, अक्षर ये अनाहत के आठ भेद होते हैं । ²हत नाद (वैखरी वाक्) के ४७ भेद होते हैं । क्षकार संयुक्ताक्षर है, अतः इसके दो भेद (क् ष्) हो जाते हैं । ³इन सबको मिलाकर ६७ वर्णों वाले उत्तम मातृका पीठ की निष्पत्ति होती है । इस प्रकार परा वाणी में समरस रूप से स्थित अकार-हकार वर्णों से ही अनाहत (मध्यमा), हत (वैखरी) और उत्तीर्ण (पश्यन्ती) के क्रम से त्रिधा विभक्त होकर यह मातृका पीठ सर्वत्र व्याप्त हो जाता है, सारे वाङ्मय को व्याप्त कर लेता है ॥ १. प्रतिभेदतः-ख. ने. ज. झ. उ. । २. संयोगादिति सार्वत्रिकः पाठः । अर्थ- रत्नावलीधृतः पाठोऽत्र स्थापितः । ३. अनाहतहतैर्मन्त्रैस्त्रिभिर्भेदैः समन्ततः-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. पीठमकाराख्यो-ख. ने. ज. झ. उ. ।

  1. पृ० १२३ की पहली टिप्पणी देखिये । अर्थरत्नावलीकार (पृ० ३६) ने संकेत- पद्धति के प्रस्तुत श्लोक की नवनादपरक व्याख्या की है । वहीं उद्धृत हंसनिर्णय में स्पष्ट ही नौ नादों का उल्लेख है । वर्णों की ६७ संख्या तभी पूरी हो सकती है ।
  2. अर्थरत्नावलीकार (पृ० ३६) वैखरी वाणी के ४७ भेदों में आकार से लेकर सकार पर्यन्त वर्णों की गणना करते हैं । अकार और हकार की प्रकाशविमर्शात्मकता के कारण इनका परा और पश्यन्ती वाणी में समावेश हो जाता है । ककार और षकार के संयोग से बने क्षकार की अलग से गणना नहीं की जाती और ळकार का वे लकार में ही अन्तर्भाव मानते हैं ।
  3. पश्यन्ती के ११, मध्यमा के ९ और वैखरी के ४७ भेदों के योग से यहाँ मातृका पीठ के ६७ वर्ण माने गये हैं । २५३

१९४ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः एवमेतत्परादिचतुर्विधतया वाङ्मयी, “अस्वरविमर्शरूपौ स्वांशौ हित्वा१ चतुष्कलो सैव” (२।२) इत्यादिसौभाग्यसुधोदयप्रतिपादितरीत्या परापश्यन्ती- मध्यमावैखरीमयत्वाद् विद्यायाः। अकथादित्रिपङ्क्त्यात्म२तार्तीयादिक्रमेण। अकथादीत्यादिशब्दोऽकारककारथकारैस्त्रिभिः संबध्यते। आदयो विसर्गान्ताः स्वराः षोडश, कादयस्तान्ताः षोडश, थादयः सान्ताः षोडश। एवमकथादिवर्णा३- त्मकतार्तीयादिकामराजादिवाग्भवादिक्रमेण अकारादिपङ्क्तिमयं तार्तीयम्, ककारादिपङ्क्तिमयं कामराजम्, थकारादिपङ्क्तिमयं वाग्भवमिति क्रमेण। पङ्क्तिशब्दो गणपरः, चतुर्विधमातृकामयत्वात्, अकथादिवैखर्यादि४वर्गगणत्रय- बीज५त्रयावयवत्वाच्च सेयं महाविद्या गणेशोऽभूदित्यर्थः ॥६३-६४॥ बीजबिन्दुध्वनीनां च त्रिकूटेषु ग्रहात्मिका ॥६४॥ हृल्लेखात्रयसंभूतैस्तिथिसंख्यैस्तथाक्षरैः । अन्यैर्द्वादशभिर्वर्णैरेषा नक्षत्ररूपिणी ॥६५॥ इस तरह से महाविद्या चारों वाणियों में व्याप्त होकर वाङ्मयी कहलाती है। सौभाग्यसुधोदय में भी इस विषय का विस्तार से वर्णन हुआ है और इसकी व्याख्या पहले (२।१७) की जा चुकी है। तदनुसार परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी वाणीमय यह विद्या अ क थ अक्षरों से बने तीन पंक्तिवाले तार्तीय आदि बीजों के क्रम से रखे गये वर्णगणों की स्वामिनी, अर्थात् गणेश का स्वरूप धारण कर लेती है। यहाँ अकार से विसर्ग पर्यन्त १६ स्वरों का प्रथम गण, ककार से तकार पर्यन्त सोलह अक्षरों का द्वितीय गण तथा थकार से सकार पर्यन्त सोलह अक्षरों का तृतीय गण बनता है। ये तीनों गण तीन पंक्तियों में रखे जाते हैं और क्रमशः ये महाविद्या के तार्तीय (शक्ति) बीज, कामराज और वाग्भव बीज का स्वरूप धारण करते हैं। अर्थात् अकारादि पंक्तिमय शक्ति बीज, ककारादि पंक्तिमय कामराज बीज और थकारादि पंक्तिमय वाग्भव बीज के क्रम से ये स्थित होते हैं। पंक्ति शब्द का अर्थ यहाँ गण किया गया है। इस तरह से यह सब चतुर्विध वाणी का ही विस्तार है और अन्ततः वैखरी अवस्था में अ क थ के वर्गों के तीन गणों से इस महाविद्या के तीन बीजों वाले अवयवों की निष्पत्ति होती है, अतः यह महाविद्या गणेश का स्वरूप धारण करती है ॥६३-६४॥ तीन कूटों में विद्यमान बीज, बिन्दु और ध्वनियों के कारण यह विद्या ग्रहा- त्मिका तथा तीन हृल्लेखाओं से उत्पन्न पन्द्रह अक्षरों और अन्य बारह अक्षरों के योग से यह विद्या नक्षत्ररूपिणी बन जाती है ॥६४-६५॥ १. भित्वा-ख. ग. ज. उ. । २. त्मकत्वं-क. ग. । ३. वर्णाः पङ्क्तित्रयात्मता- क. ग. । ४. 'वर्ग' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. त्रयत्वाच्च-ख. ने. ज. झ. उ. ।

द्वितीयः ] दीपिकभापानुवादसहितम् १९५ कूटशब्दोऽत्राक्षरपिण्डेऽपरः । यथोक्तमभियुक्तैः— "कूटेषु त्रिषु कार्यगौरव- वशादीकारशृङ्गक्रमात्" इति । सौभाग्यविद्याक्षरपिण्डेषु बीजबिन्दुध्वनीनां च, बीजम् ईकारान्ताक्षरजातम्, बिन्दुरुक्त(१।२८)लक्षणः, ध्वनिनादः, बीजबिन्दु- ध्वनीनां चेति तृतीयार्थे छान्दसः प्रयोगः । कूटत्रयबीजानि त्रीणि, बिन्दवस्त्रयः, नादास्त्रय इति नवभिर्ग्रहात्मिका विद्येत्यर्थः । बीजत्रयशिखरवर्ति²हृल्लेखात्रयसंभूतैस्तथाक्षरैर्हंकाररेफेकारबिन्दुनादात्मकै - स्तिथिसंख्यकैः पञ्चदशभिः, अन्यैर्हृल्लेखात्रयवर्जितैर्द्वादशवर्णैः कूटत्रयावयवैरेवं³ पञ्चदशभिर्द्वादशभिश्च४ सप्तविंशतिवर्णैः सर्वैर्नक्षत्ररूपिणोत्यर्थः ॥६५॥ विद्यान्तर्भूतशक्त्याद्यैः शाक्तैः षड्भिस्तथाक्षरैः । योगिनीत्वं च विद्याया राशित्वं चान्त्यवर्जितैः ॥६६॥ विद्यायाः पञ्चदशाक्षर्या अन्तर्भूताः शक्तयो हृल्लेखास्तित्रः, तदाद्याश्च लकारास्त्रयः। ५शाक्तैरेतैः षड्भिरक्षरैर्विद्याया योगिनोत्वम् । योगिन्यश्च डाकि- कूट शब्द यहाँ अक्षरपिण्ड (समूह) का वाचक है। “कूटेषु त्रिषु” इस अभियुक्त वचन में कूट शब्द इसी अर्थ में प्रयुक्त है। सौभाग्यविद्या के अक्षरसमूह में ईकार पर्यन्त अक्षर बीज कहलाते हैं। बिन्दु का लक्षण पहले (१।२८) बता दिया गया है। ध्वनि नाद को कहते हैं। प्रस्तुत श्लोक में तृतीया के स्थान पर षष्ठी विभक्ति का प्रयोग वैदिक पद्धति से किया गया है। तीन कूटों के तीन बीज, तीन बिन्दु और तीन नादों को मिलाकर विद्या का नवग्रहात्मक स्वरूप परिपूर्ण होता है। इसी तरह से तीन बीजों के शीर्ष स्थान में विराजमान तीन हृल्लेखाओं के हकार, रेफ, ईकार, बिन्दु और नादात्मक पन्द्रह अक्षरों और इन हृल्लेखाओं को छोड़कर तीन कूटों के बाकी बचे बारह अक्षरों को मिलाकर सत्ताईस वर्ण वाली यह महाविद्या नक्षत्ररूपिणी बन जाती है ॥६४-६५॥ पंचदशाक्षरी विद्या में अन्तर्भूत शक्ति वर्ण तीन हृल्लेखाओं और उनसे पहले स्थित तीन लकारों के कारण यह विद्या योगिनीस्वरूपिणी और अन्तिम तीन वर्णों को छोड़ देने पर राशिस্বরূপिणी बन जाती है ॥६६॥ पंचदशाक्षरी विद्या के अन्तर्भूत शक्तियाँ हैं तीन हृल्लेखाऐं और इन हृल्लेखाओं के पहले तीन लकार स्थित हैं। ये सभी वर्ण शाक्त कहलाते हैं। इन शाक्त अक्षरों के कारण यह विद्या योगिनी कहलाती है। अर्थात् डाकिनी प्रभृति छः योगिनियों का स्वरूप १. 'पिण्ड' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । २. ह्रींकार-ख. ने. ज. । ३. 'एवं' नास्ति- क. ख. ग. ने. । ४. 'च सप्तविंशति' नास्ति-ख. ज. झ. उ. । ५. रथा-ख. ने. च. छ. ६. 'शाक्तैः' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ.।

१९६ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः न्याद्याः षट् । अस्या¹ विद्यायाः पञ्चदशाक्षर्या अन्त्या हृल्लेखास्तित्रः, तद्वर्जिते- द्वादशभिर्वर्णे राशित्वं भवेदित्यर्थः । ²राशयो मेषाद्या द्वादश ।।६६।। उक्तमर्थं चक्रे व्यतिदिशति— एवं विश्वप्रकारा च चक्ररूपा महेश्वरी । एवमुक्तरीत्या योजितगणेशादिविश्वप्रकारा महेश्वरी त्रिपुरसुन्दरी चक्ररूपा देवता³ । विद्यापक्षवत् चक्रपक्षेऽपि गणेशत्वादिकं योज्यमित्यर्थः । योजनाप्रका- रस्तु—अकथादि⁴मयमध्यत्रिकोणरेखया गणेशत्वम्, नवकोणैर्ग्रहरूपत्वम्, वृत्तत्रय- चतुर्दशकोणबहिर्दशार⁵कोणैश्च नक्षत्ररूपत्वम्, अष्टकोणैर्ब्राह्म्यादियोगिनीसंख्यै- र्योगिनीत्वम्, पञ्चशक्तिचतुर्वह्निपद्मद्वयभूगृहै राशित्वम् ।।६७।। पुनश्च पूर्वोक्तलक्षणमेवार्थं गुरुशिष्ययोरप्यतिदिशति— देव्या देहे⁶ यथा प्रोक्तो गुरुदेहे⁷ तथैव हि⁸ ।। ६७ ।। धारण कर लेती है । इसी पंचदशाक्षरी विद्या की अन्तिम तीन हृल्लेखाओं को हटा देने पर विद्या में बारह अक्षर रह जाते हैं । इनसे विद्या का राशिमय स्वरूप बनता है । मेष, वृष आदि राशियां भी बारह होती हैं ।।६६।। विद्या के बाद अब चक्र में भी इसी विषय का निरूपण करते है— इसी तरह से चक्ररूपा महेश्वरी भी विश्व के गणेश आदि प्रकारों को धारण करती है ।।६७।। उक्त पद्धति से महेश्वरी त्रिपुरसुन्दरी जब श्रीचक्र का स्वरूप धारण करती है, तब भी उसमें गणेश, ग्रह, नक्षत्र आदि सभी प्रकारों का संनिवेश किया जा सकता है । अर्थात् विद्या के पक्ष में जैसे गणेश आदि पदों की योजना बताई गई, वैसे ही चक्र के पक्ष में भी इन सबकी योजना की जा सकती है । जैसे कि अकथादिमय मध्यत्रिकोण की तीन रेखाओं के कारण चक्र की गणेशस्वरूपता, नवकोणों के कारण ग्रहरूपता, तीन वृत्त, चतुर्दश कोण और बहिर्दशार कोण को मिलाकर नक्षत्ररूपता, ब्राह्मी आदि आठ योगि- नियों की संख्या वाले अष्टकोण के कारण योगिनीस्वरूपता तथा पाँच शक्ति, चार वह्नि, दो पद्म और भूगृह के योग से राशिस্বরূপता सिद्ध होती है ।।६७।। अब इसी अर्थ का अतिदेश गुरु और शिष्य में भी किया जा रहा है— देवी के देह में जैसे गणेश आदि स्वरूपों की योजना की गई, उसी तरह से १. 'अस्याः' नास्ति-ख. ने. झ. उ. । २. 'राशयो...सुन्दरी चक्ररूपा' नास्ति- ख. ज. उ. । ३. भवेदित्यर्थः । देवतामन्त्रविद्यापक्षवदेव, चक्रपक्षे तु-झ., देवताविद्यापक्षे । देवताचक्रपक्षे तु-ख. ज. उ. । ४. मयत्रिरेखामध्ये-क. ग. । ५. रूपेण-ख. ने. ज. उ. । ६. देहो-ख. ने. ङ. च. छ. ज. झ. उ. । ७. देहस्त-ख. ने. ङ. च. छ. ज. झ. उ. । ८. च-ख. ने. ङ. च. छ. ज. झ. उ. ।

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १९७ तत्प्रसादाच्च शिष्योऽपि तद्रूपः संप्रकाशते¹ । देव्याः त्रिपुरसुन्दर्याः, देहे² स्वेच्छागृहीतलीलाविग्रहे³, यथा प्रोक्तः—"एका- दशाधिकशतदेवतात्मतया पुनः । गणेशत्वं महादेव्याः" (२।५७) इत्यादिना । गृणीते तत्त्वमात्मीयमात्मीकृतजगत्त्रयम् । उपायोपेयरूपाय शिवाय गुरवे नमः ॥ इत्यभियुक्तवचनोक्तरीत्या देवतादेह⁴स्यैव गुरुत्वाद् गुरुदेहेऽपि⁵, यथा देव्या देहे गणेशत्वादिकं योजितं ⁶तथैव तद्रूपस्य⁷ गुरोरपि देहे तद् योज्यमित्यर्थः । तत्प्रसादात् स्वप्रकाशवपुषा गुरुः शिवो यः प्रसीदति पदार्थमस्तके । तत्प्रसादमिह तत्त्वशोधनं प्राप्य मोदमुपयाति भावुकः⁸ ॥ (चि० ३१) इत्यस्मदुक्तरीत्या प्राप्तगुरुप्रसादः शिष्यस्तद्रूपो देवतारूप एव संप्रकाशत इति । अतो यथा देव्या गुरोश्च देहे गणेशत्वादिकं योजितम्, तथैव शिष्यदेहेऽपि योज- नीयमित्यर्थः ॥६७-६८॥ गुरु के देह में भी इन सबकी भावना करनी चाहिये । अन्ततः गुरु के प्रसाद से शिष्य में भी इन सब स्वरूपों की अभिव्यक्ति हो जाती है ॥६७-६८॥ देवी त्रिपुरसुन्दरी के अपनी इच्छा से परिगृहीत लीलामय शरीर में जैसे एक सौ ग्यारह देवताओं के गण की स्थिति होने से उसकी गणेशता स्वीकार की गई है, उसी पद्धति से गुरु के देह में भी इन सबकी भावना करनी चाहिये । किसी अभियुक्त के “गृणीते” प्रभृति वचन के प्रमाण से गुरु की शिव से अभिन्नता बताई जा चुकी है (२।२६) । तदनुसार देवता ही गुरुदेह के रूप में अवतरित होती है । अतः जैसे देवी के देह में गणेश आदि की योजना की गई, उसी तरह से देवीस्वरूप गुरु के देह में भी इन सबकी योजना करनी चाहिये । गुरु के प्रसाद (कृपा) से ही— अपने प्रकाशमय स्वरूप के कारण यह शिवस्वरूप गुरु जिस पर प्रसन्न हो जाता है, जिस शिष्य के मस्तिष्क में अपनी कृपादृष्टि से ज्ञान का प्रकाश फैला देता है, तब ज्ञान- चक्षु के खुल जाने से वह साधक सभी बाह्य तत्त्वों का शोधन कर परमानन्द स्वरूप में लीन हो जाता है ॥ स्वयं ग्रन्थकार द्वारा रचित चिद्विलास स्तव के इस वचन के अनुसार स्वयं शिष्य भी देवता के स्वरूप में प्रकाशित हो उठता है । अतः जैसे देवी और गुरु के देह में गणेश १. संप्रजायते-क. ग. । २. 'देहे' नास्ति-ख. ने. ज. उ. । ३. गृहीतविग्रहो-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. रूप-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. देहोऽपि देव्या देहवद् गणेश-ख. ने. ज. उ. । ६. 'तथैव' नास्ति-ख. ज. झ. उ. । ७. तद्रूपो गुरुदेहोऽपि यथेष्ट इत्यर्थः-ख. ने. ज. झ. उ. । ८. भावतः-ख. ग. ज. झ. उ., भावितः-ने. । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

१९८ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः कौलिकार्थमुपसंहरति— इत्येवं कौलिकार्थस्तु कथितो वीरवन्दिते ॥६८॥ इतिशब्दः प्रसङ्गपरिसमाप्तिपरः । एवंशब्दः पूर्वोक्तानुवादपरः । शेषं स्पष्टम् ॥६८॥ अथ क्रमप्राप्तं सर्वरहस्यार्थं वक्तुं प्रतिजानीते— तथा सर्वरहस्यार्थं कथयामि तवानघे । तथाशब्दः पूर्वोक्तार्थप्रकारपरामर्शार्थः । सर्वरहस्यार्थं पूर्वोक्तसर्वेभ्यो रहस्यम्, परप्राप्तिरूपत्वात् ॥६९॥ सर्वरहस्यार्थमेवाह— मूलाधारे तडिद्रूपे वाग्भवाकारतां गते ॥६९॥ अष्टात्रिंशत्कलायुक्तपञ्चाशद्वर्णविग्रहा । विद्या कुण्डलिनीरूपा मण्डलत्रयभेदिनी ॥७०॥ आदि स्वरूपों की भावना की जाती है, उसी तरह से शिष्य को अपने देह में भी इन सबकी भावना करनी चाहिये ॥६७-६८॥ अब कौलिकार्थ का उपसंहार करते हैं— हे वीरवन्दिते ! इस तरह से मैंने यह कौलिकार्थ तुमको सुनाया है ॥६८॥ इति शब्द यहाँ प्रस्तुत कौलिकार्थ प्रकरण की समाप्ति का सूचक है। एवं शब्द पूर्वोक्त प्रकार का निर्देशक है । बाकी पदों का अर्थ स्पष्ट है ॥६८॥ इसके उपरान्त क्रमप्राप्त सर्वरहस्यार्थ को कहा जा रहा है— हे अनघे ! अब मैं तुम्हें सर्वरहस्यार्थ को समझा रहा हूँ ॥६९॥ तथा शब्द यहाँ पूर्वोक्त षड्विध अर्थ का सूचक है। पहले छः प्रकार के अर्थों की चर्चा कर उनमें से कुछ का वर्णन कर दिया गया है। अब सर्वरहस्यार्थ का स्वरूप बताया जा रहा है। परम स्वरूप की प्राप्ति कराने वाला यह अर्थ पूर्व की अपेक्षा अधिक रहस्यमय है, अतः इसे सर्वरहस्यार्थ नाम दिया गया है ॥६९॥ अब १सर्वरहस्यार्थ का वर्णन किया जा रहा है। बिजली के समान कान्ति वाले, वाग्भव (त्रिकोण) के रूप में परिणत मूला- धार में अड़तीस कलाओं से युक्त पचास वर्णों का शरीर धारण करने वाली विद्या कुण्डलिनी के रूप में विराजमान है। तीन मण्डलों का भेदन करने वाली, करोड़ों विद्युत्पुंजों के समान कान्तिवाली, कमलनाल में विद्यमान तन्तुओं के समान १. षतप्रकारा—क. ग. । २. कुल—ख. । १. यहाँ सर्वरहस्यार्थ का निरूपण ६९-७२ श्लोकों में किया गया है।

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १९९ तडित्कोटिनिभप्रख्या बिसतन्तुनिभाकृतिः । व्योमेन्दुमण्डलासक्ता सुधास्रोतःस्वरूपिणी ॥७१॥ सदा व्याप्त¹जगत्कृत्स्ना सदानन्दस्वरूपिणी । एषा स्वात्मेति बुद्धिस्तु रहस्यार्थो महेश्वरि ॥७२॥ मूलाधारे पूर्वोक्त(१।२५)लक्षणे, तडिद्रूपे ²विद्युद्वर्णे, वाग्भवाकारतां गते, वाचः परापश्यन्तीमध्यमावैखर्यः, ताभिर्वाग्भिर्भवतीति वाग्भवं त्रिकोणम्, तदुक्त- मत्रैव—"आत्मनः स्फुरणम्" (१।३६) इत्यादिना "क्रियाशक्तिस्तु रौद्रीयं वैखरी विश्वविग्रहा"(१।४०)इत्यन्तेन। तदाकारतां गते तद्रूपेण परिणते। अष्टात्रिंशत्कलाः, वह्नेर्धूम्मार्चिराद्या दश, सूर्यस्य तपिन्याद्या द्वादश, सोमस्यामृताद्याः षोडश, एव- मेता अष्टात्रिंशत्कलाः, ³ताभिर्युक्तैः पञ्चाशद्वर्णैरकारादिक्षकारान्तैः, वह्नि- कलाभिर्दशभिर्युक्ता यादयो दश वर्णाः, सूर्यकलाभिर्द्वादशभिर्युक्ताः क्रमोत्क्रमकभा- अत्यन्त सूक्ष्म आकृति वाली यह कुण्डलिनी शक्ति जब शून्यगगन में चन्द्रमण्डल से संयुक्त होती है, तो अमृतरस बरसने लगता है। सदा आनन्दस्वरूपिणी यह शक्ति अपने इस अमृतरस से सारे संसार को आप्यायित किये रहती है। यह शक्ति स्वयं मेरी ही आत्मा है, ऐसी बुद्धि ही रहस्यार्थ के नाम से यहाँ बताई गई है ।६९-७२। मूलाधार का स्वरूप पहले (१।२५) बताया जा चुका है। बिजली के समान कान्ति वाला यह मूलाधार यहाँ वाग्भव (त्रिकोण) के आकार में परिणत हो गया है। ¹परा, पश्यन्ती मध्यमा और वैखरी वाणियों से जो उत्पन्न होता है, उसे वाग्भव कहते हैं। यह वाग्भव त्रिकोण है। त्रिकोण की उत्पत्ति उक्त वाणियों से होती है, इस विषय का वर्णन पहले (१।३६-४०) किया जा चुका है। यहाँ बताया गया है कि मूलाधार ही वाग्भव (त्रिकोण) के रूप में परिणत हो जाता है। वह्नि की धूम्नार्चि आदि दस, सूर्य की तपिनी आदि बारह और सोम की अमृता आदि सोलह कलाएँ मिलकर कुल ²अड़तीस कलाएँ होती हैं। पचास वर्ण इन कलाओं से इस तरह से संबद्ध है—यादि दस वर्ण वह्नि की दस कलाओं १. व्याप्तं जगत्कृत्स्नं-ख. ने. च. छ. ज. झ. । २. विद्युत्सस्वर्णवर्णे-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. ताभिर्युक्ताः पञ्चाशद्वर्णाः-क. ग. झ. । १. आगे (३।५) भी वाग्भव पद की व्याख्या दी गई है। वहाँ वाग्भव से परा प्रभृति वाणियों की उत्पत्ति बताई गई है। वाग्भव पद में तत्पुरुष और बहुव्रीहि समास मान कर दोने ही अर्थ किये जा सकते हैं, क्योंकि बिन्दु और त्रिकोण की अलग अलग रेखाओं से परा प्रभृति वाणियों की उत्पत्ति मानी जाती है और त्रिकोण की परिपूर्णता इसकी अलग अलग रेखाओं से वाणियों की उत्पत्ति के उपरान्त ही होती है। २. पृष्ठ ९४ की टिप्पणी देखिये।

२०० योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः द्याश्चतुर्विंशतिवर्णाः, सोमकलाभिः षोडशभिर्युक्ता अकारादयः षोडश स्वराः, एव- मेते पञ्चाशद्वर्णा विग्रहो यस्याः सा तथा। विद्या१ सौभाग्यविद्या। "स्वरव्यञ्जन- भेदेन२......षट्त्रिंशत्तत्त्वरूपिणी" (२।३३) इति पूर्वोक्तरीत्या षट्त्रिंशत्तत्त्वावयव- वत्पञ्चाशदक्षरमयी वैखरीत्मिका ३कुण्डलिनीरूपा तस्य मध्ये वह्निशिखा अणीयोर्ध्वा व्यवस्थिता ॥ नीलतोयदमध्यस्था विद्युल्लेखेव भास्वरा४ । नीवारशूकवत् तन्वी पीता भास्वत्यणूपमा ॥ (तै० आ० १०।११।११-१२) ५इति श्रुत्युक्तरीत्या भुजङ्गभोगसदृशी ज्योतिर्लता। मण्डलत्रयभेदिनी, मण्डल- त्रयं६ मूलहृदयभ्रूमध्यस्थितानां वह्निसूर्यसोममण्डलानां त्रयम्, तद्भेदिनी। मण्डल- त्रयं भित्त्वा तन्मध्यमार्गेणाकुलं प्रवेष्टुमुद्यतेत्यर्थः। तडित्कोटिनिभप्रख्या तडि- त्कोटीनां निभा सदृशी प्रख्या कान्तिर्यस्याः सा। बिसतन्तुनिभाकृतिः बिसतन्तुवत् सूक्ष्मरूपा। व्योमेन्दुमण्डलासक्ता से संबद्ध हैं, सूर्य की बारह कलाओं से क्रम से कादि बारह वर्ण और उत्क्रम (विपरीत क्रम) से १भादि बारह वर्ण और सोम की सोलह कलाओं से अकारादि सोलह स्वर संयुक्त हैं। इस तरह से अड़तीस कलामय पचास वर्णों से इस सौभाग्यविद्या का स्वरूप बनता है। पहले (२।३३) विद्यागत स्वर और व्यंजन के भेद से छत्तीस तत्त्वों के अवयव वाली विद्या का निरूपण किया गया है। वही विद्या पचास वैखरी वर्णों वाली कुल- कुण्डलिनी कहलाती है। समस्त शरीर में व्याप्त उस अग्नि के बीच में से सुषुम्ना नाडी के सहारे ऊपर उठती हुई अत्यन्त सूक्ष्म आकृति वाली एक ज्वाला (कुण्डलिनी) ब्रह्मरन्ध्र पर्यन्त व्याप्त हो जाती है। वर्षा ऋतु के काले बादलों के बीच में चमकने वाली बिजली की सी इसकी चकाचौंध होती है। नीवार शूक [जौ की बाल] के समान सूक्ष्म आकृति वाली यह ज्वाला (कुण्डलिनी शक्ति) अत्यन्त सूक्ष्म और चमकीले पीले वर्ण की होती है॥ इस तैत्तिरीय आरण्यक श्रुति में इसी का वर्णन किया गया है। इसका आकार सांप के फण के समान होता है। यह ज्योतिर्लता मूलाधार, हृदय और भ्रूमध्य में स्थित वह्नि सूर्य और सोम नामक तीनों मण्डलों का भेदन करने वाली है। इन तीनों मण्डलों को भेद कर वह सुषुम्ना के मध्य मार्ग से अकुल कमल में प्रवेश पाने को उद्यत रहती है। १. 'विद्या' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ.। २. सम्पूर्णः श्लोकः-क. ग.। ३. कुलकुण्ड- ख. ग. ज. झ. उ. । ४. भासुरा-ने. ज.। ५. इत्यस्मदुक्त-ख. ग. ने. ज. झ. उ., इत्युपनिषदुक्त-ब.। ६. त्रयमाधार-ख. ने. ज. झ. उ. । I. यहाँ भी मकार का समावेश कहीं नहीं किया गया है। इसके लिये पृ० २६ की टिप्पणी देखिये।

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २०१ ^१ललाटोर्ध्वं समारभ्य कपालोर्ध्वावसानकम् । ^२त्र्यङ्गुलोर्ध्वं शिरोदेशे परं व्योम प्रकीर्तितम् ॥ इति स्वच्छन्दसंग्रहोक्तरीत्या परे व्योम्नि यदिन्दुमण्डलं चिच्चन्द्रबिम्बम्, तत्रासक्ता । सुधास्रोतःस्वरूपिणी तद्गलितामृतप्रवाहरूपा । सदा ^३व्याप्त- जगत्कृत्स्ना सदा कालत्रयेऽपि षट्त्रिंशत्तत्त्वात्मकं जगत् कृत्स्नं व्याप्तं ययेति शेषः । सदानन्दस्वरूपिणी ^४सदानन्दः परशिवः स्वरूपं यस्याः सा सदानन्दस्वरूपिणी । एषा ^५चिन्मयी कुण्डलिनीशक्तिः ^६स्वात्मेति बुद्धिस्तदात्मतया समावेशो रहस्यार्थ इत्यर्थः । तदुक्तं चतुःशतीशास्त्रे— यदोल्लसति शृङ्गाटपीठात् ^७कुण्डलरूपिणी ॥ शिवार्कमण्डलं भित्त्वा द्रावयन्तीन्दुमण्डलम् । तदुद्भूवामृतस्यन्दपरमानन्दनन्दिता ॥ कुलयोषित् कुलं त्यक्त्वा परं पुरुषमेति सा । करोड़ों बिजलियों की सी इसकी चकाचौंध रहती है । कमलनाल में विद्यमान तन्तुओं के समान यह अत्यन्त सूक्ष्म स्वरूप वाली है । यह व्योमेन्दुमण्डल में आसक्त है, ललाट के ऊर्ध्वभाग से लेकर कपाल के ऊर्ध्व भाग पर्यन्त स्थान को शिरःप्रदेश कहा जाता है । इसमें दो अंगुल ऊँचा स्थान परम व्योम कहा गया है ॥ स्वच्छन्दसंग्रह के इस वचन के प्रमाण पर परम व्योम में जो ज्ञानस्वरूप चन्द्रमण्डल विद्यमान है, इसको प्राप्त करने के लिये वह लालायित रहती है । उसको प्राप्त कर लेने पर वह चन्द्रमण्डल से निकलने वाले अमृत से ओत-प्रोत हो जाती है । यह शक्ति तीनों कालों में छत्तीस तत्त्वमय इस सारे जगत् को व्याप्त कर विराजमान है । यह देवी सदा आनन्द से ओत-प्रोत अपने परम शिवममय स्वरूप में प्रतिष्ठित है । यह चिन्मयी कुण्डलिनी शक्ति मेरी ही आत्मा है, इस प्रकार की बुद्धि, अर्थात् ऊपर वर्णित स्वात्मस्वरूपिणी कुण्डलिनी शक्ति के रूप में स्वात्मस्वरूप का समावेश, एकाग्रता ही यहाँ रहस्यार्थ का स्वरूप है । चतुःशतीशास्त्र में यह इस तरह से वर्णित है— कुण्डलरूपिणी यह कुण्डलिनी शक्ति जब शृंगाट पीठ (त्रिकोण) से उठती है, तब वह मंगलमय रविमण्डल को भेद कर और इन्दुमण्डल को द्रवित करती हुई आगे बढ़ती है । इन्दुमण्डल से उत्पन्न अमृत की वर्षा से वह परम आनन्द में निमग्न हो जाती है । तब यह कुलकुण्डलिनी शक्ति अपने कुल (शक्तिचक्र) को छोड़ कर अकुल नामक पर पुरुष के पास १. द्वादशान्तं ललाटोर्ध्वं-ख. ने. ज. उ. । २. द्वयङ्गु-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. व्याप्तं जगत्कृत्स्नं-झ. उ. । ४. स्वसंविदानन्दस्य भावः सदानन्दः-क. । ५. 'चिन्मयी' नास्ति-क. । ६. स्वात्मशक्ति बुद्धिः स्वात्मेति-ख. ने. ज. । ७. कुटिल-मु. ।

२०२ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः निर्लक्षणं निर्गुणं च कुलरूपविवर्जितम् ॥ ततः स्वच्छन्दरूपा ^१तु परिगृह्य जगत्पतिम् । तेन ^२मार्गेण सन्तुष्टा पुनरेकाकिनी सती ॥ रमते ^३स्वयमव्यक्ता त्रिपुरा व्यक्तिमागता । इति ॥६९-७२॥ (नि० षो० ४।१२-१६) अथ क्रमप्राप्तं महातत्त्वार्थं वक्तुं प्रतिजानीते-- महातत्त्वार्थ इति यत् तच्च देवि वदामि ते । ^४स्पष्टम् ॥७३॥ महातत्त्वार्थमेवाह— निष्कले परमे सूक्ष्मे ^५निर्लक्ष्ये भाववर्जिते ॥७३॥ व्योमातीते परे तत्त्वे प्रकाशानन्दविग्रहे । विश्वोत्तीर्णे विश्वमये तत्त्वे स्वात्मनि योजनम् ॥७४॥ निष्कले निरवयवे, कला अवयवाः । परमे महद्भ्योऽपि महीयसि । सूक्ष्मे अणोरप्यणीयसि । निर्लक्ष्ये करणेन्द्रियाद्यगोचरे । ^६भाववर्जिते ^७‘भावनागम- पहुँच जाती है। यह पर पुरुष सभी गुणों और धर्मों से रहित है, कुल और रूप से भी यह शून्य है। उसको पाकर वह शक्ति स्वेच्छाचारिणी हो जाती है, उस जगत्पति के साथ समरस हो जाती है। इस अवस्था से सन्तुष्ट होकर वह पुनः अकेली हो जाती है। इस तरह से यह अव्यक्त स्वरूपिणी भगवती त्रिपुरा व्यक्त होकर नाना प्रकार की क्रीडा करती है ॥६९-७२॥ अब क्रमप्राप्त ^१महातत्त्वार्थ का वर्णन करते हैं— हे देवि ! यह जो महातत्त्वार्थ है, अब उसे मैं तुम्हें समझा रहा हूँ ॥ इसका अर्थ स्पष्ट है ॥७३॥ उसी को समझा रहे हैं— निष्कल, परम सूक्ष्म, निर्लक्ष्य, भाववर्जित, व्योमातीत, प्रकाश और आनन्द स्वरूप, विश्वोत्तीर्ण और विश्वमय परम तत्त्व में अपने को विलीन कर देने का ही नाम महातत्त्वार्थ है ॥७३-७४॥ कला अवयवों को कहते हैं। यह परम तत्त्व निष्कल है, निरवयव है। यह परम है, महान् से भी महान् है । सूक्ष्म है, सूक्ष्म से भी सूक्ष्म है। अन्तःकरण, बहिरिन्द्रिय आदि १. तद्विभ्राम्य जगत्प्रभुम्-क. ग., परिभ्रम्य जगत्पुनः-मृ.। २. चारेण-मृ. । ३. सेय- क. ग. झ. । ४. स्पष्टमेतत्-ज. । ५. निर्मले-झ. । ६. ‘भाववर्जिते’ नास्ति-ख. ने. ज. उ. । ७. कल्पनातिग-मृ. ।

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २०३ मतीन्द्रियं च यल्लक्ष्यमुक्तम्"१ (श्लो० १६) इति चिद्गगनचन्द्रिकोक्तरीत्या भावना- गम्ये । व्योमातीते व्योम पूर्वोक्त(२।७१)लक्षणं तदतीते । परे तत्त्वे २सकलतत्त्वा- तीते परमार्थे । प्रकाशानन्दविग्रहे, प्रकाशो ज्योतिषां ज्योतिरनुत्तरम्, आनन्दः सकलवैषयिकानन्दसमष्टिभूतः परमानन्दः, तौ प्रकाशानन्दौ विग्रहो यस्य, तस्मिन् । विश्वोत्तीर्णे विमुक्तसकलजगदुत्तीर्णे । विश्वमये देशकालपदार्थात्म यद्यद्वस्तु यथा तथा३ । तत्तद्रूपेण या भाति तां श्रये ४सांविदीं कलाम् ॥ (सौ० हृ० ४) इति प्रामाणिकोक्तवचनरीत्या तत्तदात्मनाऽवभासमाने, तत्त्वे "तत्त्वमसि" (छा० उ० ३।८।७) इत्युपनिषद्वक्य५परमार्थ६परविद्याप्रदायकपरशिवरूपे निजगुरु- प्रबोधितनिर्मलस्वभावे स्वात्मनि योजनं तदेकतानुप्रवेशा महातत्त्वार्थ इत्यर्थः ॥७३-७४॥ का विषय न होने से यह निर्लक्ष्य है, किसी को दिखाई नहीं पड़ता । यह भाववर्जित है, सभी प्रकार के स्वभावों से शून्य होने से केवल भावना के सहारे ही यहाँ पहुँचा जा सकता है। चिद्गगनचन्द्रिका में बताया गया है—"यह अतीन्द्रिय तत्त्व केवल भावना के द्वारा ही लक्षित हो सकता है" । व्योम (परम व्योम) का स्वरूप अभी (२।७१) बताया गया है । उस परम व्योम पद से भी यह ऊपर है । समस्त तत्त्वों से भी ऊपर है, अतः इसे पर तत्त्व कहते हैं । समस्त तत्त्वों से अतीत यह पर तत्त्व ही परमार्थ है, वास्तविक है । इसका स्वरूप प्रकाश और आनन्दमय है । यह सभी ज्योतियों का प्रकाशक अनुत्तर प्रकाश है और समस्त वैषयिक आनन्दों का समष्टिभूत परमानन्द है । यह विश्वोत्तीर्ण तत्त्व है, विमुक्त अवस्था में यह सारे जगत् से ऊपर उठ जाता है । यह विश्वमय भी है, संसारावस्था में यही तत्त्व विभिन्न रूपों में भासित होता है । शिवानन्द मुनि सौभाग्यहृदय स्तोत्र में कहते हैं— देश, काल और पदार्थ के रूप में जो जो वस्तु जिस किसी रूप में भासित हो रही है, उन सभी रूपों में संवित्स्वरूपिणी भगवती त्रिपुरा ही एकमात्र भासमान है । मैं उसी की शरण में जाता हूँ ॥ इस तरह से विश्व के समस्त पदार्थों में भासमान यह परतत्त्व विश्वमय भी है । इस परम तत्त्व में "वह तुम ही हो" इस तरह के उपनिषद् वाक्यों द्वारा प्रतिपादित पर- मार्थ स्वरूप परविद्या के प्रदायक परम शिव के स्वरूप में, अपने गुरु के द्वारा जगाये गये अपने ही निर्मल स्वभाव में अपने को नियोजित कर देना, अपनी अभेदप्रतीति को निरन्तर जगाये रखना ही महातत्त्वार्थ कहलाता है ॥७३-७४॥ १. मुञ्जति-मु. । २. सकलतत्त्वार्थपर-ख. ने. ज्ञ. झ. उ. । ३. यथा-मु. । ४. संविदं-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. द्वाक्यार्थपरमार्थे-ख. ने. ज. झ. उ. । ६. 'पर'.... त्त्वार्थः' नास्ति-ख. ने. ज. उ. ।

२०४ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः नन्वेवंविध२लक्षणं स्वात्मतत्त्वं केन प्रमाणेनावसीयत इत्यत आह— तदा प्रकाशमानत्वं तेजसां तमसामपि। अविनाभावरूपत्वं तस्माद् विश्वस्य सर्वतः॥७५॥ २यदा शिवः सर्वप्राणिनां चित्ते परिस्फुरति, तदा 'आत्मा मनसा संयुज्यते, मन इन्द्रियेण, इन्द्रियमर्थेन'' (न्या० भा० १।१।४) इति तन्त्रान्तरोक्तरीत्या तेजसां सूर्यादीनां तमसां घटादीनां जडानामपि प्रकाशमानत्वम्। चित्ते चिदात्मनि परमशिवे प्रथमं परिस्फुरति सत्येव तत्तदिन्द्रियद्वारा तत्तदर्थानां परिस्फुरणम्। अत्र श्रुतिः—"तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति" (क० उ० ५।१५) इति। तस्मात् सर्वतः सर्वस्य विश्वस्य उक्त (१।४१) लक्षणस्य अविनाभाव- रूपत्वम्, विना न भवतीत्यविनाभावः। कोऽर्थः ? विश्वमिदं द्रष्टृसापेक्षप्रतीतिकं दृश्यत्वात्, यद्यद् दृश्यं तत्तद् द्रष्टृसापेक्षप्रतीतिकम्, यथा सम्प्रतिपन्नो घटः, यद् द्रष्टृसापेक्षप्रतीतिकं न भवति तद् दृश्यमपि न भवति, यथा शशविषाणम्; इत्याद्यन्वयव्यतिरेकसिद्धेनानुमानप्रमाणेनावसीयत इत्यर्थः ॥७५॥ अब प्रश्न होता है कि ऊपर जिस स्वात्मस्वरूप का वर्णन किया गया है, उसकी प्रतीति हमें कैसे होगी ? इसी का उत्तर देते हैं— इस परम स्वरूप के प्रकाश से ही तेज और तम सभी प्रकाशित होते हैं। इस लिये यह सारा विश्व इसमें अभिन्न रूप में स्थित है ॥७५॥ जब शिव सब प्राणियों के हृदय में स्फुरित होते हैं, तब "आत्मा मन से, मन इन्द्रियों से और इन्द्रियां विषय से संयुक्त होती है" न्यायभाष्य की इस पद्धति से सूर्य प्रभृति तेजस्वी पदार्थों का तथा घट प्रभृति तमोमय (जड़) पदार्थों का भी बोध होता है। चित्त में चिदात्मस्वरूप परम शिव का पहले परिस्फुरण होने पर ही उन-उन इन्द्रियों की सहा- यता से उन-उन विषयों का ज्ञान हो पाता है। कठोपनिषद् भी कहती है—"उसका प्रकाश होने पर ही बाकी सब वस्तुएँ भासित होती हैं, इसी के प्रकाश से यह सब कुछ प्रका- शित है"। इसलिये पूर्वोक्त (१।४१) लक्षण वाला यह सारा जगत् उस परम शिव में ही अनुस्यूत है, उसके बिना जगत् की स्थिति ही नहीं बन सकती। इसका अभिप्राय यह है कि इस विश्व की प्रतीति के लिये द्रष्टा की अपेक्षा है, क्योंकि यह दृश्य है, जो जो दृश्य पदार्थ हैं, उनकी प्रतीति द्रष्टा द्वारा ही होती है, जैसे दृश्य रूप में स्वीकृत घट की प्रतीति द्रष्टा करता है। जिसकी प्रतीति द्रष्टा के अधीन नहीं होती, वह दृश्य भी नहीं होता, जैसे खरगोश की सींग। इस तरह अन्वय और व्यतिरेक की सहायता से अनुमान प्रमाण के द्वारा यह सिद्ध होता है कि दृश्य जगत् का द्रष्टा वह स्वात्मस्वरूप परम शिव ही है ॥ ७५ ॥ १. पदलक्षणं सर्वाङ्गीणं... २. यदा सर्वप्राणिनां चे...

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २०५ अथवा अलं प्रमाणचिन्तया, प्रमाणानामपि चिदनुप्रवेशेनैव प्रमाणत्वात् तेषा- मपि ^१स्वरूपमेतत्सद्भावं साधयितुमलम्, तस्य प्रकाशरूपत्वादित्याह— प्रकाशते महातत्त्वं दिव्यक्रीडारसोज्ज्वले। महातत्त्वं देशकालाकारैरनवच्छिन्नं तत्त्वं प्रकाशते ^२स्वयमेव, तेन विना न तत्किमपि प्रकाशयितुमलम्, तस्यैव प्रकाशेन ^३सर्वत्र प्रकाशात्। अत्र श्रुति- स्मृती— “तस्य भासा सर्वमिदं विभाति" (क० उ० ५।१५) इति, "न तद् भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः" (भ० गी० १५।६) इति च। अभियुक्तवचोऽपि— अवधानैकतानानां मतिरेवात्र साक्षिणी। किं प्रमाणै^४र्वराकंस्तैश्चिदनुप्राणितात्मभिः॥ नहि वैकर्तनं ज्योतिर्दीपालोकमपेक्षते। (प० प० ११-१२) इति। अथवा उस स्वात्मस्वरूप के लिये किसी प्रमाण की चिन्ता करना व्यर्थ है। प्रमाणों की प्रवृत्ति भी, उनका प्रामाण्य भी चिच्छक्ति की सहायता से ही निश्चित होता है, अतः इन प्रमाणों के प्रकाशक के रूप में भी इस स्वात्मस्वरूप का सद्भाव सिद्ध होता है— हे शिवशक्तिसामरस्यस्वरूपिणि देवि ! यह महातत्त्व स्वयं ही प्रकाशित होता है, अर्थात् इसके प्रकाश के लिये किसी दूसरे तत्त्व की आवश्यकता नहीं है ॥७६॥ यह देश, काल, आकार आदि से अपरिच्छिन्न महातत्त्व स्वयं ही प्रकाशित होता है। इसके बिना कोई भी वस्तु प्रकाशित नहीं हो सकती। इसी के प्रकाश से बाकी सब वस्तुएँ प्रकाशित होती हैं। श्रुति का कहना है कि उस ब्रह्म के प्रकाश से ही सब कुछ प्रकाशित होता है। स्मृति (गीता) भी कहती है कि उस ब्रह्म को सूर्य, चन्द्रमा अथवा अग्नि भी प्रकाशित नहीं कर सकती। किसी प्रामाणिक ^१व्यक्ति ने भी कहा है— पूरी सावधानी बरतने वाले योगियों की एकाग्र बुद्धि ही मात्र इस परम तत्त्व का साक्षात्कार कर सकती है। बेचारे प्रमाणों की प्रवृत्ति यहाँ कैसे हो सकती है, क्योंकि उनका संचालन तो यह चिच्छक्ति ही करती है। सूर्य को प्रकाशित करने के लिये बेचारे दिये की क्या औकात हो सकती है ? १. 'स्वरूपम्' नास्ति-क. ग. ज. झ. । २. स्वत एव-ख. ज. झ. उ. । ३. सर्वाणि प्रकाशन्त इति-ज. झ. उ., प्रकाशन्ते सर्वाण्यपि-क.। ४. र्वचोभिश्च स्वप्रकाशे चिदात्मनि- ख. ते. ज. झ. ।

  1. इस उक्ति से स्पष्ट हो जाता है कि परापंचाशिका किसी व्यक्ति की रचना है। अतः कश्मीर ग्रन्थमाला में अनुत्तरप्रकाशपंचाशिका के नाम से प्रकाशित इस ग्रन्थ के प्रारंभ में दिया गया नाम (आद्यनाथ) भगवान् शंकर का वाचक न होकर किसी व्यक्ति विशेष का नाम है।

२०६ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः दिव्यक्रीडारसोज्ज्वले । १'देव्याः संबुद्धिः । २'दिवि भवो दिव्यः परमशिवः, तस्य क्रीडा विश्वसर्जनादिव्यवहारक्रियात्मिका चिच्छक्तिः, तयोः रसः सामरस्यम्, तेनोज्ज्वले नित्यं शिवशक्तिसामरस्यपरायणप्रतीते देवि इत्यर्थः ॥७६॥ ननु महातत्त्वार्थज्ञानस्य फलं यागादिकर्मणामिव देहान्तरदेशान्तरकालान्तर- भाविप्रत्ययः किम् ? नेत्याह— निरस्तसर्वसंकल्पविकल्पस्थितिपूर्वकः ॥७६॥ रहस्यार्थो महागुप्तैः सद्यः प्रत्ययकारकः । इदमहं करिष्यामीति मानसं कर्म संकल्पः, एवं मया कर्तव्यं न वेति कोटि- द्वयावलम्बि ज्ञानं विकल्पः । शिव४स्वातन्त्र्यभावे तु तौ निरस्तौ यत्परिज्ञान- मात्रतः, तदुभयनिरासादेव मनःस्थैर्यं स्थितिर्जायते । तत्पूर्वको रहस्यार्थ आकर्णन- योग्यो न भवति । अत एव ३महागुप्तः, न५ कस्यापि कथितः, अत्यन्तयत्नेन दिव्यक्रीडारसोज्ज्वले यह देवी का संबोधन है । दिव्य शब्द यहाँ परम शिव का वाचक है । उसकी क्रीडा है विश्व के सृष्टि आदि व्यवहारों का संचालन करने वाली चिच्छक्ति । इसका अर्थ है सामरस्य । इस तरह से परम शिव और चिच्छक्ति के सामरस्य से उल्ल- सित स्वरूप वाली यह देवी यहाँ संबोधित है । इसका भाव यह है कि हे देवि ! शिव और शक्ति के सामरस्यमय स्वरूप को जानने के लिये जो साधक निरन्तर सचेष्ट रहते हैं, उन्हीं को तुम्हारा यह स्वरूप प्रतीत हो सकता है, वे ही तुम्हारे इस स्वरूप को जानने में समर्थ हो सकते हैं ॥७६॥ यज्ञ-याग आदि कर्मों का फल देहान्तर, देशान्तर और कालान्तर में मिलता है । महा- तत्त्वार्थ को जान लेने का फल तो तुरन्त मिल जाता है, अब इसी बात को समझा रहे हैं— समस्त संकल्पविकल्पात्मक स्थितियों को दूर कर देने वाला यह रहस्यार्थ अत्यन्त गोपनीय है । यह तत्काल फल देने वाला है ॥७६-७७॥ इस कार्य को मैं करूंगा, इस तरह का मानस कर्म संकल्प कहलाता है । इस कार्य को मैं करूं या न करूं, इस तरह का दो कोटियों वाला संशयात्मक ज्ञान विकल्प कहलाता है । ये दोनों ही स्थितियां तब दूर भाग जाती हैं, जब साधक अपने परिपूर्ण स्वतन्त्र शिव- स्वरूप को जान लेता है । संकल्पविकल्पात्मक चित्त की वृत्तियों के दूर हो जाने से मन स्थिर हो जाता है । इनको दूर करने का कार्य यह रहस्यार्थ ही करता है, अतः इसे अवश्य साव- धानी से सुनना चाहिये । इसीलिये अब तक मैंने इसे गुप्त रखा है, किसी को भी बताया १. 'देव्याः संबुद्धिः' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । २. दिवः संबन्धेन भवो-ख. ने. ज. उ. । ३. मया गुप्तः-क. ग. । ४. न्त्र्याभावहेतुकाले-क. ख. ग. ने. ज., न्त्र्या- भावहेतुज्ञाने-झ. । ५. न कस्यापि कथितः-क. ख. ग. ज., न कस्याप्युक्तः-ने.।

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २०७ रक्षितः। सद्यः प्रत्ययकारकः एतदाकर्णनेन शिवोऽहमस्मीति प्रत्ययः सद्य एव समुदेतीत्यर्थः ॥७६-७७॥ नन्वयमर्थः कुत्र स्थितः ? कुत्र वा दृष्टस्त्वया ? किं वा तस्य फलम् ? इत्यत आह— महाज्ञानार्णवे दृष्टः शङ्का तत्र न पार्वति ॥७७॥ विद्यापीठनिबन्धेषु संस्थितो दिव्यसिद्धिदः। विद्यैव पीठं विद्यापीठम्, शिवयोर्विश्रान्तिस्थान¹त्वात्। तन्निबद्ध्यते येषु तानि तदवयवभूतानि वाग्भवकामराजशक्त्याख्यानि बीजानि, तेषु विद्यापीठनिब- न्धेषु, "अकुले विषसंज्ञे च" (१।२५) इत्यत्रोक्तरीत्या बीजत्रयशिखरवर्तिबिन्द्वर्ध- चन्द्ररोधनीनादनादान्तशक्तिव्यापिकासमनोन्मनाक्रमेणानुसन्धीयमानेषु उन्मन्यन्त- देशकालानवच्छिन्न²वस्तुपरचिदात्मकमहातत्त्वार्थः संस्थित इत्यर्थः। तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे— नहीं है, बड़े जतन के साथ छिपाये रखा है। इसको सुन लेने मात्र से मैं शिव हूँ, इस तरह का ज्ञान तत्काल उत्पन्न हो जाता है ॥ ७६-७७॥ फिर प्रश्न होता है कि यह अर्थ अब तक कहाँ छिपा हुआ था ? आपने उसे कहाँ देखा और इसका फल क्या है ? अब इन्हीं प्रश्नों का उत्तर देते हैं— इस अर्थ को मैंने महाज्ञानार्णव में देखा है। हे पार्वति ! इस विषय में किसी प्रकार की शंका नहीं करनी चाहिये, क्योंकि विद्यापीठ के निबन्धों में भी दिव्य सिद्धि के देने वाले इस अर्थ का निरूपण है ॥७७-७८॥ विद्या स्वयं ही तब पीठ बन जाती है, जब शिव और शक्ति उस पर विश्राम करते हैं। इस ¹विद्यापीठ की जहाँ व्याख्या की जाती है, वे उसी के अवयवभूत वाग्भव, कामराज और शक्ति नामक बीज हैं। पूर्वोपदिष्ट (१।२५) पद्धति से इन तीनों बीजों के शीर्ष स्थान में स्थित बिन्दु, अर्धचन्द्र, रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिका, समना और उन्मना के क्रम से जब हम परम तत्त्व के अनुसन्धान में लगते हैं, तो उन्मना से परे देश, काल, आकार आदि से अपरिच्छिन्न परचिदात्मक स्थिति का ज्ञान होता है। यही महा- तत्त्वार्थ है। स्वच्छन्दसंग्रह में यह इस तरह से वर्णित है— १. स्थानं तन्निबन्धनानि-ख. ने. ज. उ. । २. 'वस्तु' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. ।

  1. मुद्रा, मण्डल, मन्त्र और विद्या नामक चार पीठों में विभक्त तन्त्रों की चर्चा हमने नि० बो० (उपोद्घात, पृ० ५६-५७) में की है। उसी विभाग की चर्चा यहां हुई है, किन्तु अमृतानन्द और भास्करराय ने उस परम्परा की उपेक्षा कर यहाँ कल्पना के सहारे विद्यापीठ लिया है।

२०८ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः या १चेयं समनाशक्तिस्तदूर्ध्वे उन्मना २स्मृता। नात्र कालकलाभानं न तत्त्वं न च देवता ॥ सुनिर्वाणं परं शुद्धं रुद्रवक्त्रं तदुच्यते । शिवशक्तिरिति ख्यातं३ निर्विकल्पं निरञ्जनम् ॥ तत्त्वातीतं वरारोहे वाङ्मनोतीतगोचरम् । अनिष्कलं चासकलं नीरूपं निर्विकल्पकम् ॥ निर्द्वन्द्वं परमं ४तत्त्वं शिवाख्यं परमं पदम् । इति । दिव्यसिद्धिदः । दिवि ५उन्मन्यन्ते निरस्तनिखिलप्रपञ्चमहाशून्ये भवतीति दिव्यः ६परमशिवः पूर्वोक्तः (२।७६), तस्य सिद्धिः स्वाभेदेन परिज्ञानम्, तल्लक्षणं परमप्रयोजनं ददातीति दिव्यसिद्धिदः । महाज्ञानार्णवे दृष्टः । तादृशपरमशिव- सामरस्यसमाधिरेव महाज्ञानम्, तदेवार्णवः७, निस्तरङ्गपारावारभूतपरमामृत- परिपूर्णत्वात्, तस्मिन् दृष्टः ८स्वात्माहंभावभावनया भावितः। कोऽर्थः ? अयं परमः यह जो समना शक्ति है, उसके ऊपर उन्मना शक्ति की स्थिति सुनी जाती है । यह काल की कला, तत्त्व, देवता आदि की प्रतीति नहीं होती । परम शुद्ध स्वच्छ निर्वाण पद यही है । शिव के स्वरूप की प्रतीति का १द्वार यही है । यह शिव और शक्ति का समरस स्वरूप है । हे वरारोहे ! यह निर्विकार, निरंजन, तत्त्वातीत पद मन और वाणी का विषय नहीं बन सकता । यही अनिष्कल, असकल, नीरूप, निर्विकल्पक, निर्द्वन्द्व परम तत्त्व है, यही शिव नामक परम पद है ॥ यह महातत्त्वार्थ दिव्य सिद्धि को देने वाला है । उन्मना के अन्त में समस्त जागतिक प्रपंचों से ऊपर विद्यमान महाशून्य ही परम आकाश है । उस परम आकाश में ही परम शिव विद्यमान हैं । इस दिव्य परम शिव की सिद्धि, उसके साथ अपना अभेद ज्ञान इस महातत्त्वार्थ की सहायता से ही मिल सकता है, अतः यह दिव्य सिद्धि को देने वाला है । यह ज्ञान २महाज्ञानार्णव में दृष्ट है । परम शिव की समरसता रूप समाधि को ही यहाँ महाज्ञान कहा गया है । यह निस्तरंग शान्त समुद्र के समान परमामृत से परिपूर्ण है । इस महाज्ञानरूपी समुद्र में इस अर्थ को देखा गया है, अपनी आत्मा का ही यह स्वरूप १. चोक्ता-ज. झ., शक्तिः का०णत्वेन पूर्वतनः पाठः । २. स्थिता-ने. ज. । ३. ता**** कारा''''ञ्जना-ख. ने. ज. झ. । ४. शान्तं-क. ग. । ५. 'उन्मन्यन्ते' नास्ति-क. ग. । ६. परमेश्वरः-ख. ने. झ. उ. । ७. र्णवो विस्तारः, तरणपराणां परा-ख. ने. ज. उ. । ८. शिवाहं-ज. झ. । १. पृ० ४९ की टिप्पणी देखिये । २. महाज्ञानार्णव एक तन्त्र का नाम है । भास्करराय ने भी इसको माना है । अमृतानन्द ने इस ग्रन्थ के नाम पर ही अपने ग्रन्थ का नामकरण किया है ।

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २०९ शिवपरप्राप्तिलक्षणो महातत्त्वार्थः सौभाग्यविद्याबीजत्रयशिखरवर्तिन्युन्मन्यवसान- भूमाववस्थितस्तथाविधफलदो मया नित्यं समाधिदशायां निरीक्ष्यत¹ इत्यर्थः । शङ्का तत्र न पार्वति । शङ्का तत्र त्वया न कार्या । यथार्थदर्शी यथादृष्टार्थवादी तवाहमाप्तः, तेन मदुक्तेऽर्थेऽपि विश्वासः कार्य इत्यर्थः ॥७७-७८॥ नन्वयं महातत्त्वार्थो ²महागुप्त इत्युक्तम्, तर्हि कीदृशैर्लभ्यत इत्यत आह— कौलाचारपरैर्देवि पादुकाभावनापरैः ॥७८॥ योगिनीमेलनोधुक्तैः प्राप्तदिव्याभिषेचनैः । शङ्काकलङ्कविगतैः सदा मुदितमानसैः ॥७९॥ पारम्पर्येण विज्ञातरहस्यार्थविशारदैः । लभ्यते कुलं शरीरं महाप्रयोजनहेतुतया ज्ञेयं येषां ते कौलाः । तदुक्तं स्वच्छन्द- संग्रहे— है, इस तरह से पहचाना गया है। इसका भाव यह है कि परम शिव की भलीभाँति प्राप्ति कराने वाला यह महातत्त्वार्थ सौभाग्यविद्या के तीन बीजों के शिखर स्थान में विद्यमान उन्मना पर्यन्त नाद की जहाँ समाप्ति होती है, वहाँ विराजमान है। यह तत्काल फल देने वाला है। इसीलिये मैं प्रतिदिन समाधि दशा में इसका निरीक्षण करता हूँ। हे पार्वति ! इस विषय में तुमको किसी प्रकार की शंका नहीं करनी चाहिये। सभी पदार्थों के रहस्य को यथार्थ रूप में देखने वाला और यथार्थ रूप में देखे गये उन विषयों को तुमको समझाने वाला मैं तुम्हारे लिये परम प्रमाणभूत हूँ। इसलिये मेरी कही बात पर तुमको विश्वास करना चाहिये ॥७७-७८॥ भगवान् शिव ने बताया है कि यह महातत्त्वार्थ परम गोपनीय है, तब कैसे व्यक्ति इसे प्राप्त कर सकते हैं, इसीका अब वर्णन किया जा रहा है— हे देवि ! कौलाचार का अनुसरण करने वाले, गुरुपादुका की सेवा में लगे हुए, योगिनीमेलन में निरत, सभी प्रकार की शंकाओं से उन्मुक्त, सदा प्रसन्न- चित्त रहने वाले लोग ही इस महातत्त्वार्थ को ठीक तरह से समझ सकते हैं, जो कि गुरु-क्रम से दीक्षित और अभिषिक्त होकर परम्परा से सारे रहस्य को जानते हैं ॥७७-८०॥ कुल शब्द यहाँ शरीर का वाचक है। यह मानव शरीर ही महाप्रयोजन मोक्ष की सिद्धि कराने वाला है, ऐसा मानने वाले कौल कहलाते हैं। स्वच्छन्दसंग्रह में इनका वर्णन है— १. क्ष्यते । अस्मत्कल्पितोऽयं पाठः ख., ग., घ., ङ.। २. महा गुप्तः ख., ङ.। १४

२१० योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः कुलज्ञानमथो वक्ष्ये कौलिकानां हिताय वै। यस्य विज्ञानमात्रेण योगोपायाश्च योगिनाम् ॥ १सुगुप्ताः सिद्धयः सर्वा भवन्ति सुलभाः प्रिये। शरीरं कुलमित्युक्तम् .... .... .... ॥ तेषामाचारः, सर्वेषामेव शिष्याणां दीक्षितानां२ कुलान्वये। सर्वावस्थागतानां च साधारणमतं३ शृणु ॥ गुरुभक्तिश्च शान्तिश्च पूजा श्रद्धा क्षमा धृतिः। इति स्वच्छन्दसंग्रहोक्तरीत्या समयाचारपरैः। पादुकाभावनापरैः, स्वप्रकाशशिवमूर्त्तिरेकिका तद्विमर्शतनुरेकिंका तयोः। सामरस्यवपुरिष्यते परा पादुका परशिवात्मनो गुरोः॥ (चि० १) अब मैं कौलिकों के हित के लिये कुल ज्ञान का उपदेश करता हूँ। हे प्रिये ! इसको जानने मात्र से योगियों को योग के उपायों की और नाना प्रकार की अत्यन्त गुप्त सिद्धियों की प्राप्ति अनायास हो जाती है। यह शरीर ही कुल कहलाता है ॥ इन कौलिकों का आचार ही कौलिकाचार है। इसका भी वर्णन स्वच्छन्दसंग्रह में है— कुलान्वय में दीक्षित सभी शिष्यों के लिये, चाहे वे किसी भी अवस्था में पहुँच गये हों, साधारण नियम (समय) सुनो, जिनका पालन करना सबके लिये आवश्यक है। ये हैं—गुरुभक्ति, शान्ति, पूजा, श्रद्धा और धृति ॥ इस तरह से समयाचार का, समयों (नियमों) का पालन करना ही कौलिकाचार है। इनका सदा पालन करने वाला हुआ कौलिकाचारतत्पर। पादुकाभावनापर का अर्थ है गुरु की पादुका की भावना में सदा लगा हुआ। गुरुपादुका का स्वयं व्याख्याकार ने अपने स्तोत्र चिद्विलास में इस तरह से वर्णन किया है— स्वयंप्रकाशस्वरूप शिव की एक मूर्ति है और उसका विमर्शशक्तिमय दूसरा शरीर है। इन दोनों के सामरस्यमय शरीर से परा पादुका बनती है, जो परमशिव स्वरूप गुरु का देह है। इसका अभिप्राय यह है कि गुरु की पादुका की भावना करने वाला शिष्य अपने गुरु के प्रसाद से शिव और शक्ति के सामरस्य को भलीभाँति समझ सकता है, क्योंकि गुरु की पादुका में यह स्वरूप स्वाभाविक रूप से छिपा हुआ है ॥ १. योगोक्तविधयः सर्वे—क. ग. । २. तानामपि प्रिये—ख. ने. ज. झ. उ. । ३. गतं—क. ग. ।

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २११ इत्यस्मदुक्तरीत्या प्रकाशविमर्शतत्समष्टितया श्रीगुरुपादुकात्रयभावनापरैः। योगिनीमेलनोध्द्युक्तैः, यत्र यत्र मिलिता मरीचयस्तत्र तत्र विभुरेव जृम्भते। तत्सतां हि नियमावलम्बनं १ध्यानपूजनकथा विडम्बना॥ इति २प्रामाणिकवचनोक्तरीत्या मातृमानमेयसंविदो योगिन्यः, तासां मेलनम् अन्तर्मुखीभावेन परप्रमातृविश्रान्तिः३, अथवा ब्राह्म्याद्यष्टकार्चनार्थं सामयिक- शक्तिचक्रमेलनं योगिनीमेलनम्, तत्रोद्युक्तैः४। प्राप्तदिव्याभिषेचनैः लब्धपरमशिव- इस तरह से यहाँ प्रकाश, विमर्श और इनकी समष्टिस्वरूपिणी तीन पादुकाओं की भावना करनेवालों का बोध होता है। अब योगिनीमेलनोध्द्युक्त पद का अर्थ किया जा रहा है— जहाँ जहाँ मरीचियाँ मिलती हैं, सब जगह उस परम शिव का व्यापक स्वरूप ही दिखाई पड़ता है। ऐसी स्थिति में नाना प्रकार के नियमों का पालन करना, ध्यान करना, पूजा करना—ये सब विडम्बना मात्र हैं॥ इस १प्रामाणिक वचन के अनुसार यहाँ माता, मान और मेय रूप संवित्त्तियाँ ही योगिनियाँ कहलाती हैं। उनके मेलन का अर्थ है उनको अन्तर्मुख बना कर परप्रमाता स्वरूप में प्रतिष्ठित कर देना। अथवा ब्राह्मी प्रभृति के २अष्टाष्टक स्वरूपों की उपासना के लिये सामयिक शक्तिचक्र के मेलन को भी योगिनीमेलन कह सकते हैं। इस उभय- विध योगिनीमेलन के लिये जो तत्पर हैं, उनको कहते हैं योगिनीमेलनोध्द्युक्त। इसी- १. लम्बिनां-क. ग.। २. प्रमाणवच-ख. ने. ज. झ. उ.। ३. 'रत्रोद्युक्तैः' इत्य- धिकम्-झ.। ४. 'तत्रोद्युक्तैः' नास्ति-झ.।

  1. अमृतानन्द ने आगे (३।१४३) इसी वचन को स्तोत्रावली के नाम से उद्धृत किया है। प्रत्यभिज्ञा दर्शन के प्रवर्तक भट्ट उत्पल की शिवस्तोत्रावली में उक्त श्लोक नहीं मिलता। भट्ट उत्पल के नाम से उद्धृत कुछ अन्य श्लोक भी वहाँ नहीं मिलते। क्षेम- राज ने शिवस्तोत्रावली के उसी स्वरूप की व्याख्या की है, जो श्रीराम, आदित्यराज और विश्वावर्त के द्वारा निर्धारित किया गया था। प्राप्त सभी हस्तलेखों के आधार पर मूल शिवस्तोत्रावली का नया संस्करण होना चाहिये।
  2. अष्टाष्टक शब्द का अर्थ भास्करराय की सेतुबन्ध टीका (३।२००-२०२) में देखिये। वैरोचन कृत प्रतिष्ठालक्षणसारसमुच्चय (६।३२७-४००) में ब्रह्मयामल के प्रमाण से आठ दिशाओं में विद्यमान योगिनियों के अष्टाष्टक स्वरूपों (६४ योगिनियों) की नामावली तथा ध्यान विस्तार से वर्णित हैं। भेड़ाघाट जैसे स्थानों में विद्यमान ६४ योगिनियों की मूर्तियों का इनसे मिलान करके नया पाठ निर्धारित होना चाहिये।