योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०२ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः निर्लक्षणं निर्गुणं च कुलरूपविवर्जितम् ॥ ततः स्वच्छन्दरूपा ^१तु परिगृह्य जगत्पतिम् । तेन ^२मार्गेण सन्तुष्टा पुनरेकाकिनी सती ॥ रमते ^३स्वयमव्यक्ता त्रिपुरा व्यक्तिमागता । इति ॥६९-७२॥ (नि० षो० ४।१२-१६) अथ क्रमप्राप्तं महातत्त्वार्थं वक्तुं प्रतिजानीते-- महातत्त्वार्थ इति यत् तच्च देवि वदामि ते । ^४स्पष्टम् ॥७३॥ महातत्त्वार्थमेवाह— निष्कले परमे सूक्ष्मे ^५निर्लक्ष्ये भाववर्जिते ॥७३॥ व्योमातीते परे तत्त्वे प्रकाशानन्दविग्रहे । विश्वोत्तीर्णे विश्वमये तत्त्वे स्वात्मनि योजनम् ॥७४॥ निष्कले निरवयवे, कला अवयवाः । परमे महद्भ्योऽपि महीयसि । सूक्ष्मे अणोरप्यणीयसि । निर्लक्ष्ये करणेन्द्रियाद्यगोचरे । ^६भाववर्जिते ^७‘भावनागम- पहुँच जाती है। यह पर पुरुष सभी गुणों और धर्मों से रहित है, कुल और रूप से भी यह शून्य है। उसको पाकर वह शक्ति स्वेच्छाचारिणी हो जाती है, उस जगत्पति के साथ समरस हो जाती है। इस अवस्था से सन्तुष्ट होकर वह पुनः अकेली हो जाती है। इस तरह से यह अव्यक्त स्वरूपिणी भगवती त्रिपुरा व्यक्त होकर नाना प्रकार की क्रीडा करती है ॥६९-७२॥ अब क्रमप्राप्त ^१महातत्त्वार्थ का वर्णन करते हैं— हे देवि ! यह जो महातत्त्वार्थ है, अब उसे मैं तुम्हें समझा रहा हूँ ॥ इसका अर्थ स्पष्ट है ॥७३॥ उसी को समझा रहे हैं— निष्कल, परम सूक्ष्म, निर्लक्ष्य, भाववर्जित, व्योमातीत, प्रकाश और आनन्द स्वरूप, विश्वोत्तीर्ण और विश्वमय परम तत्त्व में अपने को विलीन कर देने का ही नाम महातत्त्वार्थ है ॥७३-७४॥ कला अवयवों को कहते हैं। यह परम तत्त्व निष्कल है, निरवयव है। यह परम है, महान् से भी महान् है । सूक्ष्म है, सूक्ष्म से भी सूक्ष्म है। अन्तःकरण, बहिरिन्द्रिय आदि १. तद्विभ्राम्य जगत्प्रभुम्-क. ग., परिभ्रम्य जगत्पुनः-मृ.। २. चारेण-मृ. । ३. सेय- क. ग. झ. । ४. स्पष्टमेतत्-ज. । ५. निर्मले-झ. । ६. ‘भाववर्जिते’ नास्ति-ख. ने. ज. उ. । ७. कल्पनातिग-मृ. ।