योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २०३ मतीन्द्रियं च यल्लक्ष्यमुक्तम्"१ (श्लो० १६) इति चिद्गगनचन्द्रिकोक्तरीत्या भावना- गम्ये । व्योमातीते व्योम पूर्वोक्त(२।७१)लक्षणं तदतीते । परे तत्त्वे २सकलतत्त्वा- तीते परमार्थे । प्रकाशानन्दविग्रहे, प्रकाशो ज्योतिषां ज्योतिरनुत्तरम्, आनन्दः सकलवैषयिकानन्दसमष्टिभूतः परमानन्दः, तौ प्रकाशानन्दौ विग्रहो यस्य, तस्मिन् । विश्वोत्तीर्णे विमुक्तसकलजगदुत्तीर्णे । विश्वमये देशकालपदार्थात्म यद्यद्वस्तु यथा तथा३ । तत्तद्रूपेण या भाति तां श्रये ४सांविदीं कलाम् ॥ (सौ० हृ० ४) इति प्रामाणिकोक्तवचनरीत्या तत्तदात्मनाऽवभासमाने, तत्त्वे "तत्त्वमसि" (छा० उ० ३।८।७) इत्युपनिषद्वक्य५परमार्थ६परविद्याप्रदायकपरशिवरूपे निजगुरु- प्रबोधितनिर्मलस्वभावे स्वात्मनि योजनं तदेकतानुप्रवेशा महातत्त्वार्थ इत्यर्थः ॥७३-७४॥ का विषय न होने से यह निर्लक्ष्य है, किसी को दिखाई नहीं पड़ता । यह भाववर्जित है, सभी प्रकार के स्वभावों से शून्य होने से केवल भावना के सहारे ही यहाँ पहुँचा जा सकता है। चिद्गगनचन्द्रिका में बताया गया है—"यह अतीन्द्रिय तत्त्व केवल भावना के द्वारा ही लक्षित हो सकता है" । व्योम (परम व्योम) का स्वरूप अभी (२।७१) बताया गया है । उस परम व्योम पद से भी यह ऊपर है । समस्त तत्त्वों से भी ऊपर है, अतः इसे पर तत्त्व कहते हैं । समस्त तत्त्वों से अतीत यह पर तत्त्व ही परमार्थ है, वास्तविक है । इसका स्वरूप प्रकाश और आनन्दमय है । यह सभी ज्योतियों का प्रकाशक अनुत्तर प्रकाश है और समस्त वैषयिक आनन्दों का समष्टिभूत परमानन्द है । यह विश्वोत्तीर्ण तत्त्व है, विमुक्त अवस्था में यह सारे जगत् से ऊपर उठ जाता है । यह विश्वमय भी है, संसारावस्था में यही तत्त्व विभिन्न रूपों में भासित होता है । शिवानन्द मुनि सौभाग्यहृदय स्तोत्र में कहते हैं— देश, काल और पदार्थ के रूप में जो जो वस्तु जिस किसी रूप में भासित हो रही है, उन सभी रूपों में संवित्स्वरूपिणी भगवती त्रिपुरा ही एकमात्र भासमान है । मैं उसी की शरण में जाता हूँ ॥ इस तरह से विश्व के समस्त पदार्थों में भासमान यह परतत्त्व विश्वमय भी है । इस परम तत्त्व में "वह तुम ही हो" इस तरह के उपनिषद् वाक्यों द्वारा प्रतिपादित पर- मार्थ स्वरूप परविद्या के प्रदायक परम शिव के स्वरूप में, अपने गुरु के द्वारा जगाये गये अपने ही निर्मल स्वभाव में अपने को नियोजित कर देना, अपनी अभेदप्रतीति को निरन्तर जगाये रखना ही महातत्त्वार्थ कहलाता है ॥७३-७४॥ १. मुञ्जति-मु. । २. सकलतत्त्वार्थपर-ख. ने. ज्ञ. झ. उ. । ३. यथा-मु. । ४. संविदं-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. द्वाक्यार्थपरमार्थे-ख. ने. ज. झ. उ. । ६. 'पर'.... त्त्वार्थः' नास्ति-ख. ने. ज. उ. ।