भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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पृष्ठ 254

२०४ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः नन्वेवंविध२लक्षणं स्वात्मतत्त्वं केन प्रमाणेनावसीयत इत्यत आह— तदा प्रकाशमानत्वं तेजसां तमसामपि। अविनाभावरूपत्वं तस्माद् विश्वस्य सर्वतः॥७५॥ २यदा शिवः सर्वप्राणिनां चित्ते परिस्फुरति, तदा 'आत्मा मनसा संयुज्यते, मन इन्द्रियेण, इन्द्रियमर्थेन'' (न्या० भा० १।१।४) इति तन्त्रान्तरोक्तरीत्या तेजसां सूर्यादीनां तमसां घटादीनां जडानामपि प्रकाशमानत्वम्। चित्ते चिदात्मनि परमशिवे प्रथमं परिस्फुरति सत्येव तत्तदिन्द्रियद्वारा तत्तदर्थानां परिस्फुरणम्। अत्र श्रुतिः—"तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति" (क० उ० ५।१५) इति। तस्मात् सर्वतः सर्वस्य विश्वस्य उक्त (१।४१) लक्षणस्य अविनाभाव- रूपत्वम्, विना न भवतीत्यविनाभावः। कोऽर्थः ? विश्वमिदं द्रष्टृसापेक्षप्रतीतिकं दृश्यत्वात्, यद्यद् दृश्यं तत्तद् द्रष्टृसापेक्षप्रतीतिकम्, यथा सम्प्रतिपन्नो घटः, यद् द्रष्टृसापेक्षप्रतीतिकं न भवति तद् दृश्यमपि न भवति, यथा शशविषाणम्; इत्याद्यन्वयव्यतिरेकसिद्धेनानुमानप्रमाणेनावसीयत इत्यर्थः ॥७५॥ अब प्रश्न होता है कि ऊपर जिस स्वात्मस्वरूप का वर्णन किया गया है, उसकी प्रतीति हमें कैसे होगी ? इसी का उत्तर देते हैं— इस परम स्वरूप के प्रकाश से ही तेज और तम सभी प्रकाशित होते हैं। इस लिये यह सारा विश्व इसमें अभिन्न रूप में स्थित है ॥७५॥ जब शिव सब प्राणियों के हृदय में स्फुरित होते हैं, तब "आत्मा मन से, मन इन्द्रियों से और इन्द्रियां विषय से संयुक्त होती है" न्यायभाष्य की इस पद्धति से सूर्य प्रभृति तेजस्वी पदार्थों का तथा घट प्रभृति तमोमय (जड़) पदार्थों का भी बोध होता है। चित्त में चिदात्मस्वरूप परम शिव का पहले परिस्फुरण होने पर ही उन-उन इन्द्रियों की सहा- यता से उन-उन विषयों का ज्ञान हो पाता है। कठोपनिषद् भी कहती है—"उसका प्रकाश होने पर ही बाकी सब वस्तुएँ भासित होती हैं, इसी के प्रकाश से यह सब कुछ प्रका- शित है"। इसलिये पूर्वोक्त (१।४१) लक्षण वाला यह सारा जगत् उस परम शिव में ही अनुस्यूत है, उसके बिना जगत् की स्थिति ही नहीं बन सकती। इसका अभिप्राय यह है कि इस विश्व की प्रतीति के लिये द्रष्टा की अपेक्षा है, क्योंकि यह दृश्य है, जो जो दृश्य पदार्थ हैं, उनकी प्रतीति द्रष्टा द्वारा ही होती है, जैसे दृश्य रूप में स्वीकृत घट की प्रतीति द्रष्टा करता है। जिसकी प्रतीति द्रष्टा के अधीन नहीं होती, वह दृश्य भी नहीं होता, जैसे खरगोश की सींग। इस तरह अन्वय और व्यतिरेक की सहायता से अनुमान प्रमाण के द्वारा यह सिद्ध होता है कि दृश्य जगत् का द्रष्टा वह स्वात्मस्वरूप परम शिव ही है ॥ ७५ ॥ १. पदलक्षणं सर्वाङ्गीणं... २. यदा सर्वप्राणिनां चे...