भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २०५ अथवा अलं प्रमाणचिन्तया, प्रमाणानामपि चिदनुप्रवेशेनैव प्रमाणत्वात् तेषा- मपि ^१स्वरूपमेतत्सद्भावं साधयितुमलम्, तस्य प्रकाशरूपत्वादित्याह— प्रकाशते महातत्त्वं दिव्यक्रीडारसोज्ज्वले। महातत्त्वं देशकालाकारैरनवच्छिन्नं तत्त्वं प्रकाशते ^२स्वयमेव, तेन विना न तत्किमपि प्रकाशयितुमलम्, तस्यैव प्रकाशेन ^३सर्वत्र प्रकाशात्। अत्र श्रुति- स्मृती— “तस्य भासा सर्वमिदं विभाति" (क० उ० ५।१५) इति, "न तद् भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः" (भ० गी० १५।६) इति च। अभियुक्तवचोऽपि— अवधानैकतानानां मतिरेवात्र साक्षिणी। किं प्रमाणै^४र्वराकंस्तैश्चिदनुप्राणितात्मभिः॥ नहि वैकर्तनं ज्योतिर्दीपालोकमपेक्षते। (प० प० ११-१२) इति। अथवा उस स्वात्मस्वरूप के लिये किसी प्रमाण की चिन्ता करना व्यर्थ है। प्रमाणों की प्रवृत्ति भी, उनका प्रामाण्य भी चिच्छक्ति की सहायता से ही निश्चित होता है, अतः इन प्रमाणों के प्रकाशक के रूप में भी इस स्वात्मस्वरूप का सद्भाव सिद्ध होता है— हे शिवशक्तिसामरस्यस्वरूपिणि देवि ! यह महातत्त्व स्वयं ही प्रकाशित होता है, अर्थात् इसके प्रकाश के लिये किसी दूसरे तत्त्व की आवश्यकता नहीं है ॥७६॥ यह देश, काल, आकार आदि से अपरिच्छिन्न महातत्त्व स्वयं ही प्रकाशित होता है। इसके बिना कोई भी वस्तु प्रकाशित नहीं हो सकती। इसी के प्रकाश से बाकी सब वस्तुएँ प्रकाशित होती हैं। श्रुति का कहना है कि उस ब्रह्म के प्रकाश से ही सब कुछ प्रकाशित होता है। स्मृति (गीता) भी कहती है कि उस ब्रह्म को सूर्य, चन्द्रमा अथवा अग्नि भी प्रकाशित नहीं कर सकती। किसी प्रामाणिक ^१व्यक्ति ने भी कहा है— पूरी सावधानी बरतने वाले योगियों की एकाग्र बुद्धि ही मात्र इस परम तत्त्व का साक्षात्कार कर सकती है। बेचारे प्रमाणों की प्रवृत्ति यहाँ कैसे हो सकती है, क्योंकि उनका संचालन तो यह चिच्छक्ति ही करती है। सूर्य को प्रकाशित करने के लिये बेचारे दिये की क्या औकात हो सकती है ? १. 'स्वरूपम्' नास्ति-क. ग. ज. झ. । २. स्वत एव-ख. ज. झ. उ. । ३. सर्वाणि प्रकाशन्त इति-ज. झ. उ., प्रकाशन्ते सर्वाण्यपि-क.। ४. र्वचोभिश्च स्वप्रकाशे चिदात्मनि- ख. ते. ज. झ. ।

  1. इस उक्ति से स्पष्ट हो जाता है कि परापंचाशिका किसी व्यक्ति की रचना है। अतः कश्मीर ग्रन्थमाला में अनुत्तरप्रकाशपंचाशिका के नाम से प्रकाशित इस ग्रन्थ के प्रारंभ में दिया गया नाम (आद्यनाथ) भगवान् शंकर का वाचक न होकर किसी व्यक्ति विशेष का नाम है।