भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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पृष्ठ 256

२०६ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः दिव्यक्रीडारसोज्ज्वले । १'देव्याः संबुद्धिः । २'दिवि भवो दिव्यः परमशिवः, तस्य क्रीडा विश्वसर्जनादिव्यवहारक्रियात्मिका चिच्छक्तिः, तयोः रसः सामरस्यम्, तेनोज्ज्वले नित्यं शिवशक्तिसामरस्यपरायणप्रतीते देवि इत्यर्थः ॥७६॥ ननु महातत्त्वार्थज्ञानस्य फलं यागादिकर्मणामिव देहान्तरदेशान्तरकालान्तर- भाविप्रत्ययः किम् ? नेत्याह— निरस्तसर्वसंकल्पविकल्पस्थितिपूर्वकः ॥७६॥ रहस्यार्थो महागुप्तैः सद्यः प्रत्ययकारकः । इदमहं करिष्यामीति मानसं कर्म संकल्पः, एवं मया कर्तव्यं न वेति कोटि- द्वयावलम्बि ज्ञानं विकल्पः । शिव४स्वातन्त्र्यभावे तु तौ निरस्तौ यत्परिज्ञान- मात्रतः, तदुभयनिरासादेव मनःस्थैर्यं स्थितिर्जायते । तत्पूर्वको रहस्यार्थ आकर्णन- योग्यो न भवति । अत एव ३महागुप्तः, न५ कस्यापि कथितः, अत्यन्तयत्नेन दिव्यक्रीडारसोज्ज्वले यह देवी का संबोधन है । दिव्य शब्द यहाँ परम शिव का वाचक है । उसकी क्रीडा है विश्व के सृष्टि आदि व्यवहारों का संचालन करने वाली चिच्छक्ति । इसका अर्थ है सामरस्य । इस तरह से परम शिव और चिच्छक्ति के सामरस्य से उल्ल- सित स्वरूप वाली यह देवी यहाँ संबोधित है । इसका भाव यह है कि हे देवि ! शिव और शक्ति के सामरस्यमय स्वरूप को जानने के लिये जो साधक निरन्तर सचेष्ट रहते हैं, उन्हीं को तुम्हारा यह स्वरूप प्रतीत हो सकता है, वे ही तुम्हारे इस स्वरूप को जानने में समर्थ हो सकते हैं ॥७६॥ यज्ञ-याग आदि कर्मों का फल देहान्तर, देशान्तर और कालान्तर में मिलता है । महा- तत्त्वार्थ को जान लेने का फल तो तुरन्त मिल जाता है, अब इसी बात को समझा रहे हैं— समस्त संकल्पविकल्पात्मक स्थितियों को दूर कर देने वाला यह रहस्यार्थ अत्यन्त गोपनीय है । यह तत्काल फल देने वाला है ॥७६-७७॥ इस कार्य को मैं करूंगा, इस तरह का मानस कर्म संकल्प कहलाता है । इस कार्य को मैं करूं या न करूं, इस तरह का दो कोटियों वाला संशयात्मक ज्ञान विकल्प कहलाता है । ये दोनों ही स्थितियां तब दूर भाग जाती हैं, जब साधक अपने परिपूर्ण स्वतन्त्र शिव- स्वरूप को जान लेता है । संकल्पविकल्पात्मक चित्त की वृत्तियों के दूर हो जाने से मन स्थिर हो जाता है । इनको दूर करने का कार्य यह रहस्यार्थ ही करता है, अतः इसे अवश्य साव- धानी से सुनना चाहिये । इसीलिये अब तक मैंने इसे गुप्त रखा है, किसी को भी बताया १. 'देव्याः संबुद्धिः' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । २. दिवः संबन्धेन भवो-ख. ने. ज. उ. । ३. मया गुप्तः-क. ग. । ४. न्त्र्याभावहेतुकाले-क. ख. ग. ने. ज., न्त्र्या- भावहेतुज्ञाने-झ. । ५. न कस्यापि कथितः-क. ख. ग. ज., न कस्याप्युक्तः-ने.।