भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २०७ रक्षितः। सद्यः प्रत्ययकारकः एतदाकर्णनेन शिवोऽहमस्मीति प्रत्ययः सद्य एव समुदेतीत्यर्थः ॥७६-७७॥ नन्वयमर्थः कुत्र स्थितः ? कुत्र वा दृष्टस्त्वया ? किं वा तस्य फलम् ? इत्यत आह— महाज्ञानार्णवे दृष्टः शङ्का तत्र न पार्वति ॥७७॥ विद्यापीठनिबन्धेषु संस्थितो दिव्यसिद्धिदः। विद्यैव पीठं विद्यापीठम्, शिवयोर्विश्रान्तिस्थान¹त्वात्। तन्निबद्ध्यते येषु तानि तदवयवभूतानि वाग्भवकामराजशक्त्याख्यानि बीजानि, तेषु विद्यापीठनिब- न्धेषु, "अकुले विषसंज्ञे च" (१।२५) इत्यत्रोक्तरीत्या बीजत्रयशिखरवर्तिबिन्द्वर्ध- चन्द्ररोधनीनादनादान्तशक्तिव्यापिकासमनोन्मनाक्रमेणानुसन्धीयमानेषु उन्मन्यन्त- देशकालानवच्छिन्न²वस्तुपरचिदात्मकमहातत्त्वार्थः संस्थित इत्यर्थः। तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे— नहीं है, बड़े जतन के साथ छिपाये रखा है। इसको सुन लेने मात्र से मैं शिव हूँ, इस तरह का ज्ञान तत्काल उत्पन्न हो जाता है ॥ ७६-७७॥ फिर प्रश्न होता है कि यह अर्थ अब तक कहाँ छिपा हुआ था ? आपने उसे कहाँ देखा और इसका फल क्या है ? अब इन्हीं प्रश्नों का उत्तर देते हैं— इस अर्थ को मैंने महाज्ञानार्णव में देखा है। हे पार्वति ! इस विषय में किसी प्रकार की शंका नहीं करनी चाहिये, क्योंकि विद्यापीठ के निबन्धों में भी दिव्य सिद्धि के देने वाले इस अर्थ का निरूपण है ॥७७-७८॥ विद्या स्वयं ही तब पीठ बन जाती है, जब शिव और शक्ति उस पर विश्राम करते हैं। इस ¹विद्यापीठ की जहाँ व्याख्या की जाती है, वे उसी के अवयवभूत वाग्भव, कामराज और शक्ति नामक बीज हैं। पूर्वोपदिष्ट (१।२५) पद्धति से इन तीनों बीजों के शीर्ष स्थान में स्थित बिन्दु, अर्धचन्द्र, रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिका, समना और उन्मना के क्रम से जब हम परम तत्त्व के अनुसन्धान में लगते हैं, तो उन्मना से परे देश, काल, आकार आदि से अपरिच्छिन्न परचिदात्मक स्थिति का ज्ञान होता है। यही महा- तत्त्वार्थ है। स्वच्छन्दसंग्रह में यह इस तरह से वर्णित है— १. स्थानं तन्निबन्धनानि-ख. ने. ज. उ. । २. 'वस्तु' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. ।

  1. मुद्रा, मण्डल, मन्त्र और विद्या नामक चार पीठों में विभक्त तन्त्रों की चर्चा हमने नि० बो० (उपोद्घात, पृ० ५६-५७) में की है। उसी विभाग की चर्चा यहां हुई है, किन्तु अमृतानन्द और भास्करराय ने उस परम्परा की उपेक्षा कर यहाँ कल्पना के सहारे विद्यापीठ लिया है।