योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०८ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः या १चेयं समनाशक्तिस्तदूर्ध्वे उन्मना २स्मृता। नात्र कालकलाभानं न तत्त्वं न च देवता ॥ सुनिर्वाणं परं शुद्धं रुद्रवक्त्रं तदुच्यते । शिवशक्तिरिति ख्यातं३ निर्विकल्पं निरञ्जनम् ॥ तत्त्वातीतं वरारोहे वाङ्मनोतीतगोचरम् । अनिष्कलं चासकलं नीरूपं निर्विकल्पकम् ॥ निर्द्वन्द्वं परमं ४तत्त्वं शिवाख्यं परमं पदम् । इति । दिव्यसिद्धिदः । दिवि ५उन्मन्यन्ते निरस्तनिखिलप्रपञ्चमहाशून्ये भवतीति दिव्यः ६परमशिवः पूर्वोक्तः (२।७६), तस्य सिद्धिः स्वाभेदेन परिज्ञानम्, तल्लक्षणं परमप्रयोजनं ददातीति दिव्यसिद्धिदः । महाज्ञानार्णवे दृष्टः । तादृशपरमशिव- सामरस्यसमाधिरेव महाज्ञानम्, तदेवार्णवः७, निस्तरङ्गपारावारभूतपरमामृत- परिपूर्णत्वात्, तस्मिन् दृष्टः ८स्वात्माहंभावभावनया भावितः। कोऽर्थः ? अयं परमः यह जो समना शक्ति है, उसके ऊपर उन्मना शक्ति की स्थिति सुनी जाती है । यह काल की कला, तत्त्व, देवता आदि की प्रतीति नहीं होती । परम शुद्ध स्वच्छ निर्वाण पद यही है । शिव के स्वरूप की प्रतीति का १द्वार यही है । यह शिव और शक्ति का समरस स्वरूप है । हे वरारोहे ! यह निर्विकार, निरंजन, तत्त्वातीत पद मन और वाणी का विषय नहीं बन सकता । यही अनिष्कल, असकल, नीरूप, निर्विकल्पक, निर्द्वन्द्व परम तत्त्व है, यही शिव नामक परम पद है ॥ यह महातत्त्वार्थ दिव्य सिद्धि को देने वाला है । उन्मना के अन्त में समस्त जागतिक प्रपंचों से ऊपर विद्यमान महाशून्य ही परम आकाश है । उस परम आकाश में ही परम शिव विद्यमान हैं । इस दिव्य परम शिव की सिद्धि, उसके साथ अपना अभेद ज्ञान इस महातत्त्वार्थ की सहायता से ही मिल सकता है, अतः यह दिव्य सिद्धि को देने वाला है । यह ज्ञान २महाज्ञानार्णव में दृष्ट है । परम शिव की समरसता रूप समाधि को ही यहाँ महाज्ञान कहा गया है । यह निस्तरंग शान्त समुद्र के समान परमामृत से परिपूर्ण है । इस महाज्ञानरूपी समुद्र में इस अर्थ को देखा गया है, अपनी आत्मा का ही यह स्वरूप १. चोक्ता-ज. झ., शक्तिः का०णत्वेन पूर्वतनः पाठः । २. स्थिता-ने. ज. । ३. ता**** कारा''''ञ्जना-ख. ने. ज. झ. । ४. शान्तं-क. ग. । ५. 'उन्मन्यन्ते' नास्ति-क. ग. । ६. परमेश्वरः-ख. ने. झ. उ. । ७. र्णवो विस्तारः, तरणपराणां परा-ख. ने. ज. उ. । ८. शिवाहं-ज. झ. । १. पृ० ४९ की टिप्पणी देखिये । २. महाज्ञानार्णव एक तन्त्र का नाम है । भास्करराय ने भी इसको माना है । अमृतानन्द ने इस ग्रन्थ के नाम पर ही अपने ग्रन्थ का नामकरण किया है ।