भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

पृष्ठ 258, कुल 485 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 258

२०८ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः या १चेयं समनाशक्तिस्तदूर्ध्वे उन्मना २स्मृता। नात्र कालकलाभानं न तत्त्वं न च देवता ॥ सुनिर्वाणं परं शुद्धं रुद्रवक्त्रं तदुच्यते । शिवशक्तिरिति ख्यातं३ निर्विकल्पं निरञ्जनम् ॥ तत्त्वातीतं वरारोहे वाङ्मनोतीतगोचरम् । अनिष्कलं चासकलं नीरूपं निर्विकल्पकम् ॥ निर्द्वन्द्वं परमं ४तत्त्वं शिवाख्यं परमं पदम् । इति । दिव्यसिद्धिदः । दिवि ५उन्मन्यन्ते निरस्तनिखिलप्रपञ्चमहाशून्ये भवतीति दिव्यः ६परमशिवः पूर्वोक्तः (२।७६), तस्य सिद्धिः स्वाभेदेन परिज्ञानम्, तल्लक्षणं परमप्रयोजनं ददातीति दिव्यसिद्धिदः । महाज्ञानार्णवे दृष्टः । तादृशपरमशिव- सामरस्यसमाधिरेव महाज्ञानम्, तदेवार्णवः७, निस्तरङ्गपारावारभूतपरमामृत- परिपूर्णत्वात्, तस्मिन् दृष्टः ८स्वात्माहंभावभावनया भावितः। कोऽर्थः ? अयं परमः यह जो समना शक्ति है, उसके ऊपर उन्मना शक्ति की स्थिति सुनी जाती है । यह काल की कला, तत्त्व, देवता आदि की प्रतीति नहीं होती । परम शुद्ध स्वच्छ निर्वाण पद यही है । शिव के स्वरूप की प्रतीति का १द्वार यही है । यह शिव और शक्ति का समरस स्वरूप है । हे वरारोहे ! यह निर्विकार, निरंजन, तत्त्वातीत पद मन और वाणी का विषय नहीं बन सकता । यही अनिष्कल, असकल, नीरूप, निर्विकल्पक, निर्द्वन्द्व परम तत्त्व है, यही शिव नामक परम पद है ॥ यह महातत्त्वार्थ दिव्य सिद्धि को देने वाला है । उन्मना के अन्त में समस्त जागतिक प्रपंचों से ऊपर विद्यमान महाशून्य ही परम आकाश है । उस परम आकाश में ही परम शिव विद्यमान हैं । इस दिव्य परम शिव की सिद्धि, उसके साथ अपना अभेद ज्ञान इस महातत्त्वार्थ की सहायता से ही मिल सकता है, अतः यह दिव्य सिद्धि को देने वाला है । यह ज्ञान २महाज्ञानार्णव में दृष्ट है । परम शिव की समरसता रूप समाधि को ही यहाँ महाज्ञान कहा गया है । यह निस्तरंग शान्त समुद्र के समान परमामृत से परिपूर्ण है । इस महाज्ञानरूपी समुद्र में इस अर्थ को देखा गया है, अपनी आत्मा का ही यह स्वरूप १. चोक्ता-ज. झ., शक्तिः का०णत्वेन पूर्वतनः पाठः । २. स्थिता-ने. ज. । ३. ता**** कारा''''ञ्जना-ख. ने. ज. झ. । ४. शान्तं-क. ग. । ५. 'उन्मन्यन्ते' नास्ति-क. ग. । ६. परमेश्वरः-ख. ने. झ. उ. । ७. र्णवो विस्तारः, तरणपराणां परा-ख. ने. ज. उ. । ८. शिवाहं-ज. झ. । १. पृ० ४९ की टिप्पणी देखिये । २. महाज्ञानार्णव एक तन्त्र का नाम है । भास्करराय ने भी इसको माना है । अमृतानन्द ने इस ग्रन्थ के नाम पर ही अपने ग्रन्थ का नामकरण किया है ।