योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २०९ शिवपरप्राप्तिलक्षणो महातत्त्वार्थः सौभाग्यविद्याबीजत्रयशिखरवर्तिन्युन्मन्यवसान- भूमाववस्थितस्तथाविधफलदो मया नित्यं समाधिदशायां निरीक्ष्यत¹ इत्यर्थः । शङ्का तत्र न पार्वति । शङ्का तत्र त्वया न कार्या । यथार्थदर्शी यथादृष्टार्थवादी तवाहमाप्तः, तेन मदुक्तेऽर्थेऽपि विश्वासः कार्य इत्यर्थः ॥७७-७८॥ नन्वयं महातत्त्वार्थो ²महागुप्त इत्युक्तम्, तर्हि कीदृशैर्लभ्यत इत्यत आह— कौलाचारपरैर्देवि पादुकाभावनापरैः ॥७८॥ योगिनीमेलनोधुक्तैः प्राप्तदिव्याभिषेचनैः । शङ्काकलङ्कविगतैः सदा मुदितमानसैः ॥७९॥ पारम्पर्येण विज्ञातरहस्यार्थविशारदैः । लभ्यते कुलं शरीरं महाप्रयोजनहेतुतया ज्ञेयं येषां ते कौलाः । तदुक्तं स्वच्छन्द- संग्रहे— है, इस तरह से पहचाना गया है। इसका भाव यह है कि परम शिव की भलीभाँति प्राप्ति कराने वाला यह महातत्त्वार्थ सौभाग्यविद्या के तीन बीजों के शिखर स्थान में विद्यमान उन्मना पर्यन्त नाद की जहाँ समाप्ति होती है, वहाँ विराजमान है। यह तत्काल फल देने वाला है। इसीलिये मैं प्रतिदिन समाधि दशा में इसका निरीक्षण करता हूँ। हे पार्वति ! इस विषय में तुमको किसी प्रकार की शंका नहीं करनी चाहिये। सभी पदार्थों के रहस्य को यथार्थ रूप में देखने वाला और यथार्थ रूप में देखे गये उन विषयों को तुमको समझाने वाला मैं तुम्हारे लिये परम प्रमाणभूत हूँ। इसलिये मेरी कही बात पर तुमको विश्वास करना चाहिये ॥७७-७८॥ भगवान् शिव ने बताया है कि यह महातत्त्वार्थ परम गोपनीय है, तब कैसे व्यक्ति इसे प्राप्त कर सकते हैं, इसीका अब वर्णन किया जा रहा है— हे देवि ! कौलाचार का अनुसरण करने वाले, गुरुपादुका की सेवा में लगे हुए, योगिनीमेलन में निरत, सभी प्रकार की शंकाओं से उन्मुक्त, सदा प्रसन्न- चित्त रहने वाले लोग ही इस महातत्त्वार्थ को ठीक तरह से समझ सकते हैं, जो कि गुरु-क्रम से दीक्षित और अभिषिक्त होकर परम्परा से सारे रहस्य को जानते हैं ॥७७-८०॥ कुल शब्द यहाँ शरीर का वाचक है। यह मानव शरीर ही महाप्रयोजन मोक्ष की सिद्धि कराने वाला है, ऐसा मानने वाले कौल कहलाते हैं। स्वच्छन्दसंग्रह में इनका वर्णन है— १. क्ष्यते । अस्मत्कल्पितोऽयं पाठः ख., ग., घ., ङ.। २. महा गुप्तः ख., ङ.। १४