भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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पृष्ठ 260

२१० योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः कुलज्ञानमथो वक्ष्ये कौलिकानां हिताय वै। यस्य विज्ञानमात्रेण योगोपायाश्च योगिनाम् ॥ १सुगुप्ताः सिद्धयः सर्वा भवन्ति सुलभाः प्रिये। शरीरं कुलमित्युक्तम् .... .... .... ॥ तेषामाचारः, सर्वेषामेव शिष्याणां दीक्षितानां२ कुलान्वये। सर्वावस्थागतानां च साधारणमतं३ शृणु ॥ गुरुभक्तिश्च शान्तिश्च पूजा श्रद्धा क्षमा धृतिः। इति स्वच्छन्दसंग्रहोक्तरीत्या समयाचारपरैः। पादुकाभावनापरैः, स्वप्रकाशशिवमूर्त्तिरेकिका तद्विमर्शतनुरेकिंका तयोः। सामरस्यवपुरिष्यते परा पादुका परशिवात्मनो गुरोः॥ (चि० १) अब मैं कौलिकों के हित के लिये कुल ज्ञान का उपदेश करता हूँ। हे प्रिये ! इसको जानने मात्र से योगियों को योग के उपायों की और नाना प्रकार की अत्यन्त गुप्त सिद्धियों की प्राप्ति अनायास हो जाती है। यह शरीर ही कुल कहलाता है ॥ इन कौलिकों का आचार ही कौलिकाचार है। इसका भी वर्णन स्वच्छन्दसंग्रह में है— कुलान्वय में दीक्षित सभी शिष्यों के लिये, चाहे वे किसी भी अवस्था में पहुँच गये हों, साधारण नियम (समय) सुनो, जिनका पालन करना सबके लिये आवश्यक है। ये हैं—गुरुभक्ति, शान्ति, पूजा, श्रद्धा और धृति ॥ इस तरह से समयाचार का, समयों (नियमों) का पालन करना ही कौलिकाचार है। इनका सदा पालन करने वाला हुआ कौलिकाचारतत्पर। पादुकाभावनापर का अर्थ है गुरु की पादुका की भावना में सदा लगा हुआ। गुरुपादुका का स्वयं व्याख्याकार ने अपने स्तोत्र चिद्विलास में इस तरह से वर्णन किया है— स्वयंप्रकाशस्वरूप शिव की एक मूर्ति है और उसका विमर्शशक्तिमय दूसरा शरीर है। इन दोनों के सामरस्यमय शरीर से परा पादुका बनती है, जो परमशिव स्वरूप गुरु का देह है। इसका अभिप्राय यह है कि गुरु की पादुका की भावना करने वाला शिष्य अपने गुरु के प्रसाद से शिव और शक्ति के सामरस्य को भलीभाँति समझ सकता है, क्योंकि गुरु की पादुका में यह स्वरूप स्वाभाविक रूप से छिपा हुआ है ॥ १. योगोक्तविधयः सर्वे—क. ग. । २. तानामपि प्रिये—ख. ने. ज. झ. उ. । ३. गतं—क. ग. ।