योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २११ इत्यस्मदुक्तरीत्या प्रकाशविमर्शतत्समष्टितया श्रीगुरुपादुकात्रयभावनापरैः। योगिनीमेलनोध्द्युक्तैः, यत्र यत्र मिलिता मरीचयस्तत्र तत्र विभुरेव जृम्भते। तत्सतां हि नियमावलम्बनं १ध्यानपूजनकथा विडम्बना॥ इति २प्रामाणिकवचनोक्तरीत्या मातृमानमेयसंविदो योगिन्यः, तासां मेलनम् अन्तर्मुखीभावेन परप्रमातृविश्रान्तिः३, अथवा ब्राह्म्याद्यष्टकार्चनार्थं सामयिक- शक्तिचक्रमेलनं योगिनीमेलनम्, तत्रोद्युक्तैः४। प्राप्तदिव्याभिषेचनैः लब्धपरमशिव- इस तरह से यहाँ प्रकाश, विमर्श और इनकी समष्टिस्वरूपिणी तीन पादुकाओं की भावना करनेवालों का बोध होता है। अब योगिनीमेलनोध्द्युक्त पद का अर्थ किया जा रहा है— जहाँ जहाँ मरीचियाँ मिलती हैं, सब जगह उस परम शिव का व्यापक स्वरूप ही दिखाई पड़ता है। ऐसी स्थिति में नाना प्रकार के नियमों का पालन करना, ध्यान करना, पूजा करना—ये सब विडम्बना मात्र हैं॥ इस १प्रामाणिक वचन के अनुसार यहाँ माता, मान और मेय रूप संवित्त्तियाँ ही योगिनियाँ कहलाती हैं। उनके मेलन का अर्थ है उनको अन्तर्मुख बना कर परप्रमाता स्वरूप में प्रतिष्ठित कर देना। अथवा ब्राह्मी प्रभृति के २अष्टाष्टक स्वरूपों की उपासना के लिये सामयिक शक्तिचक्र के मेलन को भी योगिनीमेलन कह सकते हैं। इस उभय- विध योगिनीमेलन के लिये जो तत्पर हैं, उनको कहते हैं योगिनीमेलनोध्द्युक्त। इसी- १. लम्बिनां-क. ग.। २. प्रमाणवच-ख. ने. ज. झ. उ.। ३. 'रत्रोद्युक्तैः' इत्य- धिकम्-झ.। ४. 'तत्रोद्युक्तैः' नास्ति-झ.।
- अमृतानन्द ने आगे (३।१४३) इसी वचन को स्तोत्रावली के नाम से उद्धृत किया है। प्रत्यभिज्ञा दर्शन के प्रवर्तक भट्ट उत्पल की शिवस्तोत्रावली में उक्त श्लोक नहीं मिलता। भट्ट उत्पल के नाम से उद्धृत कुछ अन्य श्लोक भी वहाँ नहीं मिलते। क्षेम- राज ने शिवस्तोत्रावली के उसी स्वरूप की व्याख्या की है, जो श्रीराम, आदित्यराज और विश्वावर्त के द्वारा निर्धारित किया गया था। प्राप्त सभी हस्तलेखों के आधार पर मूल शिवस्तोत्रावली का नया संस्करण होना चाहिये।
- अष्टाष्टक शब्द का अर्थ भास्करराय की सेतुबन्ध टीका (३।२००-२०२) में देखिये। वैरोचन कृत प्रतिष्ठालक्षणसारसमुच्चय (६।३२७-४००) में ब्रह्मयामल के प्रमाण से आठ दिशाओं में विद्यमान योगिनियों के अष्टाष्टक स्वरूपों (६४ योगिनियों) की नामावली तथा ध्यान विस्तार से वर्णित हैं। भेड़ाघाट जैसे स्थानों में विद्यमान ६४ योगिनियों की मूर्तियों का इनसे मिलान करके नया पाठ निर्धारित होना चाहिये।