योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१२ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः प्रायगुरुवराभिमन्त्रितचिद्रसमयकलशसलिलसेकैस्ततः प्रक्षालितमलमयपाशैः। अत एव शङ्काकलङ्कविगतैः। इदमित्थं भवेन्न भवेदित्यनवधारणज्ञानं शङ्का, सैव कलङ्कः, मालिन्यहेतुत्वात्, तस्माद्विगतैः। अत एव सदा मुदितमानसैः, मेघावरण- विगमाद् यथा रखेः स्वरूपं स्फुरति, तथा मलपाशविगमात् सदा येषां मनसि प्रमोद- लक्षणं परशिवस्वरूपं प्रकाशते, तैरित्यर्थः। पारम्पर्येण विज्ञातरहस्यार्थविशारदै- र्लभ्यते शिवादिस्वगुरुपर्यन्तं १गुरुपारम्पर्यक्रमसमासादितसकलरहस्यार्थपर्यालोचन- पटुतरमतिभिरयं२ महातत्त्वार्थो लभ्यत इत्यर्थः ॥७८-८०॥ कौलाचारपरैरित्याद्युक्तगुणविहीनैरयमर्थो न लभ्यत इति शपथपूर्वकमाह— नान्यथा देवि त्वां शपे कुलसुन्दरि ॥८०॥ स्पष्टम् ॥८०॥ तरह से प्राप्तदिव्याभिषेचन का अर्थ है जो प्रायः परमशिव स्वरूप गुरुप्रवर के द्वारा अभिमन्त्रित चिद्रसमय ज्ञानामृत से परिपूर्ण कलश के जल से अभिषिक्त हो चुके हैं और इसके कारण मलमय पाश जिनके घुल चुके हैं। इसीलिये ऐसे योगी शंकारूपी कलंक से मुक्त हो जाते हैं। यह ऐसा होगा या नहीं, इस तरह की अनिश्चयात्मक स्थिति को शंका कहते हैं। यह १शंका मलिनता का कारण बनती है, अतः कलंक के समान है। इस शंका- रूपी कलंक से योगी मुक्त रहते हैं। इसीलिये ये सदा प्रसन्नचित्त रहते हैं। बादलों के हट जाने से जैसे निरावरण सूर्य निर्मल रूप से प्रकाशित होता है, उसी तरह से मलमय पाशों के हट जाने से इनके हृदय में आनन्दमय परशिव का स्वरूप प्रकाशित होता रहता है। शिव से लेकर अपने गुरु पर्यन्त चली आई गुरु-परम्परा के क्रम से जिन्होंने समस्त रहस्यों को समझ लिया है और बड़ी सावधानी से जो इसका पर्यालोचन करते रहते हैं, ऐसे निपुण मति वाले साधक ही इस महातत्त्वार्थ को प्राप्त कर सकते हैं ॥७८-८०॥ कौलाचारपर इत्यादि विशेषताओं से रहित व्यक्ति इसको कभी नहीं प्राप्त कर सकता, इसी बात को अब शपथपूर्वक कहते हैं— हे देवि ! इसके अतिरिक्त अन्य किसी उपाय से इसकी प्राप्ति नहीं हो सकती। हे कुलसुन्दरि ! यह बात मैं तुमको शपथपूर्वक कहता हूँ ॥ इसका अर्थ स्पष्ट है ॥८०॥ १. पर्यन्तपरम्परया विदितसकल—ख. ने. ज. झ. उ. । २. 'अयं' नास्ति—ख. ने. ज. झ. उ. । १. आठ पाशों की चर्चा दीपिकाकार (१।७२) ने की है । तन्त्रालोककार (१५। ५९५-५९६) ने इनको ग्रह अथवा आग्रह कहा है । इनमें शंका भी एक है । इसका संक्षिप्त स्वरूप लुप्तागमसंग्रह, द्वितीय भाग के उपोद्घात (पृ० २१२-२१३) में देखिये ।