योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २१३ ननु मास्तु गुरुपारम्पर्यक्रमः, पुस्तकपाठादिना व्युत्पत्तिबलेनापि किञ्चिन्मात्र- परिज्ञानं सम्पादयितुं शक्यत इत्याह— पारम्पर्यविहीना ये ज्ञानमात्रेण गर्विताः । तेषां समयलोपेन विकुर्वन्ति मरीचयः ॥८१॥ अन्यथा कौलाचारव्यतिरेकेण ज्ञानमात्रेण पुस्तकपाठोत्पन्नज्ञानमात्रेण तस्य साधकस्य सिद्धिर्न भवतीति ये पारम्पर्यविहीनाः शब्दव्युत्पत्तिबलेन किञ्चिन्मात्रपरि- ज्ञानेन गर्विताः१, तेषां समयलोपेन, “मादनं तदधः शक्तिः” (नि० षो० १।१११) इत्याद्यागमशास्त्रविहितसकलमन्त्राक्षरसंकेतपरिज्ञानाद्युच्चारणादिक्रमलोपेन विकु- र्वन्ति मरीचयः सर्वपीठनिवासिन्यः सर्वगाश्चिन्मरीचयः । भैरव्यो २भरिताकारा रक्षन्तु कुलमातरः ॥ इति प्रामाणिकवचनोक्तरीत्या ब्राह्म्याद्या डाकिन्याद्यास्त्वगादिधातुदेवताः, विकुर्वन्ति विकारं जनयन्ति, स्वस्वधातूद्रैकरूपविकारजननेन तेषां देहं नाश- यन्तीत्यर्थः ॥८१॥ शंका होती है कि गुरु-परम्परा के बिना भी पुस्तक को पढ़कर शब्दों की व्युत्पत्ति के आधार पर कुछ न कुछ जानकारी मिल ही सकती हैं, अब इसका समाधान देते हैं— जो व्यक्ति गुरु-परम्परा से विहीन हैं और जिनको अपने ज्ञान पर गर्व है, परम्परा का लोप करनेवाले ऐसे व्यक्तियों को योगिनियां विद्रूप बना देती हैं ॥८१॥ जिनको गुरु-परम्परा से कौलाचार का ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ है, तो पुस्तक को पढ़ने से उपजे ज्ञान से उनको किसी प्रकार की सिद्धि नहीं मिल सकती। जो परम्परा से विहीन (रहित) हैं, शब्दों की व्युत्पत्ति के सहारे थोड़ा बहुत जान कर जो अहंकारी बन गये हैं, ऐसे व्यक्ति समय का लोप करने वाले हैं। नित्याषोडशिकार्णव आदि शास्त्रों में निर्दिष्ट मूलविद्या के अक्षर-संकेत और उच्चारण आदि की गुरु-परम्परा से प्राप्त होने वाली पद्धति को न जानने के कारण ये प्रत्यवाय के भागी होते हैं। ऐसे व्यक्तियों को मरीचियाँ कष्ट पहुँचाती हैं। इसीलिये किसी प्रामाणिक व्यक्ति ने इन मरीचियों की इस तरह से स्तुति की है— सभी पीठों में निवास करने वाली, सर्वत्र यथेच्छ विचरण करने वाली, चिच्छक्ति की मरीचियाँ (किरणें) ही, परिपूर्ण स्वभाववाली भैरवियाँ हैं, कुलदेवियाँ हैं। ये हमारी रक्षा करें ॥ तदनुसार ब्राह्मी आदि और त्वचा आदि धातुओं की अधिपति देवता डाकिनी आदि, जो मरीचियों के नाम से जानी जाती हैं, अपने अपने नियन्त्रण में विद्यमान १. ताः समयः संकेत:, मादनं—ख. ने. ज. उ. । २. भाविताकाराः—ख. ने. ज,