भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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२१४ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः ननु कस्मिन् दिने कस्मिन्नक्षत्रे कस्मिन् १वासरे कौलाचारक्रमेण योगिनी- मेलनं कार्यमित्यत आह— यस्तु दिव्यरसास्वादमोदमानविमर्शनः । देवतातिथिनक्षत्रे२ वारेऽपि च विवस्वतः ॥८२॥ मरीचीन् प्रीणयत्येव मंदिरानन्दँघूर्णितः । सर्वदा च विशेषेण यस्तु कौलाचारपरो योगी दिव्यरसास्वादमोदमानविमर्शनः, दिवि परव्योम्नि भवतीति दिव्यः परशिवः, तेन रसः सामरस्यम्, तस्यास्वादोऽनुभवः, तेन मोदमानं विमर्शनं मनोवृत्तिर्यस्य सः। प्रथमं परशिवैक्यपरामर्शपरिस्फुरदकृत्रिमा- नन्दकेवलः पश्चान्मदिरानन्दघूर्णितो वक्ष्यमाणा(३।९८-१०३)र्घ्यशुद्धिं विधाय ५परामृतभूतया मदिरया सम्पादितानन्दो योगी। देवतातिथिनक्षत्रे, चतुर्दश्यष्टम्यौ देवतातिथी, पुष्यनक्षत्रं देवतानक्षत्रम् । अत्रैव वक्ष्यति— धातुओं में विषमता पैदा करके ऐसे समयलोप करनेवाले व्यक्तियों के शरीर को रुग्ण बना कर नष्ट कर देती हैं ॥८१॥ किस दिन, किस नक्षत्र और किस वार में कौलाचार के क्रम से योगिनीमेलन करना चाहिये, इसी विषय को अब बताते हैं— कौलाचार का पालन करने वाले योगी का मन जब परम शिव के सामरस्य का आस्वादन कर आनन्दित हो उठता है, तब वह मदिरा का सेवन कर इस आनन्द को और भी उभारता है। इस अवस्था में योगी देवतातिथि और नक्षत्र में रविवार के दिन तो मरीचियों (योगिनियों) को विशेष रूप से अवश्य ही तृप्त करता है ॥८२-८३॥ जो कौलाचारपरायण योगी परम शिव के सामरस्य से उत्पन्न आनन्द का अनुभव कर प्रसन्नता से भर जाता है, वह पहले परम शिव के साथ एकता का अनुभव कर अकृ- त्रिम (स्वाभाविक) आनन्द से परिपूर्ण हो जाता है। बाद में यह योगी आगे (३।९८- १०३) बताई गई विधि से अर्घ्य की शुद्धि करके परम अमृतमय उस सुधा का सेवन कर कृत्रिम आनन्द से भी अपने को परिपूर्ण कर लेता है। ऐसी अवस्था में वह योगी देवता- तिथि (चतुर्दशी और अष्टमी) तथा देवतानक्षत्र (पुष्य) में मरीचियों को अवश्य ही तृप्त करता है। देवतानक्षत्र से पुष्य नक्षत्र का ग्रहण इसी ग्रन्थ में आगे (३।१९१- १९२) किया गया है। वहाँ बताया गया है— १. वारे-ख. ग. घ. उ., योगे-ने. । २. श्रवारे-छ. ज. झ. उ. । ३. कारणा-ज. झ., सुधया-छ. । ४. मद-ने. ड. च. छ. । ५. परामृतरूपया तया-ख. ग. घ.