योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २१५ 'पुष्यभेन तु वारे च सौरे च परमेश्वरि ॥ गुरोर्दिने स्वनक्षत्रे चतुर्दश्यष्टमीषु च । चक्रपूजां विशेषेण योगिनीनां समाचरेत् ॥ (३।१९१-१९२) इति । मरीचीन् प्रीणयत्येव²। एवकारोऽयोगव्यवच्छेदपरः। उक्तकालेषु सर्वदा योगिनी- प्रीणनं कुर्यात्, अन्यथा प्रत्यवायो भवेदित्यर्थः । कालविशेषकथनं नैमित्तिकविशेष³- पूजाद्योतनार्थम् । सर्वदा प्रत्यहं च मरीचीप्रीणनं कुर्यादेव, एवकारेणाप्यन्वयः । नित्यार्चनाकरणे प्रत्यवायोऽस्तीति तात्पर्यम्, “नित्यार्चनायां लुप्तायां सासनां सावृति क्रमात्” इति स्वच्छन्दसंग्रहोकरीत्या प्रायश्चित्तस्य कर्तव्य⁴त्वात् ॥८२-८३॥ अकरणे प्रत्यवाय एव भवति, करणे तु फलमस्तीत्याह— लभते पूर्णबोधैताम् ॥८३॥ हे परमेश्वरि ! पुष्य नक्षत्र से युक्त रविवार के दिन, गुरु की जन्म और मृत्यु तिथि पर, अपने जन्म दिन पर, चतुर्दशी और अष्टमी तिथि पर योगिनियों की प्रसन्नता के लिये चक्रपूजा अवश्य करे ॥ एव शब्द का अभिप्राय यह है कि ऐसा अवश्य करे, ऊपर बताये गये तिथि, नक्षत्र, वार आदि के उपस्थित होने पर सदा योगिनियों को तृप्त करे । ऐसा न करने पर साधक प्रायश्चित्त का भागी होगा । यहाँ विशेष काल की सूचना नैमित्तिक पूजा की द्योतक है । सामान्य रूप से नित्य क्रिया के रूप में तो योगिनियों की तृप्ति सदा करनी है । एव (ही) शब्द यहाँ अपि (भी) के अर्थ में मानना चाहिये । नित्य पूजा न करने पर व्यक्ति प्रायश्चित्त का भागी होता है। स्वच्छन्दसंग्रह के अनुसार “नित्यार्चन का लोप होने पर आसन देवताओं और आवरण देवताओं के साथ परा भगवती की क्रमशः अर्चा (पूजन) होनी चाहिये”। नित्यार्चन के न करने पर इस तरह से उसको प्रायश्चित्त करना पड़ता है । इससे यह अभिप्राय निकलता है कि नित्यार्चन तो प्रतिदिन करना ही है, उक्त विशेष तिथियों में नैमित्तिक पूजा भी साधक को अवश्य करनी चाहिये ॥८२-८३॥ यह बता दिया गया है कि न करने पर प्रायश्चित्त करना पड़ता है और अब करने से फल की प्राप्ति होती है, इस विषय को बताते हैं— नित्य और नैमित्तिक पूजा करने वाला साधक पूर्णबोधता को प्राप्त कर लेता है ॥८३॥ १. नित्यं पुष्यदिने वारे सौरे च-ख. ज. झ. ड. । २. इतः परम्-‘मरीचीनुबतरूपां- श्चिन्मरीचीन् प्रीणयत्येव तर्पयत्येव’ इत्याधिकः पाठः-झ. ३. ‘विशेष’ नास्ति-ख. नै. ४. व्यवच्छिन्नात्-ख. नै. ज. झ. ड. । ५. ष्टनम्-ख. नै. च. छ. ज. झ. ।