योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१६ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः “यत्र निर्विषयबोधलक्षणः स्वात्मशम्भुरवतिष्ठतेऽनिशम्” (चि० १०) इत्यस्मदुक्तरीत्या निरावरणचिद्रूपस्वात्मशम्भुत्वं प्राप्नोतीत्यर्थः ॥८३॥ ननु पूर्णबोधभावः केन वा कियता कालेन कैर्वा सम्प्राप्यत इत्यत आह— एवंभावस्तु देवेशि देशिकेन्द्रप्रसादतः । महाज्ञानमयो देवि सद्यः सम्प्राप्यते नरैः ॥८४॥ एवंभावः पूर्णबोधत्वम् । देशिकेन्द्रप्रसादतः, यस्य करुणाकटाक्षपातमात्रेण पाशजालं छिद्यते, स परमशिवः केवलो देशिकेन्द्रः, तत्प्रसादतः स्वप्रकाशवपुषा गुरुः शिवो यः प्रसीदति पदार्थमस्तके । तत्प्रसादमिह तत्त्वशोधनं प्राप्य मोदमुपयाति १भावुकः ॥ (चि० ३१) इत्यस्मदुक्तरीत्या तत्पादग्रहणेन, महाज्ञानमयो निरावरणचिन्मयः । नरैः२ “कौलाचारपरैः” (१७८) इत्यादिपूर्वोक्तविशेषणविशेषितैः । सद्यः देशिकेन्द्र- प्रसादसमवाप्तिसमय एव सम्प्राप्यते ॥८४॥ व्याख्याकार ने अपने चिद्विलास स्तव में पूर्णबोधता की व्याख्या इस तरह से की है—“इस स्थिति में बिना किसी विषय की सहायता के स्वप्रकाशमय बोध(ज्ञान)- मय स्वात्मस्वरूप शिव निरन्तर स्फुरित होता रहता है”। इस उक्ति के अनुसार नित्य और नैमित्तिक पूजा करने वाला साधक निरावरण चित्स्वरूप स्वात्मा की परम शिव से अभिन्नता को, उसकी पूर्णबोधस्वरूपता को पहचान लेता है ॥६३॥ अब प्रश्न होता है कि यह पूर्णता का बोध कौन, कितने समय में, किनकी सहायता से प्राप्त कर सकता है ? इसका उत्तर देते हैं— हे देवेशि ! इस पूर्ण बोधभाव की प्रतीति गुरुकृपा से होती है। हे देवि ! इस चिन्मय बोध की प्रतीति सद्गुरु की आराधना करने वालों को तत्काल हो जाती है ॥८४॥ एवंभाव का अर्थ है मैं परिपूर्ण बोधस्वरूप हूं । जिसकी कृपादृष्टि के पड़ने मात्र से सारे पाशजाल भिन्न-भिन्न हो जाते हैं, वह परम शिव ही केवल देशिकेन्द्र (सबका गुरु) कहलाता है । उसके प्रसाद (प्रसन्नता) का वर्णन स्वयं व्याख्याकार ने अपने चिद्विलास स्तव के एक श्लोक में किया है, जिसकी व्याख्या हम पहले (२।६८) कर चुके हैं। इस परम गुरु के प्रसाद को ग्रहण कर साधक महाज्ञानमय निर्मल चिन्मय स्वात्मस्वरूप को पहचान लेता है। यह साधक पूर्व निर्दिष्ट (२।७७) 'कौलाचारपर' इत्यादि विशेषताओं से संपन्न होकर तत्काल ही, परम गुरु की कृपादृष्टि के प्रसाद को पाने के साथ ही, उक्त महाज्ञान से सम्पन्न हो जाता है, अपने पूर्ण बोधमय स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है ॥८४॥ १. भावकः-ग. ने. उ. भावतः-ज. । २. ‘नरैः’ नास्ति-ख. ने. ज. ङ. उ.