भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २१७ मन्त्रसंकेतमुपसंहरति— एवमेतत्प्रदं^१ ज्ञानं विद्यार्णगमगोचरम् । देवि गुह्यं प्रियेणैव व्याख्यातं दुर्गि^२ षड्विधम् ॥ सद्यो यस्य प्रबोधेन वीरचक्रेश्वरो भवेत् ॥८५॥ एवम् उक्तप्रकारेण, एतत्प्रदं^३ परिपूर्णबोधलक्षण^४परशिवतत्त्व^५प्रदं ज्ञानम् । ^६विद्यार्णगमगोचरम्, विद्याया अर्णाः^७ पञ्चदश वर्णाः, त एवागमा महार्थबोध- कत्वात्, तद्गोचरं तदर्थतया व्याख्यातम्, "यद्वेत्ता त्रिपुराकारो वीरचक्रेश्वरो भवेत्" (२।१) इत्यारभ्य "एवमेतत्प्रदम्" (२।८५) इत्यन्तश्लोकजालेन । षड्विधं "भावार्थः सम्प्रदायार्थः" (२।१५) इत्यादिना प्रतिपादितषट्प्रकारम् । देवि प्रकाश- विमर्शसामरस्यरूपे परे । दुर्गि दुर्गे देशिकेन्द्रकटाक्षपातविहीनैर्नाप्यस्वरूपे । सद्यो यस्य प्रबोधेन षड्विधार्थस्य प्रबोधेन । वीरचक्रेश्वरो भवेत् । इदन्तरिपोरहमि अब मन्त्रसंकेत प्रकरण का उपसंहार करते हैं— इस तरह से परिपूर्ण बोधस्वरूपता को प्रदान करने वाला यह ज्ञान श्रीविद्या के पन्द्रह वर्णों में जिस तरह से प्रतिष्ठित है, हे दुर्गि, हे देवि ! उसकी षड्विध व्याख्या तुम्हारे प्रेम के वशीभूत हो मैंने यहाँ प्रस्तुत की है । इस विषय को ठीक तरह से जान लेने पर साधक वीरों के समूह का स्वामी बन जाता है ॥८५॥ ऊपर बताई गई विधि से परिपूर्ण बोधस्वरूप परम शिव पद को प्रदान करने वाला यह ज्ञान श्रीविद्या के पन्द्रह वर्णरूपी शास्त्र से प्राप्त होता है, क्योंकि श्रीविद्या के अन्तर्गत विद्यमान वर्ण बहुत बड़े रहस्य का ज्ञान कराते हैं। इनकी यहाँ सम्प्रदाय-प्राप्त परम्परा के अनुसार व्याख्या की गई है । इस विषय को इस ग्रन्थ के पूरे द्वितीय मन्त्र- संकेत प्रकरण के प्रथम श्लोक से लेकर अन्तिम श्लोक पर्यन्त देखा जा सकता है। यह अर्थ भावार्थ, सम्प्रदायार्थ आदि के भेद से छः प्रकार का है, इसका निरूपण विस्तार से ऊपर किया जा चुका है। 'देवि' यह प्रकाशविमर्शसामरस्यमयी परा भगवती का संबोधन है। 'दुर्गि' यह उस देवी के संबोधन का विशेषण है। 'दुर्गे' के स्थान पर 'दुर्गि' पद का प्रयोग वैदिक आर्ष पद्धति से किया गया है। इसका अभिप्राय यह है कि बिना गुरुकृपा के इसके स्वरूप को पहचानना कठिन है । इस षड्विध अर्थ का सम्यग् ज्ञान हो जाने पर साधक वीरचक्र का स्वामी हो जाता है। इस आध्यात्मिक युद्ध-क्षेत्र में इदन्ता १. परं-ख. ने. च. छ. ज. झ. उ. । २. तन्वि-ङ., तव-उ. । ३. परं-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. लक्षणं-ख. ग. ज. झ. उ. । ५. 'तत्त्व' नास्ति-क. । ६. 'विद्यार्णगम- गोचरं' नास्ति-ख. ज. झ. उ. । ७. वर्णाः-सार्वत्रिकः पाठः ।

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