योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१८ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः 'समराङ्गणे प्रलयप्रतिपादनपरा वीराः, तेषां चक्रं समूहः, तस्येश्वरः परशिवः। पूर्वोक्तषड्विधार्थविज्ञानसमय एव परशिवो भवेदित्यर्थः ॥८५॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीपुण्यानन्दशिष्या- मृतानन्दयोगिप्रवरविरचितायां योगिनीहृदय- दीपिकायां मन्त्रसंकेतो नाम द्वितीयः ॥ रूपी शत्रु का अहन्ता में प्रविलय करने वाले वीर कहलाते हैं। द्वैतदृष्टि को हटाकर अद्वैत में प्रतिष्ठित होने वाले वीरों के समूह का वह स्वामी हो जाता है, स्वयं परम शिव बन जाता है। पूर्वोक्त छः प्रकार के अर्थों को जान लेने पर साधक तत्काल ही अपने परम शिव स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है ॥८५॥ इस तरह श्रीमत् परमहंस परिव्राजकाचार्य श्री पुण्यानन्द के शिष्य अमृतानन्द योगिप्रवर विरचित योगिनीहृदयदीपिका का दूसरा मन्त्रसंकेत प्रकरण पूरा हुआ ॥२॥