भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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पूजासंकेतस्तृतीयः अथ क्रमप्राप्तं पूजासंकेतं वक्तुं प्रतिजानीते— पूजासंकेतमधुना कथयामि तवानघे। स्पष्टम्¹ ॥ श्रोतृजनप्रवृत्तये फलमाह— यस्य प्रबोधमात्रेण जीवन्मुक्तः प्रमोदते ॥१॥ यस्य पूजासंकेतस्य। प्रबोधमात्रेण ²वक्ष्यमाणपरादित्रिविधभेदवतः केवलपरि- ज्ञानेनैव। जीवन्मुक्तः जीवन्नेव मुक्तः सन् शिवोऽहमस्मीति मतिमान्³। प्रमोदते परशिवाहन्तामतिरेव प्रमोदहेतुः ॥१॥ पूजासंकेतमारभते— तव नित्योदिता पूजा त्रिभिर्भेदैर्व्यवस्थिता। अब क्रमप्राप्त पूजासंकेत प्रकरण का उपक्रम करते हैं— हे अनघे ! अब मैं पूजासंकेत का तुम्हें उपदेश कर रहा हूँ ॥ इसका अर्थ स्पष्ट है ॥ श्रोताओं को प्रवृत्त करने के लिये इस प्रकरण के ज्ञान का क्या फल है ? अब यह बताते हैं— जिसके जानने मात्र से साधक जीवन्मुक्त होकर सदा आनन्द में मग्न रहता है ॥१॥ जिस पूजासंकेत के जानने मात्र से, आगे बताई गई विधि से पर, अपर आदि तीन भेदों वाली पूजाविधि के केवल जान लेने मात्र से, साधक इसी जीवन में मुक्त होकर, 'मैं शिव हूँ' यह भलीभाँति जान कर, सदा आनन्द में लीन रहता है। मैं ही शिव हूँ, इस ज्ञान के उत्पन्न हो जाने से वह सदा आनन्द में डूबा रहता है ॥१॥ अब पूजासंकेत प्रकरण प्रारंभ होता है— प्रतिदिन जो तुम्हारी पूजा की जाती है, वह तीन प्रकार की होती है ॥ १. स्पष्टमेतत्–ज.। २. 'वक्ष्यमाण'–नास्ति–ख. ने. ज. झ. उ. । ३. 'मतिमान्' नास्ति–क. ख. ग. घ. ङ.