भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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पृष्ठ 270

२२० योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः प्रकाशात्मनो मम विमर्शशक्तेर्विमर्शरूपिण्यास्तव । नित्योदिता पूजा नित्यं प्रत्यहम् उदिता विहिता १पूजा, त्रिभिर्भेदैर्व्यवस्थिता ॥ पूजानामान्याह— परा चाप्यरा गौरि तृतीया च परापरा ॥२॥ प्रथमा पूजा परा उत्तमोच्यते । परमशिवाद्वैतप्रथाप्रापकत्वादि२तरपूजाभ्या- मुत्तमत्वम् । तदुक्तं संकेतपद्धत्याम्— न पूजा बाह्यपुष्पादिद्रव्यैर्या ३विहिताऽनिशम् । स्वे ४महत्यद्वये धाम्नि सा पूजा या परा स्थितिः ॥ इति । अपरा द्वितीया पूजा भेदप्रथामात्रसारा बाह्यचक्रावरणार्चनरूपाऽधमा, “न पूजा बाह्यपुष्पादिद्रव्यैर्या ३विहिताऽनिशम्” इति ५पूर्वोक्तवचनात् । तृतीया पूजा परापरा बाह्यस्यान्तरे धाम्न्यद्वये चिल्लयभावनामयी मध्यमा, परापरात्मक- त्वात् ॥२॥ मुझ प्रकाशात्मक शिव की विमर्शरूपिणी शक्ति तुम हो । इस प्रकाशविमर्शात्मक स्वरूप की प्रतिदिन की जाने वाली पूजा तीन तरह से सम्पन्न होती है ॥ इनके नाम ये हैं— हे गौरि ! परा, अपरा इन दो भेदों के अतिरिक्त इसका परापरा नामक तीसरा भेद है ॥२॥ प्रथम पूजा का नाम १परा है । यह सर्वश्रेष्ठ है । परम शिव के साथ अद्वय बोध को जगाने वाली यह पूजा अन्य दो पूजाओं की अपेक्षा उत्कृष्ट है । संकेतपद्धति का कहना है— बाह्य पुष्प आदि द्रव्यों की सहायता से जो दिन-रात पूजा की जाती है, वह वास्तविक पूजा नहीं है । असली पूजा तो वह है, जिससे साधक अपने महान् अद्वय स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाय ॥ अपरा नाम की दूसरी पूजा केवल भेददृष्टि को बढ़ावा देने वाली है । इसमें केवल बाह्यचक्र की और तदन्तर्गत आवरण देवताओं की पूजा की जाती है । यह अधम कोटि की पूजा है । इसीलिये संकेतपद्धति के अभी उद्धृत वचन में इसको वास्तविक पूजा नहीं माना गया है । तीसरी पूजा परापरा नाम की है । इसमें बाह्य वस्तुओं का आन्तर अद्वय धाम में विलय किया जाता है, आन्तर चितिशक्ति से स्फुरित इस विश्व के १. 'पूजा' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । २. 'इतरपूजाभ्यामुत्तमत्वम्' नास्ति-ख. ने. ज. झ उ. । ३. प्रथिता-क. ने. झ. उ. । ४. महिम्रन्य-क. ग. । ५. 'पूर्वोक्त' नास्ति- ख. ने. ज. झ. उ. ।

  1. परा, परापरा और अपरा पूजा की व्याख्या हम शांभव, शाक्त और आणव उपायों के रूप में कर सकते हैं ।