भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २२१ तासां लक्षणानि क्रमेणाह— प्रथमाऽद्वैतभावस्था सर्वप्रसरगोचरा । “आत्मा मनसा संयुज्यते, मन इन्द्रियेण, इन्द्रियमर्थेन” (न्या० भा० १।१।४) इति पूर्वोक्त(२।२-४)परिपाट्या सर्वेषामिन्द्रियाणां ये ^२प्रसरा व्यापारास्तेषां गोचरीभूता । कोऽर्थः ? यत्र यत्र मनो याति बाह्ये वाऽभ्यन्तरे प्रिये । तत्र तत्र ^३परावस्था व्यापकत्वात् क्व यास्यति ।। (श्लो० ११३) ^४यत्र यत्राक्षमार्गेण चैतन्यं व्यज्यते ^५प्रभोः । तस्य तन्मात्र^६धर्मित्वाच्चिल्लयाद् भरिता मतिः ॥ (श्लो० ११४) इति विज्ञानभैरवभट्टारकोक्तरीत्या बाह्यस्य चिल्लयलक्षणाऽद्वैतप्रथा परा पूजे- त्यर्थः ॥ समस्त बाह्य पदार्थों का पुनः उस शुद्ध चितिशक्ति में विलय हो रहा है, ऐसी भावना की जाती है। यह पूजा मध्यम है, क्योंकि परा और अपरा दोनों के बीच में है ॥२॥ अब क्रम से इनके लक्षण बताते हैं— इन्द्रियों के समस्त व्यापारों में एकमात्र अद्वय शिवतत्त्व को ही देखना, यह पहली परा पूजा है ॥ “आत्मा मन से, मन इन्द्रिय से और इन्द्रिय अर्थ से संयुक्त होती हैं” न्यायभाष्य (१।१।४) की इस पूर्व (२।२-४) प्रतिपादित पद्धति के अनुसार सभी इन्द्रियों के व्यापारों में अनुस्यूत रहने वाली अद्वैत प्रथा का ही नाम परा पूजा है। विज्ञानभैरव में बताया गया है— हे प्रिये ! बाह्य अथवा आन्तर विषय में जहाँ जहाँ मन जाता है, सब जगह व्यापक पराशक्ति ही विद्यमान है। उस परावस्था को छोड़ कर मन कहाँ जा सकता है ? उस उस बाह्य अथवा आन्तर विषय के रूप में इन्द्रियों के मार्ग से भगवान् का चिन्मय स्वरूप ही प्रकट होता है, क्योंकि यह सारा विश्व चिन्मात्रसार है। साधक सारे विश्व को जब अपने चिन्मय स्वरूप में विलीन कर लेता है, तो वह परिपूर्ण स्वभाव का हो जाता है ॥ इसका अभिप्राय यह है कि स्वयं आत्मा ही अन्ततः विषयों का स्वरूप धारण करता है, इस विषय को भलीभाँति समझ कर साधक जब सभी बाह्य अथवा आन्तर विषयों में अपने चिन्मय स्वरूप को अभिन्न रूप से देखता है, तो अन्ततः उसकी दृष्टि में ये सभी पदार्थ चित्स्वरूप में विलीन हो जाते हैं, सर्वत्र उसको एकमात्र चिन्मयता का ही बोध होता है। यह अद्वय प्रथा ही इस शास्त्र में परा पूजा कही गई है ॥ १. प्रचर-ख. ग. ने. च. छ. झ. । २. 'प्रसराः' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. शिवा-मु. । ४. तत्र तत्र इति सार्वत्रिको दीपिकापा. । ५. विभोः-मु. । ६. रूपत्वा- ख. ग. झ. उ. ।