भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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पृष्ठ 272

२२२ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः द्वितीया चक्रपूजा च सदा निष्पाद्यते मया ॥३॥ द्वितीया १चक्रपूजा अपरा पूजा, चतुरस्रादिबैन्दवान्तश्रीचक्र२सदनावरणदेवता- र्चनमपरा पूजेत्यर्थः । सदा निष्पाद्यते मया । सदा प्रत्यहम्, मया सर्वज्ञेनापि, निष्पाद्यते क्रियते, ३अभेदप्रतीतिबोधकत्वात् । अभेदप्रतीत्यर्थमपरा पूजा सर्वैरपि ज्ञानिभिः कार्येत्यर्थः । अन्यथाऽद्वैतमित्यप्रसक्तप्रतिषेधः स्यात्, न च तथा युक्तम् । तदुक्तं तन्त्रान्तरे— लब्धरूपं४ क्वचित् किञ्चित् तादृगेव निषिध्यते । विधानमन्तरेणातो न निषेधस्य संभवः ॥ इति ॥३॥ (ब्र० सि० २।२) चक्रपूजा दूसरी, अपरा नाम की पूजा है। मैं प्रतिदिन इसका अनुष्ठान करता हूँ ॥३॥ दूसरी चक्रपूजा अपरा पूजा कहलाती है। यहाँ चतुरस्र से बैन्दव चक्र पर्यन्त श्रीचक्र रूपी गृह में निवास करने वाले आवरण देवताओं की बाह्य पूजा संपन्न होती है। मेरा जैसा सर्वज्ञ भी इस पूजा का प्रतिदिन अनुष्ठान करता है, क्योंकि इससे साधक धीरे- धीरे अद्वयबोध की तरफ बढ़ता है। सर्वत्र अभेद बुद्धि को जगाने के लिये ज्ञानी जनों को भी सदा इस अपरा पूजा का सहारा लेना चाहिये। अन्यथा 'अद्वैत' पद में निषेधार्थक नञ् शब्द का प्रयोग व्यर्थ हो जायगा। ऐसा होना नहीं चाहिये, क्योंकि ब्रह्मसिद्धि (२।२) में मण्डन मिश्र कहते हैं— कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में विद्यमान वस्तु का ही निषेध किया जा सकता है। अतः बिना विधि के उसका निषेध नहीं हो सकता ॥ कहने का भाव यह है कि 'अद्वैत' पद में द्वैत का निषेध किया गया है, किन्तु शास्त्र का कहना है कि एकमात्र अद्वय तत्त्व ही वास्तविक है। ऐसी स्थिति में जब अद्वय के अतिरिक्त कुछ है ही नहीं, तब इस पद में विद्यमान नञ् किसका निषेध करेगा ? प्रसक्त का ही प्रतिषेध किया जाता है। जब अद्वय के अतिरिक्त कोई वस्तु उपस्थित ही नहीं है, तो यह तो अप्रसक्त (अनुपस्थित) का प्रतिषेध हुआ, जो शास्त्रकारों की दृष्टि में सही नहीं है। अतः अद्वय तत्त्व के प्रतियोगी द्वैत तत्त्व की प्रतीति कराने के अभिप्राय से ही मानों इस अपरा पूजा का विधान है। अपरा पूजा का अनुष्ठान करने वाला साधक भक्त अपने इष्टदेव की भगवान् के रूप में उपासना करता है। इस तरह से यहाँ उपास्य और उपासक के रूप में भेद दृष्टि ही प्रधान रूप से रहती है और 'अद्वय' शब्द का प्रयोग करने वाला शास्त्र अप्रसक्त प्रतिषेध दोष से मुक्त हो जाता है ॥३॥ १. 'चक्रपूजा' नास्ति-ख. ने. ज. झ. ड. । २. चक्रपदनिवासावरणदेवतानाम्, अतोऽपरा-ख. ने. ज. झ. ड. । ३. प्रबोधकत्वात्-ख. ज. झ. । ४. रूपे-मु.