भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

पृष्ठ 273, कुल 485 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 273

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २२३ परापरापूजामाह— एवं ज्ञानमये देवि तृतीया १स्वप्रथामयी । एवं ज्ञानमये पूर्वोक्ताद्वैतभावनामये धाम्नि स्वप्रथामयी बाह्यस्य पृथगा²त्म- कावरणार्चनरूपस्य कर्मणो ज्ञानमयताविश्रान्तिस्तृतीया परापरा पूजा । तदुक्त- मभियुक्तैः— प्रकाशैकघने धाम्नि विकल्प³प्रसरादिकान् । निक्षिपाम्यर्चनद्वारा वह्नाविव घृताहुतीः ॥ इति ॥ (सु० वा० ३७) पूजाविधानमाह— उत्तमा सा परा ज्ञेया विधानं शृणु साम्प्रतम् ॥४॥ ४उत्तमा सा परा पूजा । परापूजाया उत्तमत्वकथनादितरयोरपरापरापर- पूजयोरधमत्वं मध्यमत्वं ५चोपलक्षयति । सा ज्ञेया ६यथाज्ञानं कार्या । अपरा पूजा अब परापरा पूजा का स्वरूप बताते हैं— प्रकाशमय स्वरूप में अपने बाह्य स्वरूप को समर्पित कर देना ही तीसरी परापरा पूजा है ॥ इस तरह से ज्ञानमय, अर्थात् सर्वत्र अद्वैत भावना का प्रसार करने वाले प्रकाशमय स्वरूप में बाह्य भेदप्रधान, अपने से पृथक् रूप में भासित हो रही, आवरण पूजा रूपी कर्मकाण्ड का ज्ञानकाण्ड में विश्रान्तिलाभ कराने वाली तीसरी पूजा परापरा नाम की है । सुभगोदयवासनाकार मुनि शिवानन्द ने निम्न श्लोक में इसी पूजा का वर्णन किया है— अपने एकमात्र प्रकाशमय स्वरूप में मैं इन जागतिक विषयों के सारे प्रपंच को उसी तरह से डाल दे रहा हूँ, जैसे पवित्र अग्नि में घृत की आहुति दी जाती है ॥ इसका भाव यह है कि परापरा पूजा का उपासक अपने सारे अशुद्ध विकल्पों को अपनी ज्ञानाग्नि की सहायता से निर्मल बोधस्वरूप बना लेता है ॥ अब पूजा की विधि बताते हैं— इन तीनों में परा पूजा उत्तम है । अब तुम उसकी विधि सुनो ॥४॥ परा पूजा को यहाँ उत्तम बताया गया है । इससे अन्य दो अपरा और परापरा पूजा की अधमता और मध्यमता लक्षित होती है । अर्थात् परा पूजा उत्तम, अपरा पूजा १. तु परापरा-क. ग. । २. गावरणा-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. ल्पान् प्रसवादि- ख. ज. झ. उ., ल्पान् पाशवादि-मु. । ४. 'उत्तमा सा परा पूजा' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. च लक्ष्यते-ने. ज. । ६. ज्ञानगम्या परा-क. ग. ने. ज. झ. उ. ।