भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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पृष्ठ 274

२७४ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः पश्चाद् वक्ष्यते। अस्या ज्ञेयत्वात् परत्वमत एवोत्तमत्वं चेत्यर्थः। साम्प्रतं ज्ञेयायाः¹ पूजाया विधानं शृणु ॥४॥ विधानमेव विवृणोति— महापद्मवनान्तस्थे वाग्भवे गुरुपादुकाम्। आप्यायितजगद्रूपां परमामृतवर्षिणीम् ॥५,॥ संचिन्त्य महापद्मवनं ब्रह्मरन्ध्राधोमुखसितसहस्रदला²कुलकमलं पद्मदलेराकुलत्वाद् ³वनमिव वनम्। तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे— अधम और परापरा पूजा मध्यम मानी गई है। परा पूजा¹ का अनुष्ठान अपने ज्ञान के अनुसार किया जाता है। अपरा पूजा का वर्णन आगे करेंगे। परा पूजा का अनुष्ठान उत्कृष्ट कोटि का ज्ञानी ही कर सकता है। इसीलिये इसको उत्कृष्ट माना गया है। अब तुम पहले परा पूजा का विधान सुनो ॥४॥ उस विधि का ही विवरण देते हैं— महापद्मवन के अन्दर विद्यमान वाग्भव (त्रिकोण) में सारे जगत् का विस्तार करने वाली परम उत्कृष्ट अमृत की वर्षा करने वाली गुरुपादुका का ध्यान करना चाहिये ॥५-६॥ ब्रह्मरन्ध्र में अधोमुख श्वेत सहस्रदल अकुल कमल स्थित है। अनेक दलों से आवृत्त होने से यह कमलों के वन (जंगल) जैसा मालूम पड़ता है। स्वच्छन्दसंग्रह में इस तरह से यह वर्णित है— १. द्वितीयायाः-ज., अपरायाः-उ.। २. दलं कुल-ख. उ.। ३. वनमिति। तदु-ख. ने. ज. झ. उ.। १. अमृतानन्द ने यहाँ ज्ञेया पद की व्याख्या परा पूजा के विशेषण के रूप में की है, जब कि भास्करराय इसको क्रिया पद मानते हैं। यही पक्ष उचित लगता है। इसी- लिये मूल का हिन्दी अनुवाद हमने तदनुसार ही किया है। दीपिका की पूर्व प्रकाशित पुस्तक तथा उसके अनेक हस्तलेखों में उपलब्ध पाठ का अर्थ यह होता है कि परा पूजा की विधि बाद में बताई जायगी। वस्तुस्थिति यह है कि भास्करराय ही नहीं, स्वयं दीपिकाकार भी आगे आठवें श्लोक की पातनिका में कहते हैं कि यहाँ परा पूजा का स्वरूप बता दिया गया है, अब अपरा पूजा का विधान करते हैं। इसीलिये हमने यहाँ ख. और झ. मातृका के पाठ को मूल में स्थान दिया है और तदनुसार ही ग्रन्थ का अनु- वाद किया है। अन्यत्र भी अनेक स्थलों पर प्रायः इन्हीं दो हस्तलेखों की सहायता से पूर्व मुद्रित पाठ में संशोधन किया गया है।

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