योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २२५ १यावदूर्ध्वकुलं पद्मं सहस्रारमधोमुखम् । श्वेतं च निष्कला२शक्तिमध्यं चासंख्यशक्तिकम् ॥ व्यापिनी केवला शश्वदमृतौघप्रवर्षिणी । महापद्मवनं चैव समना तस्य चोपरि ॥ तस्यान्तः कर्णिकामध्ये तत्स्थे वाग्भवरूपिणि । इति । पूर्वोक्त (२।६९) रीत्या वाचः परापश्यन्तीमध्यमावैखर्यो भवन्त्यस्मादिति वाग्भवं त्रिकोणम् । तत्र गुरुपादुकाम्, गृणीते तत्त्वमात्मीयमात्मीकृतजगत्त्रयम् । उपायोपेयरूपाय शिवाय गुरवे नमः ॥ इत्यभियुक्तवचनोक्तरीत्या विश्वगुरोः परमशिवस्य ३पादुकाम्, स्वप्रकाशशिवमूर्त्तिरेकिका तद्विमर्शतनुरेकिका तयोः । सामरस्यवपुरिष्यते परा पादुका परशिवात्मनो गुरोः ॥ (चि० १) इत्यस्मदुक्तरीत्या त्रिभेदवतीम् । आप्यायितजगद्रूपां शिशिरतरनिजरश्मि- ४निफालनात् प्रसारणादाप्यायितचराचराम् । परामृतवर्षिणीं निरन्तरनिबिड- चिद्रसासारवर्षिणीम् । संचिन्त्य स्वात्मतया ५विमृश्य ॥५-६॥ सबसे ऊपर अकुल पद्म स्थित है । यह अधोमुख सहस्रदल कमल है । यह श्वेत वर्ण का है। इसमें असंख्य शक्तियों का निवास है। इन सबके बीच में निष्कला शक्ति विराजमान है। व्यापिनी कला यहाँ निरन्तर अमृत की वर्षा करती रहती है। यही महापद्मवन ऊर्ध्व सहस्रार कमल है। इसके ऊपर समना स्थित है। इसके ऊपर कर्णिका के मध्य में वाग्भव (त्रिकोण) की स्थिति मानी गई है ॥ परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी नामक वाणियां त्रिकोण से ही उत्पन्न होती हैं, यह पहले (१।३६-४०) बताया जा चुका है। १वाणियों की उत्पत्ति इससे होती है, अतः इसे वाग्भव कहा जाता है । इस त्रिकोण में गुरु की पादुका की भावना करनी चाहिये । ऊपर अनेक स्थलों पर उद्धृत वचन के आधार पर विश्वगुरु परम शिव की पादुका यहाँ अभिप्रेत है । व्याख्याकार के गुरुपादुका के सूचक चिद्विलास स्तव के श्लोक की व्याख्या भी पहले (२।७८) की जा चुकी है। तदनुसार यह पादुका तीन (प्रकाश, विमर्श और इनका सामरस्य) भेदों वाली है । गुरु की कृपादृष्टि की अत्यन्त शीतल रश्मियों से यह सारा चराचर जगत् आप्यायित हो उठता है । इससे निरन्तर ज्ञानामृत की वर्षा १. यावदूर्ध्वं कुलं-ख. ने. ज. झ. उ. । २. सक्त-ख. ने. झ. । ३. 'पादुकाम्' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. 'निफालनात्' नास्ति-ने. ज. । ५. विचिन्त्य-ख. ने. । १. पृ० १९९ की टिप्पणी देखिये । १५