भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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२२६ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः गुरुपादुकापरामर्शानन्तरमेव१ प्रसादस्वीकारमाह— परमाद्वैतभावनामदघूर्णितः । परमः परमशिवः, तेनाद्वैतभावना स२ एवाहमस्मीति समावेशरूपा, सैव मद इत्युच्यते, मदहेतुत्वात् । तत्कृतेन मदेन घूर्णितो मुदितः । स्वप्रकाशवपुषा गुरुः शिवो यः प्रसीदति पदार्थमस्तके । तत्प्रसादमिह तत्त्वशोधनं प्राप्य मोदमुपयाति भावुकः३ ॥ (चि० ३१) इत्यस्मदुक्तरीत्या परमशिवाद्वैतभावनालक्षणगुरुप्रसादस्वीकार४समुल्लसत्पर- मानन्दपरवश इत्यर्थः ॥६॥ प्रसादस्वीकारानन्तरमान्तरजपमेवाह— दहरान्तरसंसर्पन्नादालोकनतत्परः ॥६॥ विकल्परूपसंजल्पविमुखः होती रहती है। इस पूजा का अनुष्ठान करते समय साधक को सबसे पहले इस गुरु- पादुका का ही ध्यान करना चाहिये ॥५-६॥ गुरुपादुका का स्मरण करने के उपरान्त पूजक को प्रसाद लेना चाहिये— इसके बाद साधक को चाहिये कि वह परम अद्वैतभावना के मद से परिपूर्ण हो जाय ॥ परम शब्द का अर्थ यहाँ परमशिव किया जाता है। परमशिव के साथ अद्वैत भावना का अर्थ है 'वह शिव मैं ही हूँ' इस तरह की शिवमय दृष्टि। यह अद्वैत भावना एक अनोखे मद (नशा) को जन्म देती है। साधक को चाहिये कि वह अपने में अद्वैत भावना को जगाकर इस अनूठे नशे में मस्त हो जाय। इस प्रसाद के ग्रहण की विधि व्याख्याकार के चिद्विलास स्तव में वर्णित है। उसकी व्याख्या हम पहले (२।६८) कर चुके हैं। इस तरह से गुरुपादुका का स्मरण करने के उपरान्त साधक को परमशिव के साथ अद्वैत भावना को स्थिर करने वाले गुरु के प्रसाद को स्वीकार करना चाहिये, जिससे कि उसमें परम आनन्दमय अवस्था का उल्लास भर जाय ॥ गुरु के प्रसाद को स्वीकार करने के उपरान्त साधक को जप करना चाहिये— साधक को चाहिये कि वह दहराकाश के अन्दर ध्वनित हो रहे नाद का सावधानी से श्रवण करे और सारे जागतिक विकल्प जाल से, नाना प्रकार के बाह्य वैखरी वर्णों के उच्चारण से विमुख हो जाय ॥६-७॥ १. नन्तरमान्तरमेव-ख. झ. उ. । २. सोऽहम-झ. । ३. भावकः-ने., ४. समुल्लसत्-ने., क., ख., झ., उ. ।