भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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पृष्ठ 277

तृतीयः ] दीपिकानुवादसहितम् २२७ "दहरं विपाप्मं परवेश्मभूतं हृत्पुण्डरीकं पुरमध्यसंस्थम्" (म० ना० ८।१६) इति, "दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः" (छा० उ० ८।१।१) इति च श्रुत्या हृदयाब्जमध्य- गतमाकाशं दहरमित्युच्यते । दहरमिव दहरम् । तदन्तरे संसर्पन्नादो दहरान्तर- संसर्पनादः, तस्यावलोकनं विभावनम्, तत्परः । तदुक्तमभियुक्तैः— आनन्दलक्षणमनाहतनाम्नि देशे नादात्मना परिणतं तव रूपमीशे । प्रत्यङ्मुखेन मनसा परिचीयमानं शंसन्ति नेत्रसलिलैः पुलकैश्च धन्याः ।। इति । संयम्येन्द्रियसंचारं प्रोच्चरेन्नादमन्तरम् । एष² एव जपः प्रोक्तो न तु बाह्यजपो जपः ।। इत्यभियुक्तवचनोक्तरीत्या³ऽऽन्तरं नादानुसन्धानलक्षणं जपं कुर्यात्, न तु नानाविधोच्चारलक्षणं बाह्यजपं कुर्यात् । विकल्परूपसंजल्पविमुखः । विकल्परूपाणां

महानारायणोपनिषत् में जीव के शरीर के मध्य में स्थित हृदय कमल में विद्यमान परदेवता के निवासस्थान निर्मल आकाश को दहर कहा गया है । छान्दोग्य उपनिषद् में भी हृदय-पुण्डरीक में दहर नामक आन्तर आकाश की स्थिति बताई गई है । तदनुसार हृदय कमल के बीच में विद्यमान आकाश दहर¹ कहा जाता है । इस दहर के भीतर उठने वाले नाद को सुनने में साधक को अत्यन्त सावधानी से लग जाना चाहिये । अम्बास्तव में इस विषय का वर्णन मिलता है— हे ईशे ! अनाहत नामक देश में, दहराकाश में, आनन्दमय तुम्हारा स्वरूप ही नाद के रूप में परिणत होता है । अपने मन को अन्तर्मुख बनाकर कुछ विरले योगी ही इस स्वरूप को पहचान पाते हैं । अन्य व्यक्तियों को इसका अनुमान उनके रोमांच और आनन्द से निकले आँसुओं को देखकर ही हो सकता है ॥ इन्द्रियों की बाहरी प्रवृत्ति को रोककर आन्तर नाद का उच्चारण करे । इस आन्तर नाद का उच्चारण ही वास्तविक जप है । बाह्य जप वास्तविक नहीं है ॥ किसी अभियुक्त² के इस वचन के अनुसार आन्तर नाद के अनुसन्धानात्मक जप का अनुष्ठान करे । नाना प्रकार के उच्चारण वाले बाह्य जप की यहाँ आवश्यकता नहीं है । ऐसा साधक नाना प्रकार के वैखरी वर्णों के उच्चारण से, वैखरी वाणी से प्रसूत मन्त्रों के १. पथि-झ. । २. एवमेव-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. रीत्याऽऽत्मनादा-ख. ने. ज. झ. उ. ।

  1. ब्रह्मसूत्र के दहराधिकरण (१।३।५, सू० १४-२१) में दहर शब्द की भूताका- शता और विज्ञानात्मकता का खण्डन कर ब्रह्मपरकता स्थापित की गई है । आन्तर आकाश दहर ब्रह्म का निवास स्थान होने से उससे अभिन्न माना जाता है ।
  2. भास्करराय इस श्लोक की नित्याषोडशिकार्णव (५।३९) के श्लोक के रूप में व्याख्या करते हैं, जब कि अमृतानन्द इसको अभियुक्त वचन मानते हैं । पृ० ६९ की टिप्पणी देखिये ।