भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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पृष्ठ 278

२२८ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः नानाविधरूपाणामक्षराणाम्, संजल्प उच्चारः, तल्लक्षण १बाह्यजपविमुखः । तदुक्तं २विज्ञानभैरवभट्टारकैः— भूयो भूयः परे भावे भावना भाव्यते हि या । ३जपतोऽन्तः स्वयं नादो मन्त्रात्मा जप ईदृशः४ ॥ (श्लो० १५२) ॥६-७॥ तादृशमेव ध्यानमपि कुर्यादित्याह— अन्तर्मुखः सदा । चित्कलोल्लासदलितसंकोचस्त्वतिसुन्दरः ॥७॥ "तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्" (३।२) इति योगशास्त्रोक्तरीत्या विजातीय- प्रत्ययानन्तरितसजातीयप्रत्ययप्रवाहलक्षणध्यानेन सदाऽन्तःशब्दसूचितेनान्तर्मुखः परमशिवाद्वैतभावनापरो भूयादित्यर्थः । तदुक्तं विज्ञानभैरवभट्टारकैः— नाना प्रकार के उच्चारण रूप जप से विमुख रहे । विज्ञानभैरव भट्टारक¹ ने भी कहा है— परभाव में, इस विश्व को भर देने वाले अपने स्वरूप में, जो बार-बार भावना की जाती है, उसी को जप कहा जाता है । स्वयं मन्त्रस्वरूप नादात्मक ब्रह्म ही इस जप का विषय होता है । अर्थात् नादात्मक ब्रह्म की ही मन्त्र में भावना की जाती है ॥६-७॥ जप के समान ही वह ध्यान भी करे— वह सदा अन्तर्मुख रहे । अपने में चित्कला का उल्लास भर कर संकोच बुद्धि को दूर भगा कर परम सुन्दर बन जाय, मैं भगवती त्रिपुरसुन्दरी से अभिन्न हूँ, ऐसी भावना करे ॥७॥ योगशास्त्र (पातंजल योगसूत्र) में बताया गया है—"ध्येय में प्रत्यय (चित्तवृत्ति) की एकतानता, निरन्तरता का ही नाम ध्यान है" । अतः विजातीय चित्तवृत्ति को हटाकर सजातीय प्रत्यय की निरन्तर एकरसता का ही नाम ध्यान है । इसकी स्थिति सदा अन्दर ही रहती है । साधक को चाहिये कि वह इसी पद्धति से सदा अन्तर्मुख बना रहे, सर्वत्र परमशिव के अतिरिक्त अन्य किसी वस्तु को न देखे । विज्ञानभैरव का कहना है— १. 'बाह्य' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । २. 'विज्ञान.... हि या' नास्ति-ख. ने. ज. झ. व. उ. । ३. जपः सोऽत्र स्वयं नादो मन्त्रात्मा जप्य-मु. । ४. ईरितः-ख. ने. ज. झ. ।

  1. अमृतानन्द ने विज्ञानभैरवभट्टारक पद का तृतीयान्त प्रयोग किया है, सप्तम्यन्त नहीं । इससे ऐसा लगता है कि उनकी दृष्टि में विज्ञानभैरवभट्टारक ही इस नाम के ग्रन्थ के रचयिता हैं । 'भट्टारक' एक आदरसूचक शब्द है । ग्रन्थ और ग्रन्थकार दोनों के साथ इस पद का प्रयोग मिलता है ।