योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २२९ ध्यानं या निष्कला चिन्ता ^१निराकारा निराश्रया। न तु ध्यानं शरीरस्य मुखहस्तादिकल्पना ॥ (श्लो० १४३) इति। चित्कल्लोल्लासदलितसंकोचस्त्वतिसुन्दर इति। "चिदम्बुधिमहाभङ्गभिन्न- संकोचसंकटः" इत्यस्मदुक्तरीत्या परि^२कल्पितपरिपूर्णांहम्भावः, अत एवाति- सुन्दरः। महात्रिपुरसुन्दरीनामधेयपरचित्कलोल्लासास्पदपरमसुन्दरपरमप्रेमास्पद- परमशिवाभिन्न इत्यर्थः ॥७॥ पूजामप्येतादृशीमेव कुर्यादित्याह— इन्द्रियप्रीणनैर्द्रव्यैर्विहितस्वात्मपूजनः । इन्द्रियाणि श्रोत्रादीनि, तेषां प्रीणनानि द्रव्याणि विशिष्टशब्दस्पर्शरूपरसगन्ध-^३ वन्ति, तैर्विहितं स्वात्मदेवतायाः पूजनं येन स तथाविधः। तदुक्तं मुख्याम्नाय- रहस्यविधौ— निष्कल, निराकार, निराश्रय स्वरूप की चिन्ता का ही नाम ध्यान है। सकल स्वरूप की, हाथ-मुंह आदि से संयुक्त साकार इष्टदेव के स्वरूप की कल्पना को यहाँ ध्यान नहीं माना जाता ॥ स्वयं व्याख्याकार ने अपने किसी^१ ग्रन्थ में कहा है—"साधक को चाहिये कि वह चिन्मय ज्ञानसमुद्र की लहर में विलीन हो जाय और इस तरह से वर्तमान सांसारिक संकुचित स्वरूप के संकट से अपने को बचा ले"। ऐसा करने से उसकी परिपूर्ण अहन्ता का विकास हो जायगा और वह परम सुन्दर बन जायगा, महात्रिपुरसुन्दरी नामक परम चित्कला के उल्लास से प्राप्त परम सुन्दर परमप्रेमास्पद परमशिव स्वरूप में अपने को प्रतिष्ठित कर लेगा, मैं शिव ही हूँ, इस प्रत्यभिज्ञा के जाग जाने से वह साधक अपने को परम सुन्दर परमशिव स्वरूप में ही देखने लगेगा ॥७॥ ऐसा साधक इसी कोटि की पूजा का भी अनुष्ठान करे— इन्द्रियों को तृप्त करने वाले द्रव्यों से वह साधक स्वात्मा रूपी इष्टदेव की पूजा करे। आँख, नाक, कान आदि इन्द्रियाँ हैं। इनको प्रसन्न करने वाले द्रव्य विशिष्ट शब्द, १. निर्विकारा-ख. ने., निर्विकल्पा-ज. । मु. पुस्तके श्लोकेऽस्मिन् भूयान् पाठभेदो दृश्यते। २. कल्पितपूर्णभावः-ने. ज. झ. उ.। ३. गन्धाः-क. ग. । १. अमृतानन्द ने अपने तत्त्वविमर्शिनी नामक ग्रन्थ को यहीं (३।७८) उद्धृत किया लगता है, यह वक्तव्य तथा इसी तरह के अन्य वचन भी उसी ग्रन्थ के होंगे।