भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

पृष्ठ 280, कुल 485 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 280

२३० योगिनीहृदयम् [पूजासंकेतः इन्द्रियद्वारसंग्राह्यैर्गन्धाद्यैः स्वात्मदेवता। स्वभावेन समाराध्या ज्ञातुः सोऽयं महामखः॥ इति। जग्धिपानकृतोल्लासरसानन्दविजृम्भणात्। भावयेद् भरितावस्थां महानन्दस्ततो भवेत्॥ (श्लो० ७१) इति विज्ञानभैरवभट्टारकोक्तरीत्या श्रोत्रादीन्द्रियविषय शब्दाद्यनुभवजनितान- न्दानां महानन्देन समरसीकरणं परा पूजेत्यर्थः॥ अथापरां पूजां वक्तुं तदङ्गभूतं बाह्यन्यासमाह— न्यासं निर्वर्तयेद् देहे षोढान्यासपुरःसरम्॥८॥ षोढान्यासो१ "गणेश" (नि० षो० १।१) इत्याद्यसूत्रे सूचितः। देहे, स्वस्येति शेषः। षोढा षट्प्रकारको न्यासः॥८॥ स्पर्श, रूप, रस और गन्ध हैं। इनसे साधक को अपने आत्मारूपी इष्टदेव की विधि- पूर्वक पूजा करनी चाहिये। मुख्याम्नायरहस्यविधि१ में बताया गया है— इन्द्रियों के द्वार से, उनकी सहायता से गन्ध आदि विषयों का ही पूजासामग्री के रूप में संग्रह कर अपनी आत्मारूपी इष्टदेवता की स्वाभाविक उपासना करनी चाहिये। ज्ञानी साधक के लिये यही सबसे बड़ी पूजा है, महायज्ञ है॥ जग्धि और पान के कारण उल्लास, रस और आनन्द दशा की अभिव्यक्ति होने पर साधक उसमें परिपूर्ण भैरव स्वरूप को देखे, ऐसा करने से वह महानन्द से परिपूर्ण हो जाता है॥ विज्ञानभैरवभट्टारक की इस उक्ति के अनुसार श्रोत्र (कान) आदि इन्द्रियों के साथ शब्द आदि विषयों का सम्पर्क होने से जो आनन्द उत्पन्न होता है, उसकी महानन्द के साथ समरसता (एकात्मकता) की भावना का ही नाम परा पूजा है॥ परा पूजा का स्वरूप बताने के बाद अब अपरा पूजा का निरूपण किया जा रहा है। सबसे पहले अपरा पूजा के अंगभूत बाह्य न्यास का स्वरूप बताया जा रहा है— अपने देह में षोढा न्यास के साथ अन्य न्यासों का भी विन्यास करे॥८॥ नित्याषोडशिकार्णव के प्रथम श्लोक में षोढा न्यास की सूचना दी गई है। साधक अपने शरीर में इनका विन्यास करे। षोढा शब्द का अर्थ छः प्रकार का न्यास है॥८॥ १. न्यासपुरःसरमित्यत्र सूचितो न्यासो निगद्यत इति शेषः—ख. ज. झ., न्यासो गणेशेत्यत्र सूचितः—ने. उ.। १. मुख्याम्नायरहस्यविधि का यह श्लोक आगे (३।११२) मुख्याम्नायरहस्य के नाम से तथा भास्करराय के सेतुबन्ध (पृ० १९८) में आम्नायरहस्य के नाम से स्मृत है। महोत्सवविधि (पृ० ६४) इसको अभियुक्तवचन कहते हैं।