योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
२३० योगिनीहृदयम् [पूजासंकेतः इन्द्रियद्वारसंग्राह्यैर्गन्धाद्यैः स्वात्मदेवता। स्वभावेन समाराध्या ज्ञातुः सोऽयं महामखः॥ इति। जग्धिपानकृतोल्लासरसानन्दविजृम्भणात्। भावयेद् भरितावस्थां महानन्दस्ततो भवेत्॥ (श्लो० ७१) इति विज्ञानभैरवभट्टारकोक्तरीत्या श्रोत्रादीन्द्रियविषय शब्दाद्यनुभवजनितान- न्दानां महानन्देन समरसीकरणं परा पूजेत्यर्थः॥ अथापरां पूजां वक्तुं तदङ्गभूतं बाह्यन्यासमाह— न्यासं निर्वर्तयेद् देहे षोढान्यासपुरःसरम्॥८॥ षोढान्यासो१ "गणेश" (नि० षो० १।१) इत्याद्यसूत्रे सूचितः। देहे, स्वस्येति शेषः। षोढा षट्प्रकारको न्यासः॥८॥ स्पर्श, रूप, रस और गन्ध हैं। इनसे साधक को अपने आत्मारूपी इष्टदेव की विधि- पूर्वक पूजा करनी चाहिये। मुख्याम्नायरहस्यविधि१ में बताया गया है— इन्द्रियों के द्वार से, उनकी सहायता से गन्ध आदि विषयों का ही पूजासामग्री के रूप में संग्रह कर अपनी आत्मारूपी इष्टदेवता की स्वाभाविक उपासना करनी चाहिये। ज्ञानी साधक के लिये यही सबसे बड़ी पूजा है, महायज्ञ है॥ जग्धि और पान के कारण उल्लास, रस और आनन्द दशा की अभिव्यक्ति होने पर साधक उसमें परिपूर्ण भैरव स्वरूप को देखे, ऐसा करने से वह महानन्द से परिपूर्ण हो जाता है॥ विज्ञानभैरवभट्टारक की इस उक्ति के अनुसार श्रोत्र (कान) आदि इन्द्रियों के साथ शब्द आदि विषयों का सम्पर्क होने से जो आनन्द उत्पन्न होता है, उसकी महानन्द के साथ समरसता (एकात्मकता) की भावना का ही नाम परा पूजा है॥ परा पूजा का स्वरूप बताने के बाद अब अपरा पूजा का निरूपण किया जा रहा है। सबसे पहले अपरा पूजा के अंगभूत बाह्य न्यास का स्वरूप बताया जा रहा है— अपने देह में षोढा न्यास के साथ अन्य न्यासों का भी विन्यास करे॥८॥ नित्याषोडशिकार्णव के प्रथम श्लोक में षोढा न्यास की सूचना दी गई है। साधक अपने शरीर में इनका विन्यास करे। षोढा शब्द का अर्थ छः प्रकार का न्यास है॥८॥ १. न्यासपुरःसरमित्यत्र सूचितो न्यासो निगद्यत इति शेषः—ख. ज. झ., न्यासो गणेशेत्यत्र सूचितः—ने. उ.। १. मुख्याम्नायरहस्यविधि का यह श्लोक आगे (३।११२) मुख्याम्नायरहस्य के नाम से तथा भास्करराय के सेतुबन्ध (पृ० १९८) में आम्नायरहस्य के नाम से स्मृत है। महोत्सवविधि (पृ० ६४) इसको अभियुक्तवचन कहते हैं।
तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २३१ १तत्प्रकाराणां गणनामाह— गणेशैः प्रथमो न्यासो द्वितीयस्तु ग्रहैर्मतः । नक्षत्रैश्च तृतीयः स्याद् योगिनीभिश्चतुर्थकः ॥९॥ राशिभिः पञ्चमो न्यासः षष्ठः पीठैर्निगद्यते । सुगमम् । न्यासं न्यासजातम्, जातावेकवचनम् । निर्वर्तयेदिति शेषः ॥९-१०॥ षोढा षट्प्रकारन्यास एकएव, तत्प्रकारं षोढान्यासमाहात्म्यं फलं चाह— षोढान्यासस्त्वयं प्रोक्तः सर्वत्रैवापराजितः ॥१०॥ एवं यो न्यस्तगात्रस्तु स पूज्यः सर्वयोगिभिः । नास्त्यस्य पूज्यो लोकेषु पितृमातृमुखो जनः ॥११॥ स एव पूज्यः सर्वेषां स स्वयं परमेश्वरः । षोढान्यासविहीनं यं प्रणमेदेष पार्वति ॥१२॥ सोऽचिरान्मृत्युमाप्नोति नरकं च प्रपद्यते । छः प्रकार के न्यास की ही अब गणना करते हैं— गणेशों से पहला न्यास, ग्रहों से दूसरा, नक्षत्रों से तीसरा, योगिनियों से चौथा, राशियों से पाचवाँ और पीठों से छठा न्यास किया जाता है ॥९-१०॥ इसका अर्थ स्पष्ट है । न्यास शब्द में एकवचन जाति का वाचक है । इससे इन छः न्यासों को करे, ऐसा अर्थ होगा । इस श्लोक में 'निर्वर्तयेत्' क्रिया का अध्याहार आठवें श्लोक से कर लिया जाता है ॥९-१०॥ षोढा न्यास की एक जाति है, अर्थात् इन सबको निर्दिष्ट क्रम के अनुसार एक साथ किया जाता है । अब इनकी पद्धति, माहात्म्य और फल का निरूपण किया जा रहा है— यह षोढा न्यास सर्वत्र अपराजेय माना गया है । आगे बताई गई विधि से जो इसका अनुष्ठान करता है, वह सभी योगियों का भी पूज्य बन जाता है । लोक में माता-पिता जैसे पूजनीय जन भी इसके लिये पूज्य नहीं रह जाते । वही सबका पूज्य हो जाता है । वह स्वयं परमेश्वर बन जाता है । हे पार्वति ! ऐसा योगी षोढा न्यास से हीन व्यक्ति को यदि प्रणाम कर दे, तो उसकी तत्काल मृत्यु हो जाती है और वह नरक में जाता है ॥१०-१३॥ १. तत्प्रकारमाह—ख. ने. ज. झ. उ. । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
२३२ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः प्रोक्तोऽयं षोढा न्यासः, सर्वत्र सर्वलोकेष्वपि, अपराजितः अप्रतिहतसाम- [र्थ्यः१, एवं वक्ष्यमाणक्रमेण यो न्यस्तगात्रः षोढान्याससाम] र्थ्यश्छिन्नपाशत्वात् स्वय- मेव परमेश्वरः । अत एव लोकेषु जनेषु स एव योगिभिः पूज्यः । किं बहुना, सर्वेषा- मपि पूज्यः, नास्त्यस्य पूज्यः कोऽपि लोके। २यद्येष बलादन्यस्मै ३प्रणमति, स मृतो भवेत्, नरकं च प्रयातीत्यर्थः ॥१०-१३॥ षोढान्यासप्रकारं वक्तुं प्रतिजानीते— षोढान्यासप्रकारं च कथयामि तवानघे ॥१३॥ ४स्पष्टम् ॥१३॥ तत्प्रकारमाह— विघ्नेशो विघ्नराजश्च विनायकशिवोत्तमौ । ५विघ्नकृद् विघ्नहर्ता च ६गणराड् गणनायकः ॥१४॥ एकदन्तो द्विदन्तश्च गजवक्त्रो निरञ्जनः । ७कपर्दवान् दीर्घमुखः शङ्कुकर्णो वृषध्वजः ॥१५॥ ऊपर बताया गया यह षोढा न्यास सभी लोकों में एक समान अपराजेय सामर्थ्य वाला है । आगे बताई गई विधि से जो साधक इसको अपने शरीर में विन्यस्त कर लेता है, वह इन न्यासों की सहायता से सारे पाश-जालों से मुक्त हो स्वयं परमेश्वर बन जाता है । संसार में वह योगियों का भी पूज्य हो जाता है। योगियों का ही नहीं, वह सबका पूज्य बन जाता है। लोक में उसके लिये कोई भी पूजनीय नहीं रह जाता । यदि वह जबरदस्ती से किसी को प्रणाम करता है, तो वह जबरदस्ती प्रणाम कराने वाला व्यक्ति तत्काल मर जाता है और उसको नरक भी भोगना पड़ता है ॥१०-१३॥ अब षोढा न्यास की विधि को बताने की प्रतिज्ञा करते हैं— हे अनघे ! अब मैं तुम्हें षोढा न्यास की विधि बताने जा रहा हूँ ॥१३॥ इसका अर्थ स्पष्ट है ॥१३॥ उस विधि को ही अब बताते हैं— विघ्नेश, विघ्नराज, विनायक, शिवोत्तम, विघ्नकृत्, विघ्नहर्ता, गणराट्, गणनायक, एकदन्त, द्विदन्त, गजवक्त्र, निरञ्जन, कपर्दवान्, दीर्घमुख, शङ्कुकर्ण, १. 'र्थ्यं••••साम' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । २. यदि चेदेष बाल्याद्यस्मै प्रण- क. ग. । ३. प्रणमयति-झ. उ. । ४. स्पष्टमेतत्-ज. । ५. विघ्नहृद् विघ्नकर्ता-ख. ने. च. छ. ज. झ. उ. । ६. गणनायक एव च-ख. ने. ङ. च. छ. ज. झ. उ. । ७. कन्दर्प- ने...
तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २३३ गणनाथो गजेन्द्रश्च शूर्पकर्णस्त्रिलोचनः । लम्बोदरो महानादश्चतुर्मूर्तिः सदाशिवः ॥१६॥ आमोदो दुर्मुखश्चैव सुमुखश्च प्रमोदकः² । एकपादो द्विजिव्हश्च शूरो वीरश्च षण्मुखः ॥१७॥ वरदो वामदेव³श्च वक्रतुण्डो द्वितुण्डक⁴ः । सेनानीर्ग्रामणीर्मत्तो विमत्तो मत्तवाहनः ॥१८॥ जटी मुण्डी तथा खड्गी वरेण्यो वृषकेतनः । भक्ष्य⁵प्रियो गणेशश्च मेघनादो गणेश्वरः ॥१९॥ ⁶[ग्रन्थान्तरे— ए(ते ? ता) गणेशवर्णानामेकपञ्चाशतः क्रमात् । श्रीश्च ह्रीश्चैव तुष्टिश्च शान्तिः पुष्टिः सरस्वती ॥ रमा मेधा तथा कान्तिः कामिनी मोहिनी बला । तीव्रा च ज्वालिनी नन्दा सुरसा कामरूपिणी ॥ उग्रा च जयिनी सत्या विघ्नेशानी सुरूपिणी । कामदा मदजिव्हा च विकटा घूर्णितानना ॥ वृषध्वज, गणनाथ, गजेन्द्र, शूर्पकर्ण, त्रिलोचन, लम्बोदर, महानाद, चतुर्मूर्ति, सदाशिव, आमोद, दुर्मुख, सुमुख, प्रमोदक, एकपाद, द्विजिव्ह, शूर, वीर, षण्मुख, वरद, वामदेव, वक्रतुण्ड, द्वितुण्डक, सेनानी, ग्रामणी, मत्त, विमत्त, मत्त- वाहन, जटी, मुण्डी, खड्गी, वरेण्य, वृषकेतन, भक्ष्यप्रिय, गणेश, मेघनाद और गणेश्वर ये ५१ गणेश हैं ॥१४-१९॥ [किसी दूसरे¹ ग्रन्थ में बताया गया है— इन ५१ संख्या के गणेशों की क्रम से ये ५१ शक्तियाँ हैं—श्री, ह्री, तुष्टि, शान्ति, पुष्टि, सरस्वती, रमा, मेधा, कान्ति, कामिनी, मोहिनी, बला, तीव्रा, ज्वालिनी, १. नन्दः-छ. ज. उ. । २. प्रबोधकः-झ. । ३. वामनश्चैव-उ. । ४. द्विरण्डकः-क. । ५. भक्त-झ. । ६. 'ग्रन्थान्तरे····शक्तयः' नास्ति-ख. ग. ज. ब. उ. ।
- आगे २० वें श्लोक की व्याख्या में अमृतानन्द ने गणेशों की शक्तियों में पहला नाम पुष्टि का दिया है और वहाँ कहा है कि इनके नामों की चर्चा अन्य आगमों की पद्धतियों में आ चुकी है, अतः हम यहाँ उनका विवरण नहीं दे रहे हैं । इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रस्तुत उद्धरण दीपिका का अंग नहीं बन सकता । इस उद्धरण में पहला नाम पुष्टि का नहीं है । अनेक हस्तलेखों में यह पाठ मिलता भी नहीं है ।
२३४ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः भूतिर्भूमिः सती रम्या मानुषी मकरध्वजा । विकर्णा भुकुटी लज्जा दीर्घघोणा धनुर्धरा ॥ तथैव यामिनी रात्रिेश्चन्द्रकान्ता शशिप्रभा । लोलाक्षी चपला ऋद्धिर्दुर्भगा सुभगा शिवा ॥ दुर्गा गुहप्रिया काली ललज्जिह्वा च शक्तयः¹ ।] 'नामान्येतानि नात्र व्याख्येयानीति ॥१४-१९॥ तेषां ध्यानमाह— तरुणारुणसंकाशान् गजवक्त्रान् त्रिलोचनान् । पाशाङ्कुशवराभीतिहस्तांन् शक्तिसमन्वितान् ॥२०॥ तरुणारुणसंकाशान् तरुणारुणसवर्णान् । गजस्य वक्त्रमिव वक्त्रं येषां ते गजवक्त्रास्तान् । ऊर्ध्वकरयोः पाशाङ्कुशौ, अधःकरयोर्वराभये दधानान् । पुष्ट्यादिभिः समन्वितान् । अत्र सूचितानां नाम्नामागमान्तरपद्धतिषु चोक्तत्वान्न वदामः ॥२०॥ नन्दा, सुरसा, कामरूपिणी, उग्रा, जयिनी, सत्या, विघ्नेशानी, सुरूपिणी, कामदा, मद- जिह्वा, विकटा, घूर्णितानना, भूति, भूमि, सती, रम्या, मानुषी, मकरध्वजा, विकर्णा, भ्रुकुटी, लज्जा, दीर्घघोणा, धनुर्धरा, यामिनी, रात्रि, चन्द्रकान्ता, शशिप्रभा, लोलाक्षी, चपला, ऋद्धि, दुर्भगा, सुभगा, शिवा, दुर्गा, गुहप्रिया, काली और ललज्जिह्वा ।] इन नामों की व्याख्या यहाँ नहीं करनी है ॥१४-१९॥ इनका ध्यान बताते हैं— ये सभी गणेश तरुण अरुण के समान कान्तिवाले, हाथी के समान मुँह वाले और तीन नेत्रों वाले हैं। इनके चार हाथों में क्रमशः पाश, अंकुश, वर और अभय मुद्रा है तथा सभी अपनी-अपनी शक्तियों के साथ रहते हैं ॥२०॥ सभी गणेशों का वर्ण तरुण अरुण के समान लाल है। इनका मुँह हाथी का जैसा है। ऊपर के दोनों हाथों में पाश और अंकुश तथा नीचे के हाथों से वर और अभय मुद्राओं को धारण किये हुए हैं और ये पुष्टि आदि शक्तियों के साथ हैं। इनके नामों की चर्चा अन्य आगमों की पद्धतियों में आ चुकी है, अतः हम यहाँ उनका विवरण नहीं दे रहे हैं ॥२०॥ १. तान्येतानि तावद् व्याख्येयानीति-ख. ने. ज. झ. उ. । २. दित्य-ने. उ. । ३. करात्-च. ज. ।
- इन शक्तियों के नाम गणेशों के साथ ज्ञानार्णव तन्त्र (१४।६१-७५) में मिलते हैं। कुछ स्थलों पर पाठान्तर हैं।
तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २३५ न्यासस्थानान्याह— एतांस्तु विन्यसेद् देहे¹ मातृकान्या²सवत् प्रिये । एतान् गणेशान् । मातृका³न्यासवत् मातृकावैखरीन्यासस्थानेषु न्यसे- दित्यर्थः ॥२१॥ ग्रहन्यासमाह— स्वरैस्तु सहितं सूर्यं हृद्यधः प्रविन्यसेत् ॥२१॥ बिन्दुस्थाने सुधासूतिं यादिवर्णचतुष्टयैः । भूपुत्रं लोचनद्वन्द्वे कवर्गाधिपतिं प्रिये ॥२२॥ हृदये विन्यसेच्छुक्रं चवर्गाधिपतिं पुनः⁴ । हृदयोपरि विन्यस्येत् टवर्गाधिपतिं बुधम् ॥२३॥ बृहस्पतिं कण्ठदेशे तवर्गाधिपतिं प्रिये । नाभौ शनैश्चरं चैव⁵ पवर्गेशं सुरेश्वरि ॥२४॥ वक्त्रे शादिचतुर्वर्णैः सहितं राहुमेव च । क्षँकारसहितं केतुं पायौ देवेशि विन्यसेत् ॥२५॥ अब उन स्थानों का उल्लेख कर रहे हैं, जहाँ कि इनका विन्यास किया जाता है— हे प्रिये ! अपने शरीर में मातृका न्यास की पद्धति से इनका विन्यास करना चाहिये ॥ इन गणेशों को मातृका के वैखरी वर्णों का जहाँ जहाँ न्यास किया जाता है, उन्हीं स्थानों में विन्यस्त करना चाहिये ॥ अब ग्रहन्यास की विधि बताते हैं— स्वरों के साथ सूर्य को हृदय के नीचे और यकार आदि चार वर्णों के साथ चन्द्र को बिन्दुस्थान में विन्यस्त करना चाहिये । हे प्रिये ! कवर्ग के स्वामी मङ्गल को दोनों नेत्रों में, चवर्ग के अधिपति शुक्र को हृदय में, टवर्ग के अधिपति बुध को हृदय के ऊपर और हे प्रिये ! तवर्ग के अधिपति बृहस्पति को कण्ठ में विन्यस्त करना चाहिये । हे सुरेश्वरि ! पवर्ग के स्वामी शनैश्चर को नाभि में और शकार आदि चार वर्णों के अधिपति राहु को मुँह में विन्यस्त करे । हे देवेशि ! क्षकार के साथ केतु को पायु देश में विन्यस्त करे ॥२१-२५॥ १. देवि-ख. ने. ङ. च. छ. ज. झ. उ. । २. स्थान-ख. च. ज. झ., स्थानके पुनः-ने. उ. । ३. स्थान-ने. ज. झ. उ. । ४. बुधः-ख. । ५. विन्यस्य-घ. ज. झ. उ. । ६. देवि-क. ग. । ७. लक्षाभ्यां-उ. ।
२३६ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः स्वरैः अकारादिविसर्गान्तैः षोडशभिः सहितम्, 'नाम्न आदौ, सूर्यं हृदयाधो विन्यसेत्²। बिन्दुस्थाने ललाटे। अत्रैवोक्तम् - "दीपाकारोऽर्धमात्रश्च ललाटे वृत्त इष्यते" (१।२८) इत्यादिना। सुधासूतिं चन्द्रमसम्। यादिवर्णचतुष्टयैः यरलवै³श्चतुर्भिर्विन्यसेदित्यर्थः। भूपुत्रम् अङ्गारकम्। लोचनद्वन्द्वे कवर्गस्योपरि स्थितमधिपतिं विन्यसेत्। हृदये वक्षसि। स्पष्टमन्यत् पायौ देवेशि विन्यसेदि- त्यन्तम् ॥२१-२५॥ नक्षत्राणां स्थानानि न्यासं चाह- ललाटे दक्षनेत्रे च वामे कर्णद्वये पुनः । पुटयोर्नासिकायाश्च कण्ठे स्कन्धद्वये पुनः ॥२६॥ पश्चात् कूर्पर४युग्मे च मणिबन्धद्वये ५तथा । स्त⁶नयोर्नाभिदेशे च कटिबन्धे ततः परम् ॥२७॥ ऊरुयुग्मे तथा जान्वोर्जङ्घयोश्च पदद्वये । ज्वलत्कालानलप्रख्या वरदाभयपाणयः ॥२८॥ अकार से विसर्ग पर्यन्त सोलह स्वरों के साथ सूर्य को हृदय के नीचे विन्यस्त करे। बिन्दुस्थान, अर्थात् ललाट में सुधासूति चन्द्रमा को य र ल व इन चार वर्णों के साथ विन्यस्त करे। ललाट में बिन्दु का स्थान है, यह विषय यहीं (१।२८) वर्णित हो चुका है। भूपुत्र (अंगारक) मंगल को कवर्ग के अधिपति के रूप में दोनों नेत्रों में विन्यस्त करे। हृदय का अर्थ वक्षस्थल है। 'पायौ देवेशि विन्यसेत्' पर्यन्त अन्य पदों का अर्थ स्पष्ट है ॥२१-२५॥¹ स्थाननिर्देश पूर्वक नक्षत्रों का न्यास बताया जा रहा है- हे देवताओं के द्वारा पूजित देवि ! ललाट, दक्ष और वाम नेत्र, दोनों कान, दोनों नासापुट, कण्ठ, दोनों कन्धे, दोनों कूर्पर (कोहनियाँ), दोनों मणिबन्ध (कलाईयाँ), दोनों स्तन, नाभिदेश, दोनों कटिबन्ध, दोनों जांघे, दोनों घुटने, दोनों पिण्डलियाँ, दोनों पैर-इन सत्ताईस स्थानों में सत्ताईस नक्षत्रों का विन्यास १. आदौ नाम्ना-क. ख. ग.। २. विन्यस्य-ख. ने. झ. उ.। ३. 'चतुर्भिः' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ.। ४. कूर्परयोर्युग्मे-क. उ.। ५. पुनः-क. ग., ऽपि च-ज.। ६. हस्तयोः-च. छ. ज. झ.। ७. द्वन्द्वे-च. उ.।
- कुछ पुस्तकों में प्रस्तुत प्रकरण में ग्रह आदि के ध्यान के श्लोक भी मिलते हैं।- दीपिका में इनकी व्याख्या नहीं मिलती। आगे (३।३०-३१) दीपिकाकार कहते हैं कि ध्यान आगमान्तर से जानना चाहिये। इससे भी इस बात की पुष्टि होती है कि योगिनी- हृदय में ग्रह, नक्षत्र आदि का ध्यान वर्णित नहीं है।
नतिपाण्योऽश्विनोपूर्वाः सर्वाभरणभूषिताः । एतास्तु विन्यसेद् देवि स्थानेष्वेषु सुरार्चिते ॥२९॥ कटिबन्ध इति कटिबन्धयोरिति द्वन्द्वपरम्। अन्यथा सप्तविंशतिसंख्या न घटते। कर्णद्वय इति दक्षिणादितः, "दक्षनेत्रे च वामे च" (३।२६) इति क्रमस्यो- पक्रान्तत्वात्। वरदाभयपाणयो नतिपाण्य इत्युक्त्या बाहुचतुष्टयं गम्यते। शेषं सुगमम् ॥२६-२९॥ योगिनीन्यासमाह— विशुद्धौ हृदये नाभौ स्वाधिष्ठाने च मूलके । आज्ञायां धातुनाथाश्च न्यस्तव्या डादिदेवताः ॥३०॥ अमृतादियुताः सम्यग् ध्यातव्याश्च सुरेश्वरि । पादे लिङ्गे च कुक्षौ च हृदये बाहुमूलयोः ॥३१॥ विशुद्धौ तालुमूले षोडशदलकमले। ¹हृदयेऽनाहते द्वादशदलकमले। नाभौ मणिपूरके दशदलकमले। स्वाधिष्ठाने षड्दलकमले। मूलके चतुर्दलकमले। आज्ञायां द्विदलकमले। धातवस्त्वगसृङ्मांसमेदो²मज्जाशुक्राणि, तेषां नाथाः करना चाहिये। सभी अश्विनी आदि नक्षत्र जलते हुए कालानल के समान हैं। इनके दो हाथ वर और अभय मुद्रा से सुशोभित हैं और बाकी के दो हाथ प्रणाम की मुद्रा में हैं ॥२६-२९॥ कटिबन्ध में एकवचन दोनों कटिबन्धों का सूचक है। इसके बिना स्थानों की सत्ताईस संख्या पूरी नहीं हो सकती। कर्णद्वय इत्यादि स्थलों पर पहले दक्षिण तब बाद में वाम भाग में न्यास किया जाता है। नेत्र के प्रसंग में इस क्रम को यहीं (३।२६) बताया गया है, अतः अन्यत्र भी इसी क्रम का अनुसरण करना उचित है। वरदाभयपाणि और नतिपाणि विशे- षणों से इनके चार हाथ हैं, यह सिद्ध होता है। बाकी पदों का अर्थ स्पष्ट है ॥२६-२९॥ अब योगिनीन्यास का उपदेश करते हैं— विशुद्धि, हृदय, नाभि, स्वाधिष्ठान, मूलाधार और आज्ञा चक्रों में छः धातुओं की स्वामिनी डाकिनी आदि योगिनियों का विन्यास करना चाहिये। अमृता आदि देवियों के साथ इनका ध्यान भी करना चाहिये। पाद, लिङ्ग, कुक्षि, हृदय और दोनों बाहुमूलों में इनका न्यास किया जाता है ॥३०-३१॥ तालुमूलस्थित षोडशदल कमल को विशुद्धि, हृदयस्थित द्वादशदल कमल को अनाहत, नाभिस्थित दशदल कमल को मणिपूरक, षड्दल कमल को स्वाधिष्ठान और चतुर्दल कमल को मूलाधार कहते हैं। आज्ञाचक्र में द्विदल कमल है। त्वचा, रक्त, मांस, मेदा, १. 'हृदये''''द्विदलकमले' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । २. मेदोऽस्थि-सार्वत्रिको पाठः।
२३८ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः स्वामिन्यः। दादिदेवताः डाकिनीराकिनीलाकिनीकाकिनीसाकिनीहाकिन्यः। अमृतादियुताः स्वच्छन्दसंग्रहोक्ताः। यथा— अमृता प्रथमा देवी द्वितीयाकर्षिणी मता। इन्द्राणी च तृतीया स्यादींशानी तु चतुर्थिका॥ पञ्चमी स्यादुमा देवी षष्ठी चैवोर्ध्वकेशिनी। सप्तमी ऋद्धिदा प्रोक्ता ऋषा चाष्टमिकी मता॥ लृका नवमिका प्रोक्ता लृषा स्याद् दशमी तथा। एकादशी^१ यथा चैकपादा द्वादशिका शिवे॥ ऐश्वर्याभिरता पश्चादोङ्कारी तु त्रयोदशी। चतुर्दशी^२ चौषधात्मा पञ्चाधिकदशाऽम्बिका॥ षोडशी त्वःक्षरा देवी प्रोक्ताः षोडश ^३कण्ठगाः। कालरात्रिश्च खातीता गायत्री च ततः परम्॥ घण्टाधारी च ङार्णात्मा चण्डा छाया जयाऽपि च। झङ्कारी ज्ञानरूपा च टङ्कहस्ता ततः परम्॥ ठङ्कारी द्वादश ह्येता द्वादशारे समर्चयेत्। ^४डामरी चैव ढङ्कारी ^५णामिनी तामसी तथा॥ मज्जा और शुक्र ये छः ^१धातुएं हैं। इनकी स्वामिनियां है दादि देवता, अर्थात् डाकिनी, राकिनी, लाकिनी, काकिनी, साकिनी और हाकिनी नामक योगिनियां। अमृता आदि देवियों के नाम स्वच्छन्दसंग्रह में बताये गये हैं। जैसे कि— ^२अमृता पहली देवी है। दूसरी आकर्षिणी मानी गई है। तीसरी इन्द्राणी और चौथी ईशानी है। पाँचवीं उमा देवी और छठी ऊर्ध्वकेशिनी है। सातवीं का नाम ऋद्धिदा और आठवीं का ऋषा है। नवमी लृका तथा दसवीं लृषा है। एकपादा ग्यारहवीं है और हे शिवे ! ऐश्वर्याभिरता बारहवीं तथा ओङ्कारी तेरहवीं देवी है। औषधात्मा चौदहवीं और पन्द्रहवीं देवी अम्बिका है। सोलहवीं अःक्षरा देवी है। ये सभी सोलह देवियां कण्ठ, अर्थात् तालुगत विशुद्धिचक्र में विन्यस्त की जाती हैं। कालरात्रि, खातीता, गायत्री, घण्टाधारी, ङार्णात्मा, चण्डा, छाया, जया, झङ्कारी, ज्ञानरूपा, टङ्कहस्ता और १. शीति सा-उ. । २. दंश्योष-ख. ने. झ. उ. । ३. शक्तयः-क. ग. । ४. डाकिनीं- क. ग. ने. ज. । ५. णादिनीं-ने. । १. पृ० १९० की टिप्पणी देखिये। स्वच्छन्दसंग्रह के इस लम्बे उद्धरण में छः चक्रों और उनकी अधिष्ठात्री योगिनियों की चर्चा है। २. पहले (१।२५-२६) अकुल आदि शब्दों की व्याख्या के प्रसंग में स्वच्छन्दसंग्रह के इसी उद्धरण के आधार पर टिप्पणी में वरदा आदि शक्तियों के नाम दिये गये हैं।
तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २३९ थान्तां दाक्षायणीं चैव धात्रीं १नन्दां च पार्वतीम् । २फट्कारीं दशपत्रेषु पूर्वादीशान्तिमं यजेत् ॥ बन्धि(न्दि)नीं भद्रकालीं च महामायां यशस्विनीम् । रक्तां लम्बोष्ठिकां चैव पूजयेत् क्रमशः प्रिये ॥ चतुष्पत्रे च देवेशि वरदां च श्रियं तथा। षष्ठां सरस्वतीं चैव पूजयेत् क्रमशः शिवे ॥ क्षमां हंसवतीं चैव पूजयेच्च ३द्विपत्रके। ४एताभिः शक्तिभिर्युक्ता ध्यातव्याश्च सुरेश्वरि ॥ (इति ।) ५"न्यासं निर्वर्तयेत्” (३।८) इत्ययमान्तरो न्यासः । ६ध्यानं त्वागमान्तरा- दवगन्तव्यम् ॥३०-३१॥ राशिन्यासमाह— दक्षिणं ७पादमारभ्य वामपादावसानकम् । मेषादिराशयो वर्णैर्न्यस्तव्या सह पर्वति ॥३२॥ ठङ्कारी ये बारह देवियाँ हृदयस्थित द्वादशदल कमल में विन्यस्त की जाती हैं। डामरी, ढङ्कारी, णामिनी, तामसी, थान्ता, दाक्षायणी, धात्री, नन्दा, पार्वती, फट्कारी ये दस देवियाँ नाभिस्थित दशार पद्म में विन्यस्त की जाती हैं। पूर्व से लेकर ईशान पर्यन्त इनका यजन किया जाना चाहिये । बन्धि(न्दि)नी, भद्रकाली, महामाया, यशस्विनी, रक्ता, लम्बोष्ठिका, इन छः देवियों को हे प्रिये ! स्वाधिष्ठान नामक षड्दल कमल में विन्यस्त करना चाहिये । हे शिवे ! हे देवेशि ! चतुष्पत्र आधार कमल में वरदा, श्री, षण्ढा और सरस्वती इन चार देवियों का यजन करना चाहिये । क्षमा और हंसवती को दो दल वाले आज्ञाचक्र में विन्यस्त करना चाहिये । इन शक्तियों के साथ क्रमशः डाकिनी प्रभृति योगिनियों का ध्यान करना चाहिये ॥ न्यास का विधान करने वाला (३।८ से प्रारंभ हुआ ) यह प्रकरण आन्तर न्यास का वर्णन करता है । ध्यान तो दूसरे आगमों से जानना चाहिये ॥३०-३१॥ राशिन्यास की पद्धति यह है— हे पर्वति ! दाहिने पैर से लेकर वाम पाद पर्यन्त स्थानों में मेष आदि राशियों का वर्णों के साथ न्यास करना चाहिये ॥३२॥ १. नादां-ने. ज. झ. उ. । २. फेत्कारीं-ख. झ. उ. । ३. द्विपत्रयोः-क. ग. ज. । ४. छ.ज.मातृकयोः श्लोकार्धोऽयं मूले स्थाप्यते । ५. न्यासं निर्वर्त्य एवं मातरो ध्यातव्या अपीत्यर्थः । ध्यानं निर्वर्त्यायमान्तरो न्यास इत्यर्थः-ख. ने. झ. उ., अमृतादीनां ध्याना- नन्तरं न्यास इत्यर्थः-ज. । ६. ध्यानमागमा-क. ग. उ. । ७. पार्श्वं-क. च. छ. ज. ८. पार्वति-क. ख. च. छ. ज. झ. उ.
२४० योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः पादादिस्थानेषु दक्षिणादितो वामान्तम् । मेषादिराशयः$^१$ मेषवृषमिथुन- कर्कसिंहकन्यातुलावृश्चिकधनुर्मकरकुम्भमीनाः । वर्णैर्मातृकाक्षरैः सह न्यस्तव्याः । राशीनां वर्णा आगमान्तरसंवादान्मयोच्यन्ते— आद्यैश्चतुर्भिः सहितो मेषो दक्षपदे$^२$ऽक्षरैः । उकाराद्यैस्त्रिभिर्वर्णैर्वृषभो लिङ्गदक्षिणे ॥ ऋकाराद्यैस्त्रिभिर्वर्णैर्मिथुनं कुक्षिदक्षिणे । एऐभ्यां कर्कटो राशियुक्तो$^३$ वक्षसि दक्षिणे ॥ ओऔभ्यां सहितः सिंहो दक्षिणबाहुमूलके । अंअःशवर्गकैः कन्या $^४$शिरोदक्षिणभागतः ॥ कवर्गण तुला मूर्ध्नि वामे तद्बाहुमूलके । वृश्चिकश्च चवर्गेण टवर्गेण धनुर्हृदि ॥ वामे तवर्गसंयुक्तो मकरः कुक्षिवामतः । पवर्गेण पुनः कुम्भो $^५$लिङ्गवामप्रदेशतः ॥ यवर्गः क्षार्णसंयुक्तो $^६$मीनाख्यो वामपादके । इति ॥३२॥
पैर आदि स्थानों में दक्षिण भाग से आरम्भ कर वाम भाग पर्यन्त मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ और मीन इन बारह राशियों का मातृका वर्णों के साथ विन्यास करना चाहिये । अन्य आगम के प्रमाण से यहाँ $^१$राशियों के वर्णों का उल्लेख किया जा रहा है— अकार आदि चार अक्षरों के साथ दाहिने पैर में मेष राशि का, उकार आदि तीन वर्णों के साथ लिंग के दक्षिण भाग में वृष का, ऋकार आदि तीन वर्णों के साथ कुक्षि के दक्षिण में मिथुन का, ए और ऐ से संयुक्त कर्क राशि का वक्ष (हृदय) के दक्षिण में, ओ और औ के साथ सिंह का बाहुमूल के दक्षिण में, अं और अः वर्णों के साथ कन्या का शिर के दाहिने भाग में न्यास करना चाहिये । कवर्ग के साथ तुला का शिर के बायें भाग में, चवर्ग के साथ वृश्चिक का बाहुमूल के वाम भाग में, टवर्ग के साथ धनु का हृदय के वाम भाग में, तवर्ग के साथ मकर का कुक्षि के वाम भाग में, पवर्ग के साथ कुम्भ का लिंग के वाम भाग में और यकार से क्षकार पर्यन्त अक्षरों के साथ मीन का बायें पैर में न्यास करना चाहिये ।।३२।।
१. इतः परम्—'मेषादिमीनान्ताः' इत्यधिकं-क. ग. । २. दे स्वरैः-क. ग. । ३. युंतो-ख. ने. झ. उ. । ४. शिखा-ख. ने. झ. उ. । ५. वामे लिङ्ग-ख. ने. ज. झ. उ. । ६. मीनः स्यात्-ख ने. ज. झ. उ. । १. प्रपंचसार (४।३४-३७) में यह विषय वर्णित है । लगता है, अमृतानन्द ने ऐसे ही आगमों की सहायता से इस विषय को स्वलिखित श्लोकों में संगृहीत कर दिया है ।
तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २४१ पीठन्यासमाह— पीठानि विन्यसेद् देवि मातृकास्थानके पुनः१ । मातृकास्थानक इति जातावेकवचनम् । वैखरीवर्णस्थानेष्वित्यर्थः ॥ ननु कानि तानि पीठानीत्यत आह— तेषां नामानि कथ्यन्ते शृणुष्वावहिता प्रिये२ ॥३३॥ बहुत्वात् पीठानां पीठनाम्नां धर्तुमशक्यत्वादत्यन्तसावधाना भवेत्यर्थः ॥३३॥ तन्नामान्याह— कामरूपं वाराणसीं नेपालं पौण्ड्रवर्धनम् । पुर३स्थिरं कान्यकुब्जं पूर्णशैलं तथार्बुदम् ॥३४॥ आम्रातकेश्वर५काम्रे त्रिस्रोतः कामकोटकम् । कैलाशं भृगुनगरं केदार४पूर्णचन्द्रके ॥३५॥ श्रीपीठमोड्ड्रारपीठं जालन्ध्रं६ मालवोत्कले७ । ८कुलान्तं देविकोट्टं च गोकर्णं मारुतेश्वरम् ॥३६॥ अब पीठन्यास बताते हैं— हे देवि ! मातृका के वैखरी वर्णों में पीठों का न्यास करे ॥ ‘मातृकास्थानके’ यहाँ एकवचन जातिवाचक है। इसका अर्थ होगा कि मातृका के वैखरी वर्णों के जो स्थान हैं, उन्हीं स्थानों में पीठों का भी न्यास करे ॥ वे पीठ कौन-कौन से हैं, इस विषय में कहते हैं— हे प्रिये ! अब मैं उनके नाम बता रहा हूँ। तुम सावधान होकर सुनो ॥३३॥ पीठ बहुत से हैं, उनके अनेक नाम हैं। इनको याद रख पाना कठिन है, अतः बहुत सावधान होकर तुम इनके नाम सुनो ॥३३॥ अब पीठों के नाम बताये जा रहे हैं— कामरूप, वाराणसी, नेपाल, पौण्ड्रवर्धन, पुरस्थिर, कान्यकुब्ज, पूर्णशैल, अर्बुद, आम्रातकेश्वर, एकाम्र, त्रिस्रोत, कामकोटक, कैलाश, भृगुनगर, केदार, पूर्णचन्द्रक, श्रीपीठ, ओड्ड्रारपीठ, जालन्धर, मालव, उत्कल, कुलान्त, देविकोट्ट, १. न्यासवत्-ने. छ. ज. । २. प्रिये-ने. च. छ. ज. झ. । ३. चरस्थिरं-क. ग. ड. । ४. रं चन्द्रपुष्करम्-ख. ने. च. छ. ज. झ. उ. । ५. मेकपादं च-च. ज. झ., मेकवी- राख्यं-छ. उ. । ६. जालाख्यं-ख. ने. छ. ज. झ. उ. । ७. वं तथा-ख. ने. च. छ. ज. झ. उ. । ८. कुलमट्टं च-ख. ने. च. छ. ज. झ. उ. । १६
२४२ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः अट्टहासं च विरजं राजगृहं¹ महापथम् । कोलापुरमेलापुरं ²कालेशं तु जयन्तिका ॥३७॥ उज्जयिनीं³ विचित्रं च क्षीरकं हस्तिनापुरम् । ओड्डीशं च प्रयागाख्यं षँष्ठी मायापुरी तथा ॥३८॥ जलेशं मलयं शैलं मेरुं गिरिवरं तथा । माहेन्द्रं वामनं चैव हिरण्यपुरमेव च ॥३९॥ महालक्ष्मीपुरोड्याणे छायाछैत्रमतः परम् । एते पीठाः समुद्दिष्टा मातृकारूपकाः स्थिताः ॥४०॥ एते पीठाः समुद्दिष्टा गृहीतनामानः पीठाः । मातृकारूपकाः स्थिताः मातृका रूपं येषां ते मातृकारूपकाः । क्रमेणादिक्षान्तानामेकैकं वर्णमेकैकस्यादावुक्त्वा तत्त- द्वर्ण⁶स्थानेषु पीठानां न्यासं कुर्यादित्यर्थः । [⁷पीठानां मातृकामयताकथनं गणेशा- दीनामप्युपलक्षणम् । वर्गवर्णानामादौ वैखर्यक्षराण्यागमान्तरसंवादाद् विभज्य योज्यानीत्यर्थः] ॥३४-४०॥ गोकर्ण, मारुतेश्वर, अट्टहास, विरज, राजगेह, महापथ, कोलापुर, एलापुर, कालेश, जयन्तिका, उज्जयिनी, चित्रा, क्षीरक, हस्तिनापुर, ओड्डीश, प्रयाग, षष्ठी, मायापुर, जलेश, मलयशैल, मेरुगिरि, माहेन्द्र, वामन, हिरण्यपुर, महालक्ष्मीपुर, ओडयाण, छायाछत्र—ये पचास पीठ हैं। मातृकाओं के साथ इनका न्यास किया जाता है ॥३४-४०॥ इस तरह से यहाँ ¹पचास पीठों के नाम बताये गये हैं। ये सब मातृका वर्णों के ही प्रतिरूप हैं, अर्थात् वैखरी मातृका के एक-एक वर्ण से एक-एक पीठ की उत्पत्ति हुई है, अतः इन पीठों में वर्ण प्रतिबिम्बित हैं। इसीलिये क्रमशः अकार से क्षकार पर्यन्त एक- एक वर्ण का उच्चारण कर उन-उन वर्णों के स्थानों में ही इन पीठों का भी न्यास करना चाहिये । [पीठों को जैसे यहाँ मातृकामय कहा है, उसी तरह से गणेश, ग्रह, नक्षत्र आदि की भी मातृकामयता माननी चाहिये । वर्ग वर्णों के आरंभ में वैखरी वर्णों के संयो- जन की विधि अन्य आगमों से जाननी चाहिये] ॥३४-४०॥ १. गेहं-क. ग.। २. ओड्डारं-च. छ. ज. झ.। ३. न्यपि चित्रा च-क. ग., चित्राख्यं- ड. । ४. षष्ठं मायापुरं-क. ग. । ५. पुर-ड. उ. । ६. 'वर्ण' नास्ति-ख. ने. ज. झ. । ७. 'पीठानां ॰॰॰नीयर्थः' नास्ति-ख. ज. झ. ब. उ. । १. पीठ ५० है या ५१, इस विषय में अपनी व्याख्या में भास्करराय ने अन्तिम पक्ष का समर्थन किया है। उपोद्घात में इस विषय पर विचार करने का प्रयत्न किया जायगा।
तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २४३ षोढान्यासानन्तरं श्रीचक्रन्यासस्याऽवश्यंभावित्वात् तदिदानीं श्रीचक्रन्यास- माह— एवं षोढा पुरा¹ कृत्वा श्रीचक्रन्यासमाचरेत् । एवम् उक्तप्रकारेण, षोढा षट्प्रकारं न्यासम्, पुरा¹ कृत्वा, पश्चात् श्रीचक्र- न्यासमाचरेदित्यर्थः ॥४१॥ श्रीचक्रन्यासस्य महाप्रयोजनत्वादनन्यकथितमप्यद्य प्रियायै कथयामीत्याह— श्रीमत्त्रिपुरसुन्दर्याश्चक्रन्यासं शृणु प्रिये ॥४१॥ यन्न कस्यचिदाख्यातं तनुशुद्धिकरं परम् । आनन्द²कणभिक्षार्थं शब्दस्पर्शादिपक्कणे । अटत्यविरतं येन तद्दारिद्र्यं विदुर्बुधाः ॥ इत्यभियुक्तवचनोक्तरीत्या संकोचलक्षणदारिद्र्यविघातिनी³ परिपूर्णपरानन्द- रूपा सम्पत् श्रीरित्युच्यते । तद्वती त्रिपुरसुन्दरी । त्रिपुरा तुरीयरूपत्वात्, सुन्दरी षोढान्यास के बाद चक्रन्यास का अनुष्ठान अवश्य किया जाता है। इसलिये अब चक्रन्यास का वर्णन करते हैं— इस तरह से पहले षोढान्यास करके तब श्रीचक्र का न्यास करे ॥४१॥ ऊपर बताई गई विधि से गणेश, ग्रह, नक्षत्र आदि के भेद से वर्णित छः प्रकार के न्यासों को पहले करके बाद में श्रीचक्रन्यास करना चाहिये ॥४१॥ यह श्रीचक्रन्यास बहुत ही महत्त्वपूर्ण है, अब तक इसका उपदेश किसी को नहीं किया गया था, अब भगवती को उसका उपदेश किया जा रहा है— हे प्रिये ! भगवती श्रीमती त्रिपुरसुन्दरी के इस चक्रन्यास को तुम सुनो । इसको अब तक मैंने किसी को नहीं बताया है। यह उत्कृष्ट न्यास साधक के शरीर को पवित्र बना देता है ॥४१-४२॥ आनन्द के एक कण की भीख माँगने के लिये व्यक्ति शब्द, स्पर्श रूपी कोल-भीलों की बस्ती में निरन्तर भटकता रहता है । विद्वानों की दृष्टि में मनुष्य की वास्तविक दरिद्रता यही है ।। किसी ¹प्रामाणिक व्यक्ति का यह कथन है । व्यक्ति का यह संकुचित स्वरूप ही सबसे बड़ी दरिद्रता है । इस दारिद्र्य को दूर करने वाली परिपूर्ण परमानन्द स्वरूपिणी १. पुरः-क. ग. । २. कन्द-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. निर्वर्तिनी-ख. ने. झ. उ. ।
- ऋजुविमर्शिनीकार शिवानन्द ने इसको भट्ट गंगाधर मिश्र के वचन के रूप में उद्धृत किया है (पृ० ६९) । वहीं (पृ० १३४) भट्ट गंगाधर के किसी स्तोत्र का भी उल्लेख मिलता है । हो सकता है ये सभी श्लोक उस स्तोत्र ग्रन्थ के ही हों ।
२४४ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः भेदंलक्षणप्रपञ्चापरपर्यायपरमदौर्भाग्यपरिपन्थिपरमाद्वैतसौभाग्यपदाधिरूढा सर्व- प्राणिष्वात्मतया परमप्रेमास्पदीभूता परचित्कला । तस्याश्चक्रं शिवादिक्षितिपर्यन्त- ^१तत्त्वमयम्, तदाविर्भाव(भूमिः?मिम्) । ^२त(स्या?स्य) न्यासं शृणु प्रिये । प्रियायै मदेकरस्यलालसायै कथयामि । यन्न कस्यचिदाख्यातम्, अतिरहस्यत्वात् । ^३श्री- चक्रन्यासस्य महाप्रयोजनत्वादनन्यकथितमपि प्रियायै ते कथयामीत्यर्थः । तनुशुद्धि- करं परम् । तनोः षट्त्रिंशत्तत्त्वात्मनः शुद्धिं परचित्पर्यवसानलक्षणां करोति । अतः एव परमुत्कृष्टमितरन्यासेभ्यः ॥४१-४२॥ श्रीचक्रन्यासप्रकारमाह— चतुरस्राद्यरेखायै नम इत्यादितो न्यसेत् ॥४२॥ दक्षांसपृष्ठपाण्यग्रस्फिक्कपादाङ्गुलीष्वथ । वामाङ्घ्यङ्गुलीषु स्फिक्के पाण्यग्रे चांसपृष्ठके ॥४३॥ सचूलीमूलपृष्ठेषु^४ व्यापकत्वेन सुन्दरि । सम्पत्ति ही यहाँ श्री कही गई है । यह श्री भगवती त्रिपुरसुन्दरी ही है । तीन रूपों से ऊपर तुरीय स्वरूपिणी देवी त्रिपुरा है और भेद (द्वैत) रूप में भासित हो रहे इस प्रपंच (जगत्) रूपी परम दुर्भाग्य का नाश कर परम अद्वैत स्वरूप सौभाग्य को देने वाली, सभी प्राणियों में अपनी-अपनी आत्मा के रूप में प्रतीत हो रही, परम प्रेम से ओतप्रोत यह परचित्कला ही सुन्दरी है। इस भगवती त्रिपुरसुन्दरी के चक्र से ही शिव से पृथिवी पर्यन्त तत्त्वमय जगत् का आविर्भाव होता है । हे प्रिये ! उस श्रीचक्र के न्यास को अब तुम सुनो । मेरे साथ एकरस होने की लालसावाली प्रिया को अब मैं इसका उपदेश कर रहा हूँ । इस विषय के अत्यन्त रहस्यपूर्ण होने से ही इसे अब तक किसी को नहीं सुनाया था । यह श्रीचक्र न्यास अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, अतः यद्यपि अब तक इसको किसी को नहीं बताया गया, किन्तु अब तुमको मैं इसका उपदेश कर रहा हूं। यह न्यास ३६ तत्त्वों वाले शरीर को पर चित्कला में लीन करके उसको निर्मल बना देता है । इसीलिये अन्य न्यासों की अपेक्षा यह उत्तम है ॥४१-४२॥ अब इस श्रीचक्रन्यास की विधि बताते हैं— “चतुरस्राद्यरेखायै नमः” इस मन्त्र से सबसे पहले दाहिने कन्धे के पिछले हिस्से में, दाहिने हाथ की अंगुलियों में, दक्षिण नितम्ब भाग में, दाहिने पैर की अंगुलियों में, बायें पैर की अंगुलियों में, वाम नितम्ब भाग में, बायें हाथ की अंगुलियों में, बायें कन्धे के पीछे तथा सिर के आगे के और पीछे के हिस्से में— इस तरह से इन दस स्थानों में हे सुन्दरि ! व्यापक न्यास करना चाहिये ॥४२-४४॥ १. तत्त्वचक्रमयं तदविनाभाव-ख. ने. ज. झ. उ. । २. 'तस्या' नास्ति-क. ग. । ३. 'श्रीचक्र ... यामीत्यर्थः' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. 'सुन्दरि' इत्यादिकं नास्ति-क.
तृतीयः ] दीपिकभाषानुवादसहितम् २४५ “चतुरस्राद्यरेखायै नमः" इति¹ मन्त्रेण आदितो दक्षांसपृष्ठादिचूलीपृष्ठान्त- स्थानेषु दशसु व्यापकत्वेन न्यसेत् । दक्षांसस्य पृष्ठं पश्चाद्भागः । सचूलीमूलेति । मूलं शिरसः पुरस्ताद्भागः । पृष्ठं शिरसः पश्चाद्भागः । स्फिग्वेव स्फिक्कम् ²ऊरु- सन्धिः । स्पष्टमन्यत् ॥४२-४४॥ एषु स्थानेषु न्यस्तव्याः शक्तीराह— अत्रैव स्थानदशकेऽणिमाद्या दश न्यसेत् ॥४४॥ सिद्धीः अणिमालघिमामहिमेशितावशित्वप्राकाम्यभुक्तीच्छाप्राप्तिसर्वकामाख्याः सिद्ध- योऽणिमाद्या दश ॥४४-४५॥ चतुरस्रमध्यरेखायां व्यापकमाह— तदन्तश्च तनुव्यापकत्वेन सुन्दरि । चतुरस्रमध्यरेखायै नम इत्यपि वल्लभे ॥४५॥ ³विन्यसेत् “चतुरस्राद्यरेखायै नमः" इस मन्त्र से प्रथमतः दाहिने कन्धे के पृष्ठ भाग से लेकर चूली (सिर) के पृष्ठ भाग पर्यन्त दस स्थानों में व्यापक न्यास करे । दाहिने कन्धे का पृष्ठ पिछला भाग है। मूल का अर्थ सिर का अगला भाग और पृष्ठ पिछला हिस्सा है। स्फिक् के लिये ही स्फिक्वक शब्द प्रयुक्त है । इसका अर्थ ऊरु सन्धि अर्थात् नितम्ब भाग है । बाकी शब्दों का अर्थ स्पष्ट है ॥४२-४४॥ इन स्थानों में जिन शक्तियों का विन्यास करना है, अब उनको बताया जा रहा है— इन्हीं दस स्थानों में अणिमा आदि दस सिद्धियों का न्यास करना चाहिये ॥४४-४५॥ अणिमा, लघिमा, महिमा, ईशिता, वशिता, प्राकाम्य, भुक्ति, इच्छा, प्राप्ति और सर्वकामा—ये दस सिद्धियाँ हैं ॥४४-४५॥ चतुरस्र की मध्यरेखा में व्यापक न्यास इस तरह से किया जाता है— हे सुन्दरि ! वल्लभे ! इसके अन्दर की मध्यरेखा में “चतुरस्रमध्यरेखायै नमः" इस मन्त्र से पूरे शरीर में व्यापक न्यास करे ॥४५-४६॥ १. इत्यादि-ख. ने. ज. झ. उ. । २. 'ऊरुसन्धिः' नास्ति-क. ग. ने. । ३. विन्यस्य- ख. छ. ज., तस्याः-क. ग. ।
२४६ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः तदन्तः सिद्धिस्यानानामन्तर्देशे "चतुरस्रमध्यरेखायै नमः" १इति मन्त्रेण तनुव्यापकत्वेन विन्यसेदित्यन्वयः२ ॥४५-४६॥ चतुरस्रमध्यरेखायां न्यस्तव्याः शक्तीराह— तस्याः३ स्थानेषु ब्रह्माण्याद्यास्तथाऽष्टसु । तस्याः चतुरस्रमध्यरेखायाः । अष्टसु स्थानेषु । ब्रह्माण्याद्या ब्रह्माणीमाहे- श्वरीकौमारीवैष्णवीवाराहीन्द्राणीचामुण्डामहालक्ष्मीः । तथा विन्यसेदित्य- न्वयः ॥४६॥ तासां स्थानाष्टकमाह— पादाङ्गुष्ठद्वये पार्श्वे दक्षे मूर्ध्नोऽन्यैपार्श्वके ॥४६॥ वामदक्षिणजान्वोश्च बहिरांसद्वये तथा। स्पष्टम्५ ॥४६-४७॥ इसके अन्दर, अर्थात् दस सिद्धियों का जहाँ विन्यास किया गया, उस रेखा से बाद की मध्य रेखा में "चतुरस्रमध्यरेखायै नमः" इस मन्त्र से व्यापक न्यास करे ॥४५-४६॥ चतुरस्र की मध्यरेखा में इन शक्तियों का न्यास करना चाहिये— उस चतुरस्र रेखा के आठ स्थानों में ब्रह्माणी आदि आठ शक्तियों का न्यास करना चाहिये ॥४६॥ उस चतुरस्र की मध्यरेखा के आठ स्थानों में ब्रह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इन्द्राणी, चामुण्डा और महालक्ष्मी—इस आठ शक्तियों का न्यास करना चाहिये ॥४६॥ इनके आठ स्थानों को अब बताते हैं— पैरों के दोनों अंगूठों में, सिर के दाहिने और बायें भाग में, वाम और दक्षिण जानुओं (घुटनों) में तथा दोनों कन्धों के बाहरी भागों में इनका न्यास किया जाता है ॥४६-४७॥ इस श्लोक का अर्थ स्पष्ट है ॥४६-४७॥ १. इत्यादि-ख. ज. झ. उ. । २. दित्यर्थः-क. ग. ने. झ. । ३. स्थानेषु विन्यस्य- क. ग. ने. झ.। ४. मूर्धन्य-क. ग. ने. झ. । ५. स्पष्टमेतत्-ज.।
तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २४७ चतुरस्रान्त्यरेखायां व्यापकमाह— न्यस्तव्याश्चतुरस्रान्त्यरेखायै नम इत्यपि ॥४७॥ विन्यसेद् व्यापकत्वेन पूर्वोक्तान्तेश्च विग्रहे। “चतुरस्रान्त्यरेखायै नमः” इति² मन्त्रेण। विग्रहे देहे। पूर्वोक्तान्तः पूर्वोक्तानां ब्राह्म्यादिस्थानानामन्तर्देशेषु व्यापकत्वेन न्यस्तव्याः। न्यासयोग्ये³ विन्य- सेत् ॥४७-४८॥ तस्यां चतुरस्रान्त्यरेखायां न्यस्तव्याः शक्तीराह— तस्याः स्थानेषु दशसु मुद्राणां दशकं न्यसेत् ॥४८॥ तस्याः चतुरस्रान्त्यरेखायाः। दशसु स्थानेषु त्रिखण्डामुद्रासहितानां⁴ संक्षोभिण्यादिमुद्राणां दशकं न्यसेत् ॥४८॥ तासां स्थानान्याह— ब्राह्मण्याद्यष्टस्थानां⁵न्तस्तासामष्टौ न्यसेत्⁶ ततः। शिष्टे द्वे द्वादशान्ते च पादाङ्गुष्ठे च विन्यसेत् ॥४९॥ चतुरस्र की अन्तिम रेखा में व्यापक न्यास बताते हैं— “चतुरस्रान्त्यरेखायै नमः” इस मन्त्र से पूर्वोक्त ब्राह्मी आदि शक्तियों के स्थान से बाद वाली अन्तिम रेखा में व्यापक न्यास करना चाहिये ॥४७-४८॥ “चतुरस्रान्त्यरेखायै नमः” इस मन्त्र से शरीर में पूर्वोक्त ब्राह्मी आदि शक्तियों के स्थान के बाद वाले स्थान में व्यापक न्यास के द्वारा आगे बताई गई शक्तियों का न्यास करना चाहिये ॥४७-४८॥ इस रेखा में न्यस्तव्य शक्तियों को बताते हैं— चतुरस्र की इस अन्तिम रेखा के दस स्थानों में दस मुद्राओं का न्यास करना चाहिये ॥४८॥ उस चतुरस्र की अन्तिम रेखा के दस स्थानों में त्रिखण्डा मुद्रा के साथ अन्य संक्षोभिणी आदि ¹मुद्राओं का न्यास करना चाहिये ॥४८॥ इन मुद्राओं के विन्यास के स्थान ये हैं— इन दस मुद्राओं में से आठ का न्यास ब्राह्मणी आदि आठ शक्तियों के न्यास- १. न्तर—ने., स्ताश्च—छ., क्तानां च—उ.। २. इत्यादि—ज. झ. उ.। ३. योगेन न्य- क. ग. । ४. सहितसंक्षोभिण्यादिमुद्रादशकं—ख. उ.। ५. नामन्तर—छ. ज. । ६. प्रविन्य- सेत्—उ., न्यसेदथ—ख. ङ. च. छ. ज. झ. ।
- त्रिखण्डा आदि दस मुद्राओं का बाह्य और आन्तर स्वरूप क्रमशः नि० पो० (३।३-२७) तथा यो० हृ० (१।५७-७१) में देखना चाहिये।
२४८ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः तासां मुद्राणां मध्ये, अष्टौ१ मुद्रा ब्रह्माण्याद्यष्टस्थानानामन्तर्देशेष्वष्टसु विन्यसेत्२। शिष्टे द्वे मुद्रे३ द्वादशान्ते४ पादाङ्गुष्ठे च विन्यसेत्। द्वादशान्तं षोडशान्तेन्दुमण्डलादधः सूर्यमण्डलस्थानम् ' तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे— षोडशान्तमिति ख्यातं व्योमस्थानेन्दुमण्डलम्। तदधःस्थानगं सूर्यबिम्बं द्वादशशक्तिकम् ॥ द्वादशान्त५मिति ख्यातं स्थितं व्योमप्रदेशकम्। इति तेन बिन्दुतत्त्वं चतुष्पत्राम्बुजं च तत् ॥ ६सूर्यबिम्बमधश्चोर्ध्वं सार्धैकाङ्गुलिदेशतः। इति७ रीत्या ललाटस्थानबिन्दुतत्त्वोपरि स्थितं सूर्यमण्डलस्थानं ललाटोर्ध्वं द्वादशान्तपदेन लक्ष्यते ॥४९॥ षोडशदलपद्मव्यापकमाह— तदन्तः षोडशदलपद्माय नम इत्यपि । विन्यस्य स्थान के अनुसार ही करना चाहिये। बाकी बची दो मुद्राओं को द्वादशान्त और पादाङ्गुष्ठ में विन्यस्त करे ॥४९॥ इन मुद्राओं में से आठ मुद्राओं का विन्यास ब्रह्माणी आदि शक्तियों के स्थानों के अन्तर्गत आठ स्थानों में करना चाहिये। बाकी बची दो मुद्राओं का विन्यास द्वादशान्त और पादाङ्गुष्ठ में किया जाय। षोडशान्त नामक चन्द्रमण्डल के नीचे स्थित सूर्यमण्डल के स्थान को द्वादशान्त कहते हैं। जैसा कि स्वच्छन्दसंग्रह में बताया गया है— उस आन्तर आकाश में विराजमान चन्द्रमण्डल षोडशान्त के नाम से प्रसिद्ध है। उसके नीचे बारह शक्तियों से संवलित सूर्यमण्डल स्थित है। इस आकाश प्रदेश को द्वादशान्त कहते हैं। इसके नीचे चार दल वाले कमल में बिन्दुतत्त्व का निवास है और इसी से डेढ़ अंगुल ऊपर सूर्यबिम्ब स्थित है ॥ इसके अनुसार ललाटस्थित बिन्दुतत्त्व के ऊपर सूर्यमण्डल है। ललाट के ऊपर स्थित यह सूर्यमण्डल ही द्वादशान्त कहा जाता है ॥४९॥ षोडशदल पद्म का व्यापक न्यास बताते हैं— इन चतुरस्रों के भीतर “षोडशदलपद्माय नमः” इस मन्त्र से व्यापक न्यास करे ॥ १. अष्ट-क. ग. । २. विन्यस्य-ख. ने. . झ. । ३. 'मुद्रे' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. द्वादशान्तपादाङ्गुष्ठयोर्वि-ख. ने. ज. झ. । ५. न्तं स्मृतं तेन-ख. ने. ज. झ. उ. । ६. सूर्यं बिन्दुमधश्चोर्ध्वं-ख. झ. उ. । ७. अनेन-ज. ।
तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २४९ तेषां चतुरस्राणाम्, अन्तर्देशे¹ “षोडशदलपद्माय नमः” ²इति मन्त्रेण ³दक्षिण- श्रोत्रपृष्ठादिस्थानानि संस्पृश्य व्यापकं विन्यसेदित्यर्थः ॥५०॥ तद्दलेषु न्यस्तव्याः शक्तीराह— तद्दले कामाकर्षिण्याद्याश्च विन्यसेत् ॥५०॥ तद्दले, जातावेकवचनम्, तद्दलेषु। कामाकर्षिण्याद्याः कामबुद्ध्यहङ्कार- शब्दस्पर्शरूपरसगन्धचित्तधैर्यस्मृतिनामबीजात्मामृतशरीराकर्षिण्यः,⁴ ता विन्य- सेत् ॥५०॥ तद्दलस्थानान्याह— दलानि दक्षिणश्रोत्रपृष्ठमंसं च कूर्परम् । करपृष्ठं चोरुजानुगुल्फपादतलं तथा ॥५१॥ वामपादतलाच्चै⁵वमेतदे⁶वाष्टकं मतम् । दलानीत्यादि तथेत्यन्तं स्पष्टम्। एवमुक्तप्रकारेण। वामपादतलादिवामश्रोत्र- पृष्ठान्तमेतदेवाष्टकं मतम्। स्थानाष्टकद्वयं षोडशदलानीत्यर्थः ॥५१-५२॥ इन चतुरस्रों के भीतर विद्यमान वृत्त प्रदेश में “षोडशदलपद्माय नमः” इस मन्त्र से दाहिने कान, दाहिनी पीठ आदि स्थानों का स्पर्श कर व्यापक न्यास करे ॥५०॥ इन दलों में न्यस्तव्य शक्तियों को बताते हैं— इन सोलह दलों में कामाकर्षिणी आदि सोलह शक्तियों का विन्यास करे ॥५०॥ 'तद्दले' यहाँ जाति में एकवचन है। उन सोलह दलों में कामाकर्षिणी, बुद्धि, अहंकार, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, चित्त, धैर्य, स्मृति, नाम, आत्मा, अमृत और शरीराकर्षिणी देवियों को विन्यस्त करे ॥५०॥ इन दलों के स्थान ये हैं— दाहिने कान की पीठ, कन्धा, कोहनी, करपृष्ठ (करभ), जंघा, घुटना, गुल्फ (टखना) और दक्षिण पादतल तथा वाम पादतल आदि ये ही आठ स्थान इनके दलों के हैं ॥५१-५२॥ 'दलानि' से 'तथा' पर्यन्त श्लोक का अर्थ स्पष्ट है। इसी तरह से वाम पादतल, गुल्फ, घुटना, जंघा, करपृष्ठ, कोहनी, कन्धा और बायें कान की पीठ ये ही स्थान विपरीत क्रम से विन्यस्त किये जाते हैं। इस तरह से दाहिने भाग और बायें भाग के ये ही आठ- आठ स्थान मिल कर सोलह दलों के प्रतिनिधि बनते हैं ॥५१-५२॥ १. देशे' नास्ति—ने. ज.। २. इत्यादि—ने. ज. झ. उ. । ३. षोडशदलदक्षिणतः श्रोत्र—ख. ने. ज. झ. उ. । ४. प्यन्ता—ख. ने. ज. झ. उ. । ५. न्येव—ने. ज. झ. । ६. दप्यष्टकं—ख. ने. च. छ. ज. झ. । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)