योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४४ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः भेदंलक्षणप्रपञ्चापरपर्यायपरमदौर्भाग्यपरिपन्थिपरमाद्वैतसौभाग्यपदाधिरूढा सर्व- प्राणिष्वात्मतया परमप्रेमास्पदीभूता परचित्कला । तस्याश्चक्रं शिवादिक्षितिपर्यन्त- ^१तत्त्वमयम्, तदाविर्भाव(भूमिः?मिम्) । ^२त(स्या?स्य) न्यासं शृणु प्रिये । प्रियायै मदेकरस्यलालसायै कथयामि । यन्न कस्यचिदाख्यातम्, अतिरहस्यत्वात् । ^३श्री- चक्रन्यासस्य महाप्रयोजनत्वादनन्यकथितमपि प्रियायै ते कथयामीत्यर्थः । तनुशुद्धि- करं परम् । तनोः षट्त्रिंशत्तत्त्वात्मनः शुद्धिं परचित्पर्यवसानलक्षणां करोति । अतः एव परमुत्कृष्टमितरन्यासेभ्यः ॥४१-४२॥ श्रीचक्रन्यासप्रकारमाह— चतुरस्राद्यरेखायै नम इत्यादितो न्यसेत् ॥४२॥ दक्षांसपृष्ठपाण्यग्रस्फिक्कपादाङ्गुलीष्वथ । वामाङ्घ्यङ्गुलीषु स्फिक्के पाण्यग्रे चांसपृष्ठके ॥४३॥ सचूलीमूलपृष्ठेषु^४ व्यापकत्वेन सुन्दरि । सम्पत्ति ही यहाँ श्री कही गई है । यह श्री भगवती त्रिपुरसुन्दरी ही है । तीन रूपों से ऊपर तुरीय स्वरूपिणी देवी त्रिपुरा है और भेद (द्वैत) रूप में भासित हो रहे इस प्रपंच (जगत्) रूपी परम दुर्भाग्य का नाश कर परम अद्वैत स्वरूप सौभाग्य को देने वाली, सभी प्राणियों में अपनी-अपनी आत्मा के रूप में प्रतीत हो रही, परम प्रेम से ओतप्रोत यह परचित्कला ही सुन्दरी है। इस भगवती त्रिपुरसुन्दरी के चक्र से ही शिव से पृथिवी पर्यन्त तत्त्वमय जगत् का आविर्भाव होता है । हे प्रिये ! उस श्रीचक्र के न्यास को अब तुम सुनो । मेरे साथ एकरस होने की लालसावाली प्रिया को अब मैं इसका उपदेश कर रहा हूँ । इस विषय के अत्यन्त रहस्यपूर्ण होने से ही इसे अब तक किसी को नहीं सुनाया था । यह श्रीचक्र न्यास अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, अतः यद्यपि अब तक इसको किसी को नहीं बताया गया, किन्तु अब तुमको मैं इसका उपदेश कर रहा हूं। यह न्यास ३६ तत्त्वों वाले शरीर को पर चित्कला में लीन करके उसको निर्मल बना देता है । इसीलिये अन्य न्यासों की अपेक्षा यह उत्तम है ॥४१-४२॥ अब इस श्रीचक्रन्यास की विधि बताते हैं— “चतुरस्राद्यरेखायै नमः” इस मन्त्र से सबसे पहले दाहिने कन्धे के पिछले हिस्से में, दाहिने हाथ की अंगुलियों में, दक्षिण नितम्ब भाग में, दाहिने पैर की अंगुलियों में, बायें पैर की अंगुलियों में, वाम नितम्ब भाग में, बायें हाथ की अंगुलियों में, बायें कन्धे के पीछे तथा सिर के आगे के और पीछे के हिस्से में— इस तरह से इन दस स्थानों में हे सुन्दरि ! व्यापक न्यास करना चाहिये ॥४२-४४॥ १. तत्त्वचक्रमयं तदविनाभाव-ख. ने. ज. झ. उ. । २. 'तस्या' नास्ति-क. ग. । ३. 'श्रीचक्र ... यामीत्यर्थः' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. 'सुन्दरि' इत्यादिकं नास्ति-क.