भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २४३ षोढान्यासानन्तरं श्रीचक्रन्यासस्याऽवश्यंभावित्वात् तदिदानीं श्रीचक्रन्यास- माह— एवं षोढा पुरा¹ कृत्वा श्रीचक्रन्यासमाचरेत् । एवम् उक्तप्रकारेण, षोढा षट्प्रकारं न्यासम्, पुरा¹ कृत्वा, पश्चात् श्रीचक्र- न्यासमाचरेदित्यर्थः ॥४१॥ श्रीचक्रन्यासस्य महाप्रयोजनत्वादनन्यकथितमप्यद्य प्रियायै कथयामीत्याह— श्रीमत्त्रिपुरसुन्दर्याश्चक्रन्यासं शृणु प्रिये ॥४१॥ यन्न कस्यचिदाख्यातं तनुशुद्धिकरं परम् । आनन्द²कणभिक्षार्थं शब्दस्पर्शादिपक्कणे । अटत्यविरतं येन तद्दारिद्र्यं विदुर्बुधाः ॥ इत्यभियुक्तवचनोक्तरीत्या संकोचलक्षणदारिद्र्यविघातिनी³ परिपूर्णपरानन्द- रूपा सम्पत् श्रीरित्युच्यते । तद्वती त्रिपुरसुन्दरी । त्रिपुरा तुरीयरूपत्वात्, सुन्दरी षोढान्यास के बाद चक्रन्यास का अनुष्ठान अवश्य किया जाता है। इसलिये अब चक्रन्यास का वर्णन करते हैं— इस तरह से पहले षोढान्यास करके तब श्रीचक्र का न्यास करे ॥४१॥ ऊपर बताई गई विधि से गणेश, ग्रह, नक्षत्र आदि के भेद से वर्णित छः प्रकार के न्यासों को पहले करके बाद में श्रीचक्रन्यास करना चाहिये ॥४१॥ यह श्रीचक्रन्यास बहुत ही महत्त्वपूर्ण है, अब तक इसका उपदेश किसी को नहीं किया गया था, अब भगवती को उसका उपदेश किया जा रहा है— हे प्रिये ! भगवती श्रीमती त्रिपुरसुन्दरी के इस चक्रन्यास को तुम सुनो । इसको अब तक मैंने किसी को नहीं बताया है। यह उत्कृष्ट न्यास साधक के शरीर को पवित्र बना देता है ॥४१-४२॥ आनन्द के एक कण की भीख माँगने के लिये व्यक्ति शब्द, स्पर्श रूपी कोल-भीलों की बस्ती में निरन्तर भटकता रहता है । विद्वानों की दृष्टि में मनुष्य की वास्तविक दरिद्रता यही है ।। किसी ¹प्रामाणिक व्यक्ति का यह कथन है । व्यक्ति का यह संकुचित स्वरूप ही सबसे बड़ी दरिद्रता है । इस दारिद्र्य को दूर करने वाली परिपूर्ण परमानन्द स्वरूपिणी १. पुरः-क. ग. । २. कन्द-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. निर्वर्तिनी-ख. ने. झ. उ. ।

  1. ऋजुविमर्शिनीकार शिवानन्द ने इसको भट्ट गंगाधर मिश्र के वचन के रूप में उद्धृत किया है (पृ० ६९) । वहीं (पृ० १३४) भट्ट गंगाधर के किसी स्तोत्र का भी उल्लेख मिलता है । हो सकता है ये सभी श्लोक उस स्तोत्र ग्रन्थ के ही हों ।
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