योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४२ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः अट्टहासं च विरजं राजगृहं¹ महापथम् । कोलापुरमेलापुरं ²कालेशं तु जयन्तिका ॥३७॥ उज्जयिनीं³ विचित्रं च क्षीरकं हस्तिनापुरम् । ओड्डीशं च प्रयागाख्यं षँष्ठी मायापुरी तथा ॥३८॥ जलेशं मलयं शैलं मेरुं गिरिवरं तथा । माहेन्द्रं वामनं चैव हिरण्यपुरमेव च ॥३९॥ महालक्ष्मीपुरोड्याणे छायाछैत्रमतः परम् । एते पीठाः समुद्दिष्टा मातृकारूपकाः स्थिताः ॥४०॥ एते पीठाः समुद्दिष्टा गृहीतनामानः पीठाः । मातृकारूपकाः स्थिताः मातृका रूपं येषां ते मातृकारूपकाः । क्रमेणादिक्षान्तानामेकैकं वर्णमेकैकस्यादावुक्त्वा तत्त- द्वर्ण⁶स्थानेषु पीठानां न्यासं कुर्यादित्यर्थः । [⁷पीठानां मातृकामयताकथनं गणेशा- दीनामप्युपलक्षणम् । वर्गवर्णानामादौ वैखर्यक्षराण्यागमान्तरसंवादाद् विभज्य योज्यानीत्यर्थः] ॥३४-४०॥ गोकर्ण, मारुतेश्वर, अट्टहास, विरज, राजगेह, महापथ, कोलापुर, एलापुर, कालेश, जयन्तिका, उज्जयिनी, चित्रा, क्षीरक, हस्तिनापुर, ओड्डीश, प्रयाग, षष्ठी, मायापुर, जलेश, मलयशैल, मेरुगिरि, माहेन्द्र, वामन, हिरण्यपुर, महालक्ष्मीपुर, ओडयाण, छायाछत्र—ये पचास पीठ हैं। मातृकाओं के साथ इनका न्यास किया जाता है ॥३४-४०॥ इस तरह से यहाँ ¹पचास पीठों के नाम बताये गये हैं। ये सब मातृका वर्णों के ही प्रतिरूप हैं, अर्थात् वैखरी मातृका के एक-एक वर्ण से एक-एक पीठ की उत्पत्ति हुई है, अतः इन पीठों में वर्ण प्रतिबिम्बित हैं। इसीलिये क्रमशः अकार से क्षकार पर्यन्त एक- एक वर्ण का उच्चारण कर उन-उन वर्णों के स्थानों में ही इन पीठों का भी न्यास करना चाहिये । [पीठों को जैसे यहाँ मातृकामय कहा है, उसी तरह से गणेश, ग्रह, नक्षत्र आदि की भी मातृकामयता माननी चाहिये । वर्ग वर्णों के आरंभ में वैखरी वर्णों के संयो- जन की विधि अन्य आगमों से जाननी चाहिये] ॥३४-४०॥ १. गेहं-क. ग.। २. ओड्डारं-च. छ. ज. झ.। ३. न्यपि चित्रा च-क. ग., चित्राख्यं- ड. । ४. षष्ठं मायापुरं-क. ग. । ५. पुर-ड. उ. । ६. 'वर्ण' नास्ति-ख. ने. ज. झ. । ७. 'पीठानां ॰॰॰नीयर्थः' नास्ति-ख. ज. झ. ब. उ. । १. पीठ ५० है या ५१, इस विषय में अपनी व्याख्या में भास्करराय ने अन्तिम पक्ष का समर्थन किया है। उपोद्घात में इस विषय पर विचार करने का प्रयत्न किया जायगा।