भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २४१ पीठन्यासमाह— पीठानि विन्यसेद् देवि मातृकास्थानके पुनः१ । मातृकास्थानक इति जातावेकवचनम् । वैखरीवर्णस्थानेष्वित्यर्थः ॥ ननु कानि तानि पीठानीत्यत आह— तेषां नामानि कथ्यन्ते शृणुष्वावहिता प्रिये२ ॥३३॥ बहुत्वात् पीठानां पीठनाम्नां धर्तुमशक्यत्वादत्यन्तसावधाना भवेत्यर्थः ॥३३॥ तन्नामान्याह— कामरूपं वाराणसीं नेपालं पौण्ड्रवर्धनम् । पुर३स्थिरं कान्यकुब्जं पूर्णशैलं तथार्बुदम् ॥३४॥ आम्रातकेश्वर५काम्रे त्रिस्रोतः कामकोटकम् । कैलाशं भृगुनगरं केदार४पूर्णचन्द्रके ॥३५॥ श्रीपीठमोड्ड्रारपीठं जालन्ध्रं६ मालवोत्कले७ । ८कुलान्तं देविकोट्टं च गोकर्णं मारुतेश्वरम् ॥३६॥ अब पीठन्यास बताते हैं— हे देवि ! मातृका के वैखरी वर्णों में पीठों का न्यास करे ॥ ‘मातृकास्थानके’ यहाँ एकवचन जातिवाचक है। इसका अर्थ होगा कि मातृका के वैखरी वर्णों के जो स्थान हैं, उन्हीं स्थानों में पीठों का भी न्यास करे ॥ वे पीठ कौन-कौन से हैं, इस विषय में कहते हैं— हे प्रिये ! अब मैं उनके नाम बता रहा हूँ। तुम सावधान होकर सुनो ॥३३॥ पीठ बहुत से हैं, उनके अनेक नाम हैं। इनको याद रख पाना कठिन है, अतः बहुत सावधान होकर तुम इनके नाम सुनो ॥३३॥ अब पीठों के नाम बताये जा रहे हैं— कामरूप, वाराणसी, नेपाल, पौण्ड्रवर्धन, पुरस्थिर, कान्यकुब्ज, पूर्णशैल, अर्बुद, आम्रातकेश्वर, एकाम्र, त्रिस्रोत, कामकोटक, कैलाश, भृगुनगर, केदार, पूर्णचन्द्रक, श्रीपीठ, ओड्ड्रारपीठ, जालन्धर, मालव, उत्कल, कुलान्त, देविकोट्ट, १. न्यासवत्-ने. छ. ज. । २. प्रिये-ने. च. छ. ज. झ. । ३. चरस्थिरं-क. ग. ड. । ४. रं चन्द्रपुष्करम्-ख. ने. च. छ. ज. झ. उ. । ५. मेकपादं च-च. ज. झ., मेकवी- राख्यं-छ. उ. । ६. जालाख्यं-ख. ने. छ. ज. झ. उ. । ७. वं तथा-ख. ने. च. छ. ज. झ. उ. । ८. कुलमट्टं च-ख. ने. च. छ. ज. झ. उ. । १६