योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
DevanagariHindipublished485 पृष्ठ
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२४० योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः पादादिस्थानेषु दक्षिणादितो वामान्तम् । मेषादिराशयः$^१$ मेषवृषमिथुन- कर्कसिंहकन्यातुलावृश्चिकधनुर्मकरकुम्भमीनाः । वर्णैर्मातृकाक्षरैः सह न्यस्तव्याः । राशीनां वर्णा आगमान्तरसंवादान्मयोच्यन्ते— आद्यैश्चतुर्भिः सहितो मेषो दक्षपदे$^२$ऽक्षरैः । उकाराद्यैस्त्रिभिर्वर्णैर्वृषभो लिङ्गदक्षिणे ॥ ऋकाराद्यैस्त्रिभिर्वर्णैर्मिथुनं कुक्षिदक्षिणे । एऐभ्यां कर्कटो राशियुक्तो$^३$ वक्षसि दक्षिणे ॥ ओऔभ्यां सहितः सिंहो दक्षिणबाहुमूलके । अंअःशवर्गकैः कन्या $^४$शिरोदक्षिणभागतः ॥ कवर्गण तुला मूर्ध्नि वामे तद्बाहुमूलके । वृश्चिकश्च चवर्गेण टवर्गेण धनुर्हृदि ॥ वामे तवर्गसंयुक्तो मकरः कुक्षिवामतः । पवर्गेण पुनः कुम्भो $^५$लिङ्गवामप्रदेशतः ॥ यवर्गः क्षार्णसंयुक्तो $^६$मीनाख्यो वामपादके । इति ॥३२॥
पैर आदि स्थानों में दक्षिण भाग से आरम्भ कर वाम भाग पर्यन्त मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ और मीन इन बारह राशियों का मातृका वर्णों के साथ विन्यास करना चाहिये । अन्य आगम के प्रमाण से यहाँ $^१$राशियों के वर्णों का उल्लेख किया जा रहा है— अकार आदि चार अक्षरों के साथ दाहिने पैर में मेष राशि का, उकार आदि तीन वर्णों के साथ लिंग के दक्षिण भाग में वृष का, ऋकार आदि तीन वर्णों के साथ कुक्षि के दक्षिण में मिथुन का, ए और ऐ से संयुक्त कर्क राशि का वक्ष (हृदय) के दक्षिण में, ओ और औ के साथ सिंह का बाहुमूल के दक्षिण में, अं और अः वर्णों के साथ कन्या का शिर के दाहिने भाग में न्यास करना चाहिये । कवर्ग के साथ तुला का शिर के बायें भाग में, चवर्ग के साथ वृश्चिक का बाहुमूल के वाम भाग में, टवर्ग के साथ धनु का हृदय के वाम भाग में, तवर्ग के साथ मकर का कुक्षि के वाम भाग में, पवर्ग के साथ कुम्भ का लिंग के वाम भाग में और यकार से क्षकार पर्यन्त अक्षरों के साथ मीन का बायें पैर में न्यास करना चाहिये ।।३२।।
१. इतः परम्—'मेषादिमीनान्ताः' इत्यधिकं-क. ग. । २. दे स्वरैः-क. ग. । ३. युंतो-ख. ने. झ. उ. । ४. शिखा-ख. ने. झ. उ. । ५. वामे लिङ्ग-ख. ने. ज. झ. उ. । ६. मीनः स्यात्-ख ने. ज. झ. उ. । १. प्रपंचसार (४।३४-३७) में यह विषय वर्णित है । लगता है, अमृतानन्द ने ऐसे ही आगमों की सहायता से इस विषय को स्वलिखित श्लोकों में संगृहीत कर दिया है ।