योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २३९ थान्तां दाक्षायणीं चैव धात्रीं १नन्दां च पार्वतीम् । २फट्कारीं दशपत्रेषु पूर्वादीशान्तिमं यजेत् ॥ बन्धि(न्दि)नीं भद्रकालीं च महामायां यशस्विनीम् । रक्तां लम्बोष्ठिकां चैव पूजयेत् क्रमशः प्रिये ॥ चतुष्पत्रे च देवेशि वरदां च श्रियं तथा। षष्ठां सरस्वतीं चैव पूजयेत् क्रमशः शिवे ॥ क्षमां हंसवतीं चैव पूजयेच्च ३द्विपत्रके। ४एताभिः शक्तिभिर्युक्ता ध्यातव्याश्च सुरेश्वरि ॥ (इति ।) ५"न्यासं निर्वर्तयेत्” (३।८) इत्ययमान्तरो न्यासः । ६ध्यानं त्वागमान्तरा- दवगन्तव्यम् ॥३०-३१॥ राशिन्यासमाह— दक्षिणं ७पादमारभ्य वामपादावसानकम् । मेषादिराशयो वर्णैर्न्यस्तव्या सह पर्वति ॥३२॥ ठङ्कारी ये बारह देवियाँ हृदयस्थित द्वादशदल कमल में विन्यस्त की जाती हैं। डामरी, ढङ्कारी, णामिनी, तामसी, थान्ता, दाक्षायणी, धात्री, नन्दा, पार्वती, फट्कारी ये दस देवियाँ नाभिस्थित दशार पद्म में विन्यस्त की जाती हैं। पूर्व से लेकर ईशान पर्यन्त इनका यजन किया जाना चाहिये । बन्धि(न्दि)नी, भद्रकाली, महामाया, यशस्विनी, रक्ता, लम्बोष्ठिका, इन छः देवियों को हे प्रिये ! स्वाधिष्ठान नामक षड्दल कमल में विन्यस्त करना चाहिये । हे शिवे ! हे देवेशि ! चतुष्पत्र आधार कमल में वरदा, श्री, षण्ढा और सरस्वती इन चार देवियों का यजन करना चाहिये । क्षमा और हंसवती को दो दल वाले आज्ञाचक्र में विन्यस्त करना चाहिये । इन शक्तियों के साथ क्रमशः डाकिनी प्रभृति योगिनियों का ध्यान करना चाहिये ॥ न्यास का विधान करने वाला (३।८ से प्रारंभ हुआ ) यह प्रकरण आन्तर न्यास का वर्णन करता है । ध्यान तो दूसरे आगमों से जानना चाहिये ॥३०-३१॥ राशिन्यास की पद्धति यह है— हे पर्वति ! दाहिने पैर से लेकर वाम पाद पर्यन्त स्थानों में मेष आदि राशियों का वर्णों के साथ न्यास करना चाहिये ॥३२॥ १. नादां-ने. ज. झ. उ. । २. फेत्कारीं-ख. झ. उ. । ३. द्विपत्रयोः-क. ग. ज. । ४. छ.ज.मातृकयोः श्लोकार्धोऽयं मूले स्थाप्यते । ५. न्यासं निर्वर्त्य एवं मातरो ध्यातव्या अपीत्यर्थः । ध्यानं निर्वर्त्यायमान्तरो न्यास इत्यर्थः-ख. ने. झ. उ., अमृतादीनां ध्याना- नन्तरं न्यास इत्यर्थः-ज. । ६. ध्यानमागमा-क. ग. उ. । ७. पार्श्वं-क. च. छ. ज. ८. पार्वति-क. ख. च. छ. ज. झ. उ.