योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३२ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः प्रोक्तोऽयं षोढा न्यासः, सर्वत्र सर्वलोकेष्वपि, अपराजितः अप्रतिहतसाम- [र्थ्यः१, एवं वक्ष्यमाणक्रमेण यो न्यस्तगात्रः षोढान्याससाम] र्थ्यश्छिन्नपाशत्वात् स्वय- मेव परमेश्वरः । अत एव लोकेषु जनेषु स एव योगिभिः पूज्यः । किं बहुना, सर्वेषा- मपि पूज्यः, नास्त्यस्य पूज्यः कोऽपि लोके। २यद्येष बलादन्यस्मै ३प्रणमति, स मृतो भवेत्, नरकं च प्रयातीत्यर्थः ॥१०-१३॥ षोढान्यासप्रकारं वक्तुं प्रतिजानीते— षोढान्यासप्रकारं च कथयामि तवानघे ॥१३॥ ४स्पष्टम् ॥१३॥ तत्प्रकारमाह— विघ्नेशो विघ्नराजश्च विनायकशिवोत्तमौ । ५विघ्नकृद् विघ्नहर्ता च ६गणराड् गणनायकः ॥१४॥ एकदन्तो द्विदन्तश्च गजवक्त्रो निरञ्जनः । ७कपर्दवान् दीर्घमुखः शङ्कुकर्णो वृषध्वजः ॥१५॥ ऊपर बताया गया यह षोढा न्यास सभी लोकों में एक समान अपराजेय सामर्थ्य वाला है । आगे बताई गई विधि से जो साधक इसको अपने शरीर में विन्यस्त कर लेता है, वह इन न्यासों की सहायता से सारे पाश-जालों से मुक्त हो स्वयं परमेश्वर बन जाता है । संसार में वह योगियों का भी पूज्य हो जाता है। योगियों का ही नहीं, वह सबका पूज्य बन जाता है। लोक में उसके लिये कोई भी पूजनीय नहीं रह जाता । यदि वह जबरदस्ती से किसी को प्रणाम करता है, तो वह जबरदस्ती प्रणाम कराने वाला व्यक्ति तत्काल मर जाता है और उसको नरक भी भोगना पड़ता है ॥१०-१३॥ अब षोढा न्यास की विधि को बताने की प्रतिज्ञा करते हैं— हे अनघे ! अब मैं तुम्हें षोढा न्यास की विधि बताने जा रहा हूँ ॥१३॥ इसका अर्थ स्पष्ट है ॥१३॥ उस विधि को ही अब बताते हैं— विघ्नेश, विघ्नराज, विनायक, शिवोत्तम, विघ्नकृत्, विघ्नहर्ता, गणराट्, गणनायक, एकदन्त, द्विदन्त, गजवक्त्र, निरञ्जन, कपर्दवान्, दीर्घमुख, शङ्कुकर्ण, १. 'र्थ्यं••••साम' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । २. यदि चेदेष बाल्याद्यस्मै प्रण- क. ग. । ३. प्रणमयति-झ. उ. । ४. स्पष्टमेतत्-ज. । ५. विघ्नहृद् विघ्नकर्ता-ख. ने. च. छ. ज. झ. उ. । ६. गणनायक एव च-ख. ने. ङ. च. छ. ज. झ. उ. । ७. कन्दर्प- ने...